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Tuesday, February 25, 2020

2/25/2020 10:17:00 AM

वो 'खूनी टेलीफोन', जो 80 साल पहले बना था लाखों लोगों के मौत की वजह

फीचर डेस्क। कोई फोन लाखों लोगों के मौत की वजह बन जाए, यह सुनने में बड़ा अजीब लगता है, लेकिन इसकी कहानी जब आप जानेंगे तो हैरान हुए बिना नहीं रहेंगे। यह टेलीफोन साल 1945 का बताया जाता है। साल 2017 में अमेरिका में इस फोन की नीलामी हुई थी, जिसमें यह करीब दो करोड़ रुपये में बिका था। हालांकि यह फोन किसने खरीदा था, इस बात का खुलासा नहीं किया गया है। यह टेलीफोन जर्मनी के खूंखार तानाशाह हिलटर का था। उसे दुनिया के सबसे क्रूर तानाशाहों में एक माना जाता है। मूल रूप से यह फोन काले रंग का था, जिसे बाद में लाल रंग में रंगा गया। इस फोन पर हिटलर का नाम और स्वास्तिक भी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद साल 1945 में इस टेलीफोन को बर्लिन में हिटलर के बंकर से बरामद किया गया था। तब से लेकर साल 2017 तक इस फोन को एक बक्से में संभालकर रखा गया था, जब तक कि इसकी नीलामी नहीं हो गई। हिटलर को यह फोन वेरमेच ने दिया था। कहते हैं कि 40 के दशक में इसी फोन से हिटलर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अपने नाजी सैनिकों को आदेश देता था और उसके बाद नाजी बंधक बनाए गए लोगों को गोली मारकर या गैस चेंबर में जलाकर मौत के घाट उतार देते थे। हिटलर यहूदियों का कट्टर दुश्मन था। कहते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड में हिटलर की नाजी सेना के बनाए यातना शिविरों में करीब 10 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, जिसमें ज्यादातर यहूदी थे। नाजियों का ये यातना शिविर पोलैंड में है, जिसे 'ऑस्त्विज कैंप' के नाम से जाना जाता है।

