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Saturday, December 28, 2019

2019 के वो चेहरे जिनकी हार की हर तरफ थी चर्चा, अभेद किले भी ढ़ह गए चुनाव में

भोपाल. एक किस्सा 2019 में आज हम आपको 2019 की सबसे बड़ी सियासी हार के बारे में बताएंगे। मैं आपको जिस हार का किस्सा सुना रहा हूं। उस हार के बारे में किसी ने सोचा नहीं था। चुनावों के परिणाम आने से पहले ही यहां जीत का जश्न मना लिया जाता था। लेकिन 2019 के चुनाव परिणाम आने के बाद भी यहां जश्न नहीं मनाया गया था। वो नेता चुनाव हार गया था जिसे लोग यहां सासंद से ज्यादा अपना महाराज मानते थे।
ज्योतिरादित्य सिंधिया
गुना-शिवपुरी संसदीय सीट पर राजनीति से ज्यादा राजवंश हावी था। सिंधिया खानदान की इस पारंपारिक सीट पर विपक्षी उम्मीदवार कोई भी हो जीत केवल सिंधिया परिवार को ही मिलती थी। लेकिन 2019 में यहां से ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार हुई। ये 2019 की सबसे बड़ी चौंकाने वाली हार थी। 2019 में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी सुरक्षित सीट गुना-शिवपुरी को चुना था। इससे पहले अटकलें थीं कि इस सीट पर प्रियदर्शनी चुनाव लड़ सकती हैं और ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर से चुनाव लड़ सकते हैं। बीजेपी इस सीट से सिंधिया के शागिर्द रहे केपी यादव को ही टिकट देकर चुनाव की खानापूर्ति की। लेकिन वोटिंग में महाराज पर जनता का गुस्सा भारी पड़ गया और नतीजे वाले दिन पूरे देश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार चर्चा का विषय बन गई। प्यादे से राजा पिट गया था। किसी को समझ नहीं आया कि ऐसा कैसे हो गया।
दिग्विजय सिंह
महाराज की हार के बाद अब बात राजा के हार की। मध्यप्रदेश की सियासत में महाराज के साथ राजा भी हैं। नाम है दिग्विजय सिंह। 2003 के बाद दिग्विजय ने सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया था। भोपाल संसदीय सीट पर कभी भी देश की नजरें नहीं रहती थीं। लेकिन 2019 में इस सीट पर पूरे देश की नजर थी। वजह थे उम्मीदवार। कांग्रेस के उम्मीदवार थे पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह। भाजपा की उम्मीदवार थीं साध्वी प्रज्ञा। कांग्रेस ने दिग्विजय को भोपाल से उतार तक सियासी खेल खेला। लेकिन मास्टर स्ट्रोक खेला भाजपा ने। मालेगांव धमाकों में तथाकथित आरोपी साध्वी प्रज्ञा पर बीजेपी ने दांव लगाया। चुनाव मैदान में आते ही साध्वी ने विवादित बयान देना शुरु किया।
दिग्विजय को सहारा देने के लिए कंम्प्यूटर बाबा ने मिर्ची यज्ञ शुरू कर दिया। विकास का चुनाव अब धार्मिक हो गया। साधु-संतों ने भोपाल की सड़कों पर डेरा डाल दिया। दिग्विजय पर भगवा आतंकवाद का बयान भारी पड़ गया। नतीजे सामने आए तो बीजेपी का दांव सही पड़ चुका था। सुबह पार्टी में शामिल होकर शाम को टिकट लेने वाली साध्वी साढ़े तीन लाख से ज्यादा वोटों से जीत चुकी थी। राजा और साध्वी की जंग में साध्वी की जीत चुकी थीं। ये हार हर किसी के लिए अप्रत्याशित थी।
कांतिलाल भूरिया
अब बात तीसरी हार की। 2019 के चुनाव में कांग्रेस अपनी तीसरी पक्की सीट रतलाम-झाबुआ को मान रही थी। यहां कांग्रेस के पास 4 दशक से कद्दावर नेता कांतिलाल भूरिया थे। लिहाजा समर्थक भी सीट पर जीत मान रहे थे। भूरिया की कोई बड़ी काट भाजपा के पास नहीं थी। लेकिन क्रिकेट और राजनीति में चमत्कार होने का यकीन रखने वाले मोदी और शाह ने पूर्व अधिकारी से विधायक बने जीएस डामोर को मैदान में उतार दिया। बीजेपी को इस सीट पर ज्यादा उम्मीद नहीं थी। भूरिया को अपने लंबे कैरियर और जनता के बीच पैठ का भरोसा था। राजनीतिक पंडित इसे एकतरफा मुकाबला बता रहे थे लेकिन जब चुनाव परिणाम आए तो नजीते बदल गए थे। कांग्रेस जिस सीट पर जीत मान रही थी उसे हार का सामना करना पड़ा था। कांतिलाल भूरिया चुनाव हार चुके थे।
अजय सिंह
श्रीनिवास तिवारी की मौत के बाद विंध्य की सियासत में कांग्रेस पिछड़ गई थी। श्रीनिवास तिवारी के विंध्य की सियासत को संभालने के लिए आगे आए पूर्व सीएम अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह राहुल भैया। सीधी और सतना के भंवरजाल में फंसे अजय सिंह राहुल भैया खुद तय नहीं कर पा रहे थे कि वो कहां से चुनाव लड़े। पर पार्टी ने इस बार उन्हें सतना की बजाय सीधी संसदीय सीट से मैदान में उतारा। अजय सिंह अपनी हर सभा में कहने लगे कि कहीं ये हमारा आखिरी चुनाव न हो। हमारा तो फिर भी कुछ हो जाएगा लेकिन हम नहीं जीते तो आपका क्या होगा। बीजेपी में भारी विरोध के बावजूद रीती पाठक को टिकट दिया। ब्राह्मण वर्सेस ठाकुर की जंग में कांग्रेस हार गई।
अरुण यादव
2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस खंडवा में अपनी जीत मान रही थी। शिवराज सिंह चौहान को विधानसभा में चुनौती देने वाले अरुण यादव को खंडवा संसदीय सीट से चुनाव मैदान में थे। इस सीट पर कांग्रेस के पास यही एक चेहरा था और पार्टी मानकर चल रही थी शायद पिछली बार की हार इस बार जीत में तब्दील हो जाए। बीजेपी के पास भी ज्यादा ऑप्शन नहीं थे। नंदकुमार चौहान उर्फ नंदू भैया पर ही पार्टी ने फिर भरोसा जताया। उम्मीद और डर दोनों ही तरफ था क्योंकि विधानसभा चुनाव के नतीजे इस क्षेत्र में मिले जुले ही थे। लिहाजा दोनों ने प्रचार में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
जब नतीजे आए तो ये साफ हो गया था कि तमाम कयासो, अटकलों और विश्लेषणों पर मोदी लहर ने पानी फेर दिया है। सारी आंकड़ेबाजी धरी की धरी रह गई और विधानसभा की जीत को कांग्रेस 10 परसेंट भी लोकसभा चुनाव में नहीं भुना पाई। नतीजा ये रहा कि अरुण यादव अपना चुनाव हार गए। 2019 के लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश की 29 में से 28 सीटें बीजेपी की झोली में आ चुकी थीं।