नई दिल्ली. झारखंड आज नई करवट ले रहा है. बीजेपी की सफलता के अश्वमेघ का घोड़ा यहां आकर यकायक ठिठक गया है. लोकसभा चुनाव के दौरान राज्य में बीजेपी को जितने वोट मिले थे को आधार बनाया जाय तो झारखंड में पार्टी को साठ से ज्यादा सीटें मिलती. उसी बीजेपी को आखिर हुआ क्या, कैसे एक जोरदार पार्टी मई की गगनभेदी जीत के बाद यहां पाताल में आ गिरी, आखिर कहां चूक हुई है, इन सवालों के जवाब अभी खोजे जाने हैं.
फोकस में सोरेन परिवार:-
इन सबके बीच टीवी चैनलों पर एक परिवार आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. जी हां, वो दिशोम गुरु जी यानी शिबु सोरेन का परिवार. जेएमएम के मुखिया हेमंत सोरेन अपने पिता के पांव छू रहे हैं, गुरुजी गुनगुनी धूप में बैठे हुए हैं, पास ही उनका सारा परिवार मौजूद है. देखने में अति साधारण सा परिवार नजर आता है हालांकि गुरुजी का अतीत भी कम विवादों से से घिरा नहीं रहा, लेकिन ये कैसे हुआ ये सब जानना चाहते हैं.
आदिवासी पहचान का सवाल:-
झारखंड की जीत दरअसल इशारा करती है कि आदिवासी महत्वाकांक्षाओं को ज्यादा देर तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. जेएमएम की जोरदार वापसी इसी ओर इशारा करती है. दरअसल यहां बीजेपी ने गैरआदिवासी राजनीति को आधार माना और गैर आदिवासी रघुवार दास को राज्य की कमान सौंपी. जानकार मानते हैं कि आदिवासियों में रघुवर सरकार के आदिवासियों पर ध्यान न देने की शिकायत थी. साथ ही आदिवासी अपने बीच से ही कोई बड़ा नेता चाहते थे. जेएमएम की वापसी इसी बात का प्रमाण है.
अब सवाल ये है कि आदिवासी बहुल झारखंड में बीजेपी ने एक बार फिर एक गैर आदिवासी सीएम केंडिडेट क्यों बनाया. दरअसल इसके पीछे बीजेपी की जो मास्ट्रर स्ट्रोक स्ट्रेटजी है. लगता है वो अब काम नहीं कर रही. जो फार्मूला लगाकार बीजेपी ने हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र को पहले जीता था, अब वही स्ट्रेटजी उनकी मुसीबत बनती जा रही है. असल में बीजेपी ने नए राज्यों में अपनी पहुंच बनाने के लिए नए राजनीतिक ध्रुव बनाने की कोशिश की थी जो अब काम नहीं आ रही.
पहले की कारगर रणनीति:-
अगर हम पीछे मुड़ कर देखें तो पता चलेगा कि बीजेपी ने अधिकतर राज्यों में अपना आधार वहां मौजूद प्रमुख और प्रभावी जातिगत या क्षेत्रीय समूहों के इतर बनाया है. उदाहरण के लिए लंबे वक्त तक पटेलों का गुजरात की राजनीति में प्रभुत्व रहा, लेकिन नई व्यवस्था में पटेल समुदाय का सीएम नहीं है. बीजेपी की इस नीति के चलते उन्हें लंबे समय बाद गुजरात में कांग्रेस से बड़ी टक्कर का सामना करना पड़ा. हार्दिक पटेल बीजेपी के लिए एक बड़ी मुसीबत बनकर उभरे.
मराठी पहचान से महाराष्ट्र में हुई लामबंदी:-
कमोवेश यही हाल महाराष्ट्र में रहा जहां बीजेपी जब 2014 में पहली बार जीती तो उसने पुरानी परंपराओं को तोड़ते हुए एक गैर मराठी को सीएम बनाया. बीजेपी के ये नीति काफी हद तक कामयाब रही, लेकिन चुनावों में मराठा नाराजगी साफ नजर आई और जब शिवसेना ने सीएम पर दावा ठोक दिया तो यकायक सारे मराठा क्षत्रप एक साथ हो गए यहां नई परिस्थितियों में बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सत्ता से पीछे हटना पड़ा.
हरियाणा में गैरजाट की रणनीति से दिक्कत:-
हरियाणा का हाल भी ऐसा ही कुछ रहा. यहां बीजेपी ने गैरजाट राजनीति को अपना आधार बनाया. उसका ये दांव 2014 में सफल भी रहा और लंबे समय बाद हरियाणा में गैरजाट सीएम बना लेकिन इस साल हुए विधानसभा चुनाव में जाटों की लामबंदी ने बीजेपी को मुश्किल में डाल दिया और सूबे में उससे जाट नेटा दुष्यंत चौटाला की की पार्टी के साथ साझेदारी करनी पड़ी.
हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण में भी विफल रही भाजपा:-
दरअसल, चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर भी जोर दिया। तीसरे चरण के चुनाव से ठीक पहले नागरिकता संशोधन कानून संसद में पारित हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार में इसे मुद्दा बनाया। उधऱ भाजपा के दूसरे नेताओं ने चुनाव प्रचार में भव्य राम मंदिर की खूब बात की। बता दें कि झारखंड राज्य में 15 प्रतिशत के करीब अल्पसंख्यक है। पहले भी झारखंड के कई इलाके हिंदू-मुस्लिम हिंसा के चलते सुर्खियों में रहे हैं।
इधर, राज्य के कई गैर आदिवासी इलाके खासकर शहरी इलाके हिंदू मुस्लिम तनाव के लिए जाने जाते रहे हैं। लेकिन भाजपा को हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण कराने में सफलता नहीं मिली। लोगों ने स्थानीय मूलभूत मुद्दों पर वोट किया है। भाजपा हाईकमान को अब सोचना होगा कि आखिर कितनी देर तक राम मंदिर, धारा 370 के आधार पर भाजपा चुनाव लड़ेगी ? क्योंकि राज्य के कुछ वे विधानसभा सीटें भी भाजपा के हाथ से निकलती दिख रही है जहां हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की संभावना अक्सर रहती है।
तो फिर कैसे ठीक होगा ये नाड़ी दोष:-
नए हालात इशारा कर रहे हैं कि बीजेपी को न सिर्फ अपने मुद्दों बल्कि अपनी क्षेत्रीय नीतियों पर भी दोबारा से विचार करना होगा ताकि नए माहौल में नई सफलताएं गढ़ी जा सकें और हर दिन सिकुड़ते राज्यों के आधार को फिर से बढ़ाया जा सके. बड़ा सवाल ये कि खुद को सौ फीसदी सही मानने के नाड़ीदोष से बाहर निकल ऐसा करेगी या नहीं۔
