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Tuesday, April 28, 2020

ANALYSIS| कोरोना आफत को अवसर में बदलने की सलाह दे रहे हैं PM मोदी, राज्य भी तैयार कैसे..?

दिल्ली। अगर रिफॉर्म करने की दिशा में राज्य आगे बढ़ते हैं, तो इस संकट को हम बहुत बड़े अवसर में बदल सकते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने ये बात सोमवार को तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों से कोरोना महामारी (Covid-19 Pandemic) के संदर्भ में उठाये जा रहे कदमों की समीक्षा के दौरान हुई वीडियो कांफ्रेंसिंग में कही. इस संदर्भ में पीएम मोदी ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की तारीफ भी की, जिन्होंने कोरोना महामारी के इस दौर में कारखानों में श्रमिकों के लिए काम के घंटे आठ से बढ़ाकर 12 कर दिए हैं.
हर बड़ा संकट एक नई विश्व व्यवस्था को जन्म देता है, नई संभावनाएं बनती हैं. पिछले दो महीने से पूरी दुनिया कोरोना से त्रस्त है. ज्यादातर देशों में आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ी हैं, लॉकडाउन आम बात है. लेकिन जो बड़ा फर्क आया है, वो चीन के बारे में वैश्विक समुदाय के नजरिये को लेकर. अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान सहित जहां कई बड़े देश इस महामारी के प्रसार के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराते हुए उसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं, जिसके वुहान शहर से ये महामारी दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में फैली. चीन ने लंबे समय तक इस बारे में आपराधिक चुप्पी साधे रखी और दुनिया को इस बारे में जल्दी सचेत नहीं किया. जब देर से बताया भी, तो भी वास्तविक स्थिति पर पर्दा डालने की कोशिश की.
पूरी दुनिया की निगाह में चीन खलनायक की भूमिका में है. जो देश राजनयिक और आर्थिक कारणों से चीन के सामने खुलकर बोल नहीं रहे हैं, वो भी अंदर से नाराज हैं. चीन के प्रति नाराजगी का आलम ये है कि दुनिया के कई बड़े देश मैन्युफैक्चरिंग का काम चीन से बाहर ले जाने की तैयारी में लग गए हैं. जापान तो इस मामले में पहले से ही मुखर है.
जिस तरह से चीन मैन्युफैक्चरिंग में अपनी महारत के कारण पूरी दुनिया में अपनी जड़ जमाने में पिछले तीन दशकों में कामयाब रहा है और फिर आर्थिक नीतियों और कूटनीति को प्रभावित करने की कोशिश की है, उसके बाद पहली बार वो इस तरह के बड़े संकट का सामना कर रहा है. दुनिया के ज्यादातर देश चीन की जगह किसी और देश में सामानों की मैन्युफैक्चरिंग के बारे में सोचने लगे हैं.
पीएम मोदी ने खुलकर चीन का नाम तो नहीं लिया है, लेकिन उनका संकेत राज्यों के लिए यही है. मेक इन इंडिया का नारा पिछले कई वर्षों से बुलंद करते हुए दुनिया के प्रमुख देशों को वो भारत में अपने सामान का निर्माण करने की दावत हर संभव प्लेटफार्म के जरिये देते रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में इसमें एक हद तक सफलता भी मिली है, लेकिन कोरोना के इस संकट ने भारत के लिए और बड़ा अवसर पैदा कर दिया है.
नब्बे के दशक में वैश्विक अर्थव्यवस्था का उदारीकरण होने और विश्व व्यापार में बढ़ोतरी के लिए डब्ल्युटीओ जैसे संगठन जब अस्तित्व में आए, तो चीन और भारत दोनों इसका लाभ उठाने की हालत में सबसे सक्षम थे, क्योंकि श्रम की लागत इन दोनों देशों में कम थी और बहुत बड़ा श्रमिक बल इनके पास था, जो दुनिया के अन्य देशों के पास नहीं था. उस दौर में चीन भारत के मुकाबले बाजी मार ले गया. साम्यवादी देश होने के बावजूद पूंजीवादी व्यवस्था का उसने सबसे अधिक लाभ उठाया. देंग जियाओ पिंग की अगुआई में चीन एक नई राह पर, नये संदेश के साथ आगे बढ़ा- कम्युनिस्ट देश लेकिन पूंजीवादी तड़के के साथ.