Wednesday, January 29, 2020

1/29/2020 05:54:00 PM

पढ़िए, कैसा था वो दिल दहलाने वाला बंटवारे का मंजर...जो झेला इन महिलाओं ने

नई दिल्ली। शाेरगुल बहुत था शहर में...चरम पर अराजकता थी। जल रहा था हर कोई विभाजन की आग में। बात है सन् 1947 की। याद है हर मंजर उस दौर का। सिहर उठे थे मेरे पड़ोसी..कि यात्रा के दौरान उनकी बेटी के साथ कुछ गलत हो सकता है और सोचो कैसे कुछ गलत होने के भय ने मां- बाप को विवश कर दिया बेटी की सांसों को वहीं थाम दिया...नरिंदर कौर ओबराय की यह आपबीती हर पढ़ने वाले को झकझोर कर रख देती है।
मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन पर नरिंदर कौर की तरह कई ऐसे महिला-पुरुषों की आपबीती प्रदर्शित की गई है जो 1947 में हुए बंटवारे की विभीषिका बयां करती है। महिलाओं की कहानियां गलियारे से गुजरते हर यात्री के कदमों को थाम लेती है। उन्हें सोचने पर मजबूर कर देती है कि कैसे लोगों ने उस दर्द को झेला होगा। 
कैसे मानवता शर्मसार हुई थी, हर कहानी पढ़ सिहर जाएंगे:-
प्रदर्शनी में गोपी भाटिया की चित्र प्रदर्शनी भावुक कर देती है। गोपी कराची- सिंध से बाम्बे (अब मुंबई) का सफर तय किया। उनकी आपबीती यहां कुछ इस तरह दर्ज है ‘बंटवारे के बाद हम कराची में ही रहा करते थे। 1948 की शुरुआत में धीरे-धीरे हमारे शहर में भी दंगे शुरू हुए। मेरे माता-पिता ने यहां से निकलने का फैसला किया, लेकिन ऐसा मुमकिन हो नहीं पा रहा था। हमने दंगे खत्म होने का इंतजार करने का निर्णय लिया। हालात बिगड़ते देख मेरे पिताजी ने हमें किसी तरह बाम्बे में एक रिश्तेदार के यहां छोड़ा और खुद कराची लौट गए। यह कहकर कि सब ठीक हो जाएगा। लेकिन उसके बाद एक महीने तक उनकी खबर नहीं मिली। फिर एक दिन बाद अचानक वो वापस लौट आए और तब यह बात साफ हो गई कि अब वापस लौटने का कोई प्रयोजन नहीं है।
बंटवारे का दर्द:-
परमजीत कौर धनोआ (लाहौर से पटियाला) ‘विभाजन के समय मैं मेडिकल कॉलेज के तीसरे साल में थी और हॉस्टल में रहती थी। हर तरफ दंगे फैल चुके थे। हमारा कॉलेज अनारकली बाजार के बीचो बीच था। हमनें लोगों को एक महीने तक मरते देखा, मदद मांगते हुए और रोते हुए देखा। वो दृश्य बहुत ही भयावह था। अगस्त में विभाजन की घोषणा के बाद मैंने कुछ दोस्तों के साथ विस्थापित होने का निर्णय किया। हम एक ट्रक पर सवार हुए जो अमृतसर जा रहा था, पूरा ट्रक भरा हुआ था। मैं किसी तरह अमृतसर आई और वहां से लुधियाना पहुंची, पर अपने परिवार को ढूंढने में असफल रही। तीन दिनों तक एक ट्रेन पर होने के बाद आखिरकार मैं जालंधर कंटोनेंट पहुंची और हजारों की भीड़ में किसी तरह अपने परिवार को ढूंढ पाई।
शहर जल रहा था:-
उषा भारद्वाज (लाहौर से दिल्ली) ‘मैं अपनी छुट्टियां बिताने कश्मीर गई हुई थी जब बंटवारे की घोषणा हुई। जैसे तैसे मैं हवाई जहाज पकड़ लाहौर रुकी और परिवार से मिली। वो शहर जिसे मैं बहुत अच्छे से जानती थी। मेरी आंखों के सामने दंगों से तहस नहस हो गया। मेरे भाई और बहन दिल्ली पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। दंगों के बीच में प्लेटफार्म पर खड़े हमारे साथ के एक मुसाफिर हिंसक हो गए, तब मेरे पिताजी ने उन्हें शांत कराया। परिवार को वहां से निकालने की हड़बड़ाहट में मेरा भाई स्टेशन के प्लेटफार्म पर ही छूटतेछूटते बचा। हमने यात्रा के दौरान बहुत सी दर्दनाक घटनाएं देखीं, जिन्हें भूल नहीं सकते।
बच्चों को पढ़ाकर सुकून मिलता:-
उषा छाबड़ा (रावलपिंडी से दिल्ली) ‘शुरुआत में मैं और मेरे भाई बहन अपनी चाची के पास गोयल बाजार में रहे। जब तक हमारे माता-पिता को ढूंढा ना गया। उसके बाद हम दिल्ली चले गए। यहां मिंटो रोड पर एक तीन कमरे वाले मकान में कुछ रिश्तेदारों के साथ ठहरे। मैंने अपनी पढ़ाई 1948 में फिर से शुरू की और साथ ही साथ मिंटो रोड करोल बाग में समाजसेवा भी शुरू की। मेरी ज्यादातर सेवाएं शरणार्थियों के बच्चों को पढ़ाने की होती थी।
जिंदगी की जद्दोजहद:-
पूरनचंद, मुझे याद है कि मेरे बड़े भाई और पिताजी गाजियाबाद से दिल्ली कपड़े बेचने के लिए जाया करते थे। मेरा परिवार गाजियाबाद में 2 साल तक रहा। तब हमें राजेंद्र नगर में यालपुर की संपत्ति के बदले में एक मकान मिला था। वह एक शरणार्थियों की कॉलोनी थी। हमारा घर 2 कमरों वाला छोटा मकान था। यहां मौजूद सभी शरणार्थियों की कहानी एक जैसी थी। सबने अपना घर पीछे छोड़ दिया था, जो कि पाकिस्तान बन गया था और यहां नई जगह बसने का प्रयास कर रहे थे। हमें बिजली नहीं मिल रही थी, पानी भी नहीं था। हमनें बहुत संघर्ष किया था।
ऐसे बंटोरी कहानियां:-
1947 विभाजन के अभिलेखागार की संस्थापक गुनीता सिंह भल्ला कहती हैं कि प्रदर्शनी का डिजाइन वास्तुकार अर्घो ज्योति ने तैयार किया गया है। ‘यह पहली बार है जब मेट्रो में इसका प्रदर्शन किया है, और मेट्रो स्टेशन पर इस काम को प्रदर्शित करने में बहुत बड़ा प्रतीक वाद है क्योंकि 1947 में सीमा पार करने के लिए लाखों लोग ट्रेनों पर निर्भर थे। कई लोग ट्रेनों में खो गए थे। सन् 2009 में पंजाब यात्रा के साथ विभाजन के मौखिक इतिहास का रिकार्ड संग्रहित शुरू किया। अब तक, आर्काइव ने 12 देशों की 36 भाषाओं में 8,000 कहानियों को रिकॉर्ड किया गया है।

Friday, January 24, 2020

1/24/2020 06:20:00 AM

वो महारानी, जिसने सैंडल में जड़वाए हीरे-मोती, सिंधिया महाराज से सगाई तोड़ किया था प्रेम विवाह

इतिहास डेस्क। भारत के महाराजा और महारानियों के किस्से भी गजब हैं. इसी में एक किस्सा कूच बिहार की महारानी इंदिरा देवी का भी है. वह अप्रतिम सुंदरी थीं और खासी फैशनपरस्त. उन्होंने इटली की एक जानी मानी जूता निर्माता कंपनी को 100 जोड़ी जूते बनाने का आर्डर दिया, जिसमें कुछ में हीरे और बेशकीमती रत्न लगाए जाने थे.
महारानी इंदिरा देवी इतनी खूबसूरत थीं कि अपने जमाने में उन्हें देश की सबसे सुंदर महिला माना जाता था. वो जयपुर की महारानी गायत्री देवी की मां थीं. रानी को बनने संवरने का बहुत शौक था. विदेशी फैशन के भी वो लगातार टच में रहती थीं. उन्होंने इटली की जिस कंपनी को सौ जोड़ी जूते बनाने का आर्डर दिया था. उसका नाम साल्वातोर फेरोगेमो था. ये कंपनी 20वीं सदी की सबसे फेमस डिजाइनर कंपनी मानी जाती थी. आज भी इस कंपनी के लग्जरी शो-रूम पूरी दुनिया में हैं.
खूबसूरती और शानदार पहनावे के लिए जानी जाती थीं:-
महारानी इंदिरा देवी बड़ौदा राज्य की राजकुमारी थीं. बाद में उनका विवाह कूच बिहार के महाराजा जितेंद्र नारायण से हुआ. इंदिरा देवी हमेशा अपनी खूबसूरती और पहनावे को लेकर सजग रहा करती थीं. देश में सिल्क, शिफॉन साड़ियों को ट्रेंड बनाने का श्रेय उनको दिया जाना चाहिए. जब सज संवर कर तैयार होती थीं तो उनका ग्रेस अलग ही लगता था.
साल्वातोर ने आत्मकथा में किया था महारानी का जिक्र:-
