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Friday, October 11, 2019

यहां घर घर में रहते राम ऐसा देश अपना है, कवि गोष्ठी सम्पन्न

शिवपुरी/करैरा, स्थानीय साहित्यकार प्रदीप श्रीवास्तव के निवास पर कवि गोष्ठी का आयोजन अतिथि कवि राकेश श्रीवास्तव सेंवढ़ा एवं संजय श्रीवास्तव प्रज्ञा गंज बासौदा के सम्मान में किया ।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मार्केटिंग सोसायटी करैरा के पूर्व प्रबंधक सतीश श्रीवास्तव उपस्थित थे तथा अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार और होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ राजेन्द्र गुप्ता द्वारा की गई ।विशिष्ट अतिथि के रूप मेें संगीतकार शिक्षक जयकुमार श्रीवास्तव उपस्थित रहे ।
कार्यक्रम के आरंभ में मां सरस्वती की पूजा और आरती की गई ।
 माँ सरस्वती की वंदना शशांक मिश्रा द्वारा प्रस्तुत की गई ।
तत्पश्चात अतिथियों का स्वागत तिलक लगाकर  किया गया तथा अतिथि कवियों का सम्मान शाल श्रीफल भेंट कर किया गया।

कवि गोष्ठी में प्रमोद गुप्ता भारती ने  अपनी कविताओं से सभी का मन मोह लिया
"कदम जब बढ़ चले मित्रो चांद के पार जाएंगे,
वहां भी भव्य भारत का तिरंगा लहलहायेंगे।"
 सतीश श्रीवास्तव ने अपनी कविता के माध्यम से एक व्यंग प्रस्तुत किया,
"घर में आटा तेल नहीं है जेब पड़ी है खाली,
फिर भी पूंछ रहे हो मुझसे कैसी मनी दिवाली।"
तत्पश्चात शशांक मिश्रा ने अपने गीतों से गोष्ठी में एक नया मोड़ दिया,
"आस्तिक हैं वो जो हंसके जीवन जिएं,
नास्तिक हैं वो जो मुस्कराते नहीं।
है भरोसा जिसे अपने भगवान पर,
वो कभी दुख में आंसू बहाते नहीं।"
डॉ राजेन्द्र गुप्ता ने अपनी कविता कुछ इस प्रकार प्रस्तुत की,
"बन सको कागद अगर तो मैं कलम बन जाऊंगा,
पूर्णता दें प्रेम को वे पंक्तियां लिख पाऊंगा ।"
कवि प्रदीप श्रीवास्तव ने अपने गीतों के माध्यम से खूब तालियां बटोरी,
"मेरे ख्वावों में रोज आते हैं,
मेरे प्राणों में गुनगुनाते हैं।"
करैरा के प्रसिद्ध कवि डॉ ओमप्रकाश दुबे ने अपनी अद्भुत शैली में कविताएं सुनाई,
"मन ही हैवान बन जाता है,
मन ही शैतान बन जाता है।
ऐसा मेरा मन कहता है।"
ग़ज़ल के क्षेत्र में करैरा का नाम रोशन कर रहे सुभाष पाठक की ग़ज़लों को भरपूर सुना गया और सराहना की गई,
"ज़मीं दिल के हसीं रिस्तों की बंजर हो गई अब तो,
नदी तेरे ग़मों की भी समंदर हो गई अब तो।"
सीता सेंट्रल स्कूल के संचालक रमेश वाजपेई की कविता ने गोष्ठी में एक नई दिशा दी।
"पापा मुझे राम मत कहना,
किसी धोबी के कहने से
नहीं छोड़ सकता पत्नी को।"
अतिथि कवि संजय श्रीवास्तव प्रज्ञा ने श्रेष्ठ कविताएं सुनाई।
" दुःखी मां बाप जब तक हों तुझे ईश्वर मिले कैसे,
उन्हीं की सेवा करने से स्वयं भगवान मिलते हैं।"
राकेश श्रीवास्तव सेंवढ़ा के शानदार गीतों ने सभी का मन मोह लिया।
जुबानों पर हैं तुलसी मीर ये परिवेश अपना है,
न रखिए सोच छोटी बस यही संदेश अपना है।
 सफलतापूर्वक संचालन सुभाष पाठक जिया ने किया तथा आभार प्रदर्शन प्रदीप श्रीवास्तव  ने किया ।