चीन ने अपने पूर्वी किनारे पर मैन्युफैक्चरिंग के लिए जरूरी सभी संसाधन जुटाए, नियमों को आसान बनाया, कारखाने लगाने के लिए फटाफट मंजूरी दी, श्रम तो मुहैया था ही, श्रम कानूनों को भी लचीला बनाया, बिजली से लेकर जमीन के पट्टे तक, सब कुछ आसानी से दिया. परिणाम ये हुआ कि चीन अगले तीन दशक में दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बन गया. अगर संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी विभाग की तरफ से 2018 के लिए जारी हुए आंकड़े को देखें, तो ग्लोबल मैन्युफैक्टरिंग आउटपुट के हिसाब से चीन अपने बाकी प्रतियोगियों के मुकाबले बड़ी मार्जिन के साथ नंबर 1 पर बैठा हुआ दिखाई देता है.
अब इसके मुकाबले भारत ने कोरोना के सामने लड़ाई में जो ग्लोबल गुडविल हासिल की है, उसका फायदा भली-भांति उठाया जा सकता है. पीएम मोदी को इस बात का अंदाजा है, इसलिए बिना ज्यादा शोर किये वो राज्यों को अपनी तैयारी करने के लिए कह रहे हैं, संकट के बीच बड़ी संभावनाएं देखते हुए. इसी सिलसिले में अशोक गहलोत की तारीफ करना भी शामिल है.
सामान्य दौर में अगर आठ घंटे की जगह बारह घंटे फैक्ट्रियों में श्रमिकों के काम करने का प्रावधान किसी राज्य या मुख्यमंत्री ने किया होता, तो श्रम संगठनों से लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने हंगामा कर दिया होता, लेकिन आज हालात ये हैं कि देश के पीएम विपक्षी पार्टी के मुख्यमंत्री की इस बात के लिए तारीफ कर रहे हैं और ज्यादा शोर भी नहीं हो रहा है.
दरअसल, अर्थव्यवस्था पर बारीक नजर रखने वाले लोगों को पता है कि 1991 में मजबूरी में ही सही, लेकिन उदारीकरण की राह पर भारत आगे तो बढ़ा, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग के मामले में वो चीन को टक्कर क्यों नहीं दे पाया, क्यों मुकाबला नहीं कर पाया. भारत की अपनी प्रजातांत्रिक व्यवस्था और लालफीताशाही ही इसकी राह में सबसे बड़ी बाधा रही. कुछ राज्य जहां पर मैन्युफैक्चरिंग के लिए जरूरी कारकों के मामले में हालात बेहतर थे, वो लाभ तो ले पाए, लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल सहित तमाम राज्य इस मामले में पिछड़ गये बाद में कइयों पर बीमारू का गंदा सा तमगा भी लग गया.
रुढ़ीवादी श्रम कानूनों, जमीन अधिग्रहण की पेचीदगियों, राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव, आधारभूत सुविधाओं की बदहाली और खराब कानून-व्यवस्था, ये वो तमाम कारण रहे, जो दुनिया की कंपनियों को हमारे पास बड़े पैमाने पर आने से रोकते रहे और साम्यवादी चीन बाजार अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी मंडी बन गया. क्योंकि न तो वहां के राजनीतिक नेतृत्व को किसी के प्रति उत्तरदायी होना था और न ही तमाम किस्म की सुविधाएं मुहैया कराने में कोई अड़चन थी. चोलबे ना, चोलबे ना का शोर वहां मचने वाला नहीं था, उसके वैचारिक अनुयायी जब यही काम पश्चिम बंगाल में कर रहे थे.
पूरे तीन दशक बाद हमारे पास मौका है। केंद्र में पीएम मोदी की अगुआई में एक ऐसी सरकार बैठी है, जो भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का सपना देखने में लगी हुई है और इसके लिए पिछले कुछ वर्षों में कुछ बड़े कदम भी उठाये हैं। मसलन कॉरपोरेट के लिए आय कर को घटाना और इसे 15 फीसदी तक ला देना वैश्विक तौर पर भारत को तुलनात्मक रुप से आकर्षक बना देने की दिशा में एक बड़ा कदम है. निवेश के लिए मंजूरी देने संबंधी कानूनों को लगातार आसान बनाया जा रहा है, गैरजरूरी व्यवधानों को हटाया जा रहा है.
मेक इन इंडिया अभियान को बढ़ावा देने के लिए उद्योग और वित्त मंत्रालय ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों में मौजूद भारत के दूतावास भी गंभीरता से लगे हुए हैं. भारत में निवेश के क्या फायदे हैं, भारत की सांस्कृतिक विरासत और साम्यवादी चीन के मुकाबले मानवीय दृष्टिकोण को भी समझाया जा रहा है। लेकिन बात सिर्फ इससे बनने वाली नहीं है.
अगर भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनना है, तो इसमें राज्यों की भूमिका सबसे अहम रहने वाली है. बाहर से कोई भी कंपनी जब फैक्ट्री लगाने के लिए भारत का रुख करेगी, तो वो मोटे तौर पर आधा दर्जन मुद्दों को ध्यान में रखेगी. सबसे बड़ी बात, कारखाना लगाने के लिए उसे जमीन कितने सस्ते भाव पर और कितनी जल्दी मुहैया कराई जा सकती है. राज्य सरकार कितनी जल्दी अनुमति देने की औपचारिकता को पूरा करती है, ये भी बड़ा फैक्टर रहने वाला है. बिजली और पानी की उपलब्धता, गंदे पानी के निकास और प्रोसेसिंग की व्यवस्था, कॉमन स्टीम प्लांट मुहैया होना और कारखानों से बंदरगाह तक जल्दी सामान को पहुंचाने की आधारभूत व्यवस्था, ये सब भी महत्वपूर्ण आधार हैं, जिसे ध्यान में रखते हुए विदेशी कंपनियां किसी दूसरे देश में प्लांट लगाने के बारे में सोचती हैं. देश के ज्यादातर राज्यों को इस पर काम करना है, साथ में श्रम कानूनों को भी लचकदार बनाना होगा.
जमीन का अधिग्रहण समवर्ती सूची में है. हर राज्य अपनी सुविधा के हिसाब से कानून में बदलाव कर सकता है. सरकारों के पास अपना रिजर्व लैंड है, जहां रिजर्व लैंड नहीं है, वहां संबंधित जमीन मालिकों को समझा-बुझाकर जमीन मुहैया कराना, ये सब करना होगा. आज किसी भी कंपनी के पास ज्यादा धैर्य नहीं है, कोई भी कंपनी ये बर्दाश्त नहीं कर सकती कि वो जमीन के लिए महीनों तक इंतजार करती रहे. राज्य सरकारों को इसके लिए पहले से तैयारी करके रखनी होगी.
भारत के हक में जो बातें हैं, उसमें सबसे प्रमुख है सस्ते श्रम की उपलब्धता. चीन में श्रम की लागत विकासशील और विकसित देशों के बीच है और बहुत जल्दी वो विकसित देशों के आसपास पहुंच जाने वाली है. भारत की स्थिति इस मामले में आकर्षक है. यही नहीं, भारत के पास पैंतीस साल से कम उम्र की सबसे बड़ी जनसंख्या है, दुनिया में सबसे ज्यादा साइंस और इंजीनियरिंग ग्रेजुएट भारत के पास हैं. यानी कुल मिलाकर सस्ता श्रम, बड़ा टैलेंट पुल और स्किल्ड मैनपावर की उपलब्धता भारत को मानव संसाधनों पर होने वाले खर्च के मामले में दुनिया के बाकी देशों की तुलना में काफी सस्ता और आकर्षक बना देता है, चीन के मुकाबले तो निश्चित तौर पर. दुनिया में सबसे अधिक अंग्रेजी बोलने वाले वाले लोग भी भारत में ही हैं यानी संवाद के मामले में भी आसानी, चीन में ये बड़ी समस्या है.