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Tuesday, March 10, 2020

ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे पर तिलमिलाई कांग्रेस को याद आया झांसी की रानी का बलिदान

भोपाल. ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस से इस्तीफे पर पार्टी नेताओं में तीखी प्रतिक्रिया देखी जा रही है. सबने एक सुर से 1857 की घटना और फिर 1967 में मध्य प्रदेश में संविद सरकार बनने की घटना और सिंधिया परिवार के इतिहास पर उंगली उठायी. एक के बाद एक कांग्रेस नेताओं ने ट्विट किया और अपनी प्रतिक्रिया दी.
कमलनाथ सरकार में मंत्री जीतू पटवारी ने अपने ट्वीट में लिखा-एक इतिहास बना था 1857 में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान से, फिर एक इतिहास बना था 1967 में संविद सरकार से और आज फिर एक इतिहास बन रहा है. इन तीनों में यह कहा गया है कि हां हम हैं.
अरुण यादव का गुस्सा:-
पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव ने भी अपनी प्रतिक्रिया ट्वीट के ज़रिए दी. उन्होंने एक के बाद एक तीन ट्वीट किए. पहले ट्वीट में अरुण यादव ने लिखा-ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा अपनाए गए चरित्र को लेकर मुझे ज़रा भी अफसोस नहीं है.
दूसरे ट्वीट में अरुण यादव ने लिखा सिंधिया खानदान ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी जिस अंग्रेज हुकूमत और उनका साथ देने वाली विचारधारा की पंक्ति में खड़े होकर उनकी मदद की थी, आज ज्योतिरादित्य ने उसी घिनौनी विचारधारा के साथ एक बार पुनः खड़े होकर अपने पूर्वजों को सलामी दी है.
तीसरे ट्वीट में अरुण यादव ने लिखा-आने वाला वक़्त अपने स्वार्थों के लिए कांग्रेस कार्यकर्ताओं के 15 वर्षों तक किए गए ईमानदारी पूर्ण जमीनी संघर्ष के बाद पाई सत्ता को अपने निजी स्वार्थों के लिए झोंक देने वाले जयचंदों - मीर जाफरों को कड़ा सबक सिखाएगा.
लक्ष्मीबाई और सिंधिया फैमिली का क्या है रिश्ता:-
सिंधिया फैमिली पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने 1857 में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का साथ नहीं दिया था। कई बार राजनीतिक बयानबाजी में ये भी कहा जाता रहा है कि सिंधिया फैमिली ने लक्ष्मीबाई को युद्ध के दौरान कमजोर घोड़ा दे दिया था, जिसके चलते अंग्रेजों से युद्ध के दौरान उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। सुभद्रा कुमार चौहान की लिखी कविता में भी इन आरोपों का जिक्र मिलता है। हालांकि इन आरोपों का कोई ठोस ऐतिहासिक तथ्य नहीं मिलता है।
सिंधिया फैमिली के पक्ष में इतिहास का एक तर्क ये भी है:-
इतिहासकारों का एक तबका मानता है कि सिंधिया फैमिली के लिए यह कहना गलत है कि उन्होंने लक्ष्मीबाई के साथ धोखा किया था। इस बात को पुष्ट करने के लिए इतिहासकार बताते हैं, एक जून 1858 को जयाजीराव ग्वालियर से आगरा चले गए थे। वहीं तीन जून को रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लड़ते हुए ग्वालियर आई थीं इसलिए यह कहना कि सिंधिया फैमिली ने लक्ष्मीबाई का साथ नहीं दिया, गलत होगा।
हालांकि ये बात सभी इतिहासकार मानते हैं कि 1857 की क्रांति में सिंधिया फैमिली अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध नहीं करना चाहती थी, ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं थे। उस दौर के लगभग सभी राजपरिवारों ने युद्ध करने से मना कर दिया था। सिंधिया घराना उनमें से एक था।
इन राजाओं का मानना था कि अंग्रेजों के सामने उनकी सेना तनिक भी नहीं टिकेगी। ऐसे में युद्ध में जाने का फैसला अपने ही लोगों की हत्या कराने के समान होगा। हालांकि अंग्रेजों से लोहा लेने वाले और युद्ध नहीं करने वाले राजाओं के अपने-अपने तर्क हैं, कौन सही हैं कौन गलत यह देश की जनता अपने-अपने हिसाब से तय करती रही है।