अंबाला (हरियाणा) । गोवंश का संवर्धन और जैविक कृषि, सिक्के के दो पहलू हैं। उपलों और जैविक खाद के इतर गोबर का अन्य उपयोगों में बेहतर प्रबंधन इस दिशा में कारगर साबित हो सकता है। अंबाला में अच्छी पहल हुई है। हरियाणा से लेकर राजस्थान तक इस पहल का विस्तार तेजी से हुआ है। सैकड़ों घरों में गोबर से बनी ईंटों और प्लास्टर का इस्तेमाल हो चुका है। परिणाम अच्छे आए हैं। गोबर से तैयार प्लास्टर, जिसे वैदिक प्लास्टर कहा जा रहा है, सरकारी लैब में जांचा-परखा जा चुका है। जबकि ईंट को मान्यता मिलना शेष है। ईंट और प्लास्टर के अलावा टाइल, सीट, जलावन और मोबाइल स्टैंड जैसी ईको फ्रेंडली वस्तुएं भी इससे तैयार की गई हैं, जो लोगों को पसंद आ रही हैं। यह पहल की है अंबाला (हरियाणा) की 35 वर्षीय वाणी गोयल ने। उनका साथ दिया है रोहतक के डॉ. शिवदर्शन मलिक ने। दोनों ने बताया कि वैदिक प्लास्टर को सरकारी लैब से न केवल मंजूरी मिल चुकी है, बल्कि इसका प्रयोग अब घरों में सीलन भरी दीवारों की समस्या से निजात पाने के लिए शुरू हो चुका है। अब तक इसे वैदिक प्लास्टर के नाम से बेचा जा रहा है, लेकिन अब इसका नाम गऊ क्रीट होगा।
गोवंश को बचाने के लिए-
वाणी गोयल और डॉ. शिवदर्शन मलिक ने देसी गाय और बैलों की नस्ल को बचाने के लिए यह प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। गोबर, जिप्सम, ग्वारगम, चूना और नींबू सत्व मिलाकर वैदिक प्लास्टर तैयार करने में उन्होंने सफलता पाई। इसे केंद्र सरकार की ओखला, उप्र स्थित लैब से मंजूरी भी मिल चुकी है। देखने में सामान्य प्लास्टर जैसे लगने वाले इस प्लास्टर में प्राकृतिक रंग मिलाकर नेचुरल पेंट उत्पाद भी तैयार किया जा रहा है।
210 रुपये में 25 किलो-
वाणी गोयल ने बताया कि वैदिक प्लास्टर की कीमत 210 रुपये प्रति बैग (25 किलो) तय की गई है। इससे 25 स्क्वायर फीट दीवार पर लिपाई की जा सकती है। इसे जल्द ही ऑनलाइन बिक्री के लिए भी उपलब्ध कराया जाएगा। मोबाइल स्टैंड की कीमत फिलहाल 250 रुपये तय की गई है। उत्पादन बढ़ने पर इसकी कीमत भी कुछ कम हो जाएगी।
ऐसे बनाई जा रही गोबर की ईंटें-
दो किलो गोबर में 200 ग्राम चूना मिलाकर एक ईंट तैयार की जा रही है। खास बात यह है कि ईंट पूरी तरह से हैंड मेड है। सूखने के बाद ईंट का वजन 400 से 450 ग्राम तक रह जाता है। इसकी मोटाई और लंबाई सामान्य ईंट के बराबर रखी गई है। डॉ. मलिक और वाणी का दावा है कि इन ईंटों को 73 मिनट तक आग नहीं लगेगी।
फिलहाल 10 एमएम मोटाई की ईंट को 5 मिनट तक गैस पर रखकर परीक्षण किया गया है। मोटाई बढ़ने के साथ-साथ फायर रेटिंग भी बढ़ती जाएगी। इसके अलावा ईंट को पानी में भी डालकर जांचा गया है। इन्हें दिल्ली में भारत सरकार द्वारा संचालित सूक्ष्म लघु व मध्यम उद्योग मंत्रालय की लैब में टेस्टिंग के लिए भेजा जाएगा। मंजूरी मिलते ही बड़े स्तर पर काम शुरू कर दिया जाएगा। ईंट के अलावा सीट (बैठने के लिए बैंच), टाइल और गमला, जलावन (गोकास्ट) आदि उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं।
ये हैं फायदे-
डॉ. शिवदर्शन और वाणी गोयल का दावा है कि इन ईंटों और प्लास्टर से रेडिएशन की समस्या खत्म होगी। मोबाइल की तरंगे हानिकारक होती हैं। गोबर की ईंट-दीवार-प्लास्टर आदि से रेडिएशन का कुप्रभाव घटेगा। मोबाइल स्टैंड भी इसमें कारगर साबित होगा। गोबर से निर्मित दीवारें धुएं को भी अवशोषित करेंगी। बीकानेर, राजस्थान के शोभासर गांव में डॉ. शिवदर्शन मलिक वैदिक प्लास्टर का प्लांट चला रहे हैं।
