भोपाल। आजकल पति-पत्नी के रिश्तों में बिखराव के मामले कुटुम्ब न्यायालय में लगातार पहुंच रहे हैं। न्यायालय उनके रिश्तों को बचाने के लिए प्रयास तो कर रहे हैं, लेकिन फिर भी उन्हें टूटने से नहीं बचा पा रहे। कुटुम्ब न्यायालय में आने वाले मामलों में 55 फीसदी में पत्नियों को पति नहीं, बल्कि उनके पैसों से प्यार होता है। पत्नियों को कहना होता है कि उन्हें पति नहीं बल्कि भरण-पोषण के रूप में मोटी रकम चाहिए।
पत्नियां रिश्तों में बंधना नहीं चाहती हैं-
कुटुम्ब न्यायालय के काउंसलर ने कहा कि आजकल पत्नियां खुद ही स्वतंत्र रहना चाहती हैं। परिवार वालों का रोक-टोक उन्हें पसंद नहीं है। वे किसी बंधन में भी नहीं रहना चाहती। कई मामलों में पत्नियों को पति से अलग होने के बाद भरण-पोषण के नाम पर मोटी रकम चाहिए।
25 हजार रुपए महीना चाहिए-
रूखसाना बेगम व शेख मोहम्मद (काल्पनिक नाम) की शादी को 20 साल हो गई। शेख ने दूसरी शादी कर ली लेकिन पहली पत्नी और बच्चों का भी बराबर खर्च उठाता है। फिर भी रूखसाना ने कोर्ट में तलाक की अर्जी लगा दी। जब पेशी हुई तो उसने कहा कि उसे पति नहीं चाहिए, लेकिन पति से जीवन निर्वाह के लिए महीने का 25 हजार रुपए चाहिए। शेख उसके साथ भी रहना चाहता है, लेकिन पत्नी को सिर्फ उसके पैसे चाहिए।
कहीं भी जाए मुझे तो पैसा चाहिए-
अनुराग तिवारी व नमिता (काल्पनिक नाम) की शादी को 9 साल हुए हैं। छोटी-छोटी बातों पर दोनों के बीच झगड़ा होने लगा, जिससे मामला तलाक तक पहुंच गया। अनुराग पत्नी और बच्चे के साथ रहना चाहता है, लेकिन नमिता को उसकी 4 लाख रुपए मंथली सैलरी से 2 लाख रुपए जीवन निर्वाह के लिए चाहिए। अनुराग ऑस्ट्रेलिया की एक कंपनी में हैं, जिससे नमिता का कहना है कि कहीं भी जाए, लेकिन मुझे तो पैसे चाहिए।
मोटी रकम मांगती है-
पति-पत्नी के जितने भी केस आते हैं, उसमें 55 फीसदी मामलों में पत्नियों को पति नहीं बल्कि पैसा चाहिए। पत्नियां छोटी-छोटी बातों पर अलगाव की बात करती हैं व मोटी रकम डिमांड करती हैं।
सरिता राजानी, वरिष्ठ एडवोकेट, कुटुम्ब कोट
जिम्मेदारी से बचते है-
शादी जैसे रिश्तों में कोई भी बंधना नहीं चाहता है। इसका बड़ा कारण है पति-पत्नी दोनों अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं।
आरएन चंद, प्रधान न्यायाधीश, कुटुम्ब न्यायालय
