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Tuesday, March 10, 2020

सिंधिया को कांग्रेस का डबल झटका, लेकिन कांग्रेस नही झेल पा रही महाराज का सिंगल झटका

ग्वालियर। मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में युवा चेहरा यानी महाराज को आगे कर कांग्रेस ने सरकार तो बनाई लेकिन बहुत कोशिशों के बावजूद ज्योतिरादित्य सिंधिया सीएम नहीं बन सके। इसके छह महीने बाद ही लोकसभा चुनाव में हार सिंधिया के लिए दूसरा बड़ा झटका साबित हुई। सीएम ना बन पाने के बावजूद लगभग 23 विधायक ऐसे हैं, जिन्हें सिधिया के खेमे का माना जाता है। इसमें से छह को मंत्री भी बनाया गया। इन्हीं में से कुछ विधायकों ने कमलनाथ की सरकार को मुश्किल में डाल दिया है।
लोकसभा चुनाव में हार के बाद से ही ज्योतिरादित्य सिंधिया खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं। बार-बार मांग करने के बावजूद उन्हें मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष का पद भी नहीं मिला, जिसने आग में घी काम का काम किया है। इसी बीच शिवराज सिंह चौहान से मुलाकात ने विवाद को और हवा दे दी। हालांकि, ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि वह कांग्रेस कभी नहीं छोड़ने वाले हैं। नवंबर 2019 में कांग्रेस पार्टी के सभी पदों को छोड़कर दबाव बनाने की कोशिश की लेकिन उनकी यह कोशिश भी काम नहीं आई।
अब समझौते के मूड में नहीं हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया:-
ज्योतिरादित्य सिंधिया के बारे में कहा जा रहा है कि इस बार वह आर-पार के मूड में हैं। बीजेपी भी मौके के इंतजार में है। कांग्रेस के दिग्गज नेता कोशिश कर रहे हैं लेकिन सिंधिया मानने के मूड में नहीं हैं। 13 मार्च को राज्यसभा चुनाव के लिए नॉमिनेशन का आखिरी दिन है। कहा जा रहा है कि सिंधिया खुद के लिए राज्यसभा सीट या मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष का पद चाहते हैं। हालांकि, यह भी चर्चा है कि सिंधिया बीजेपी के साथ बात को इतना आगे बढ़ा चुके हैं कि अब वह कांग्रेस में नहीं लौटेंगे।
क्या है मध्य प्रदेश का मौजूदा संकट:-
मध्य प्रदेश सरकार के छह मंत्री समेत कुल 17 विधायक बेंगलुरु में हैं। ये सभी ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट के माने जाते हैं। कहा जा रहा है कि इन सभी ने अपने फोन बंद कर लिए हैं। चर्चा है कि सिंधिया अपने समर्थकों के साथ या तो बीजेपी जॉइन करने वाले हैं या फिर वह कांग्रेस से कोई बड़ी बात मनवाना चाहते हैं। हालांकि, अभी इस बारे में ज्योतिरादित्य सिंधिया का कोई भी बयान नहीं आया है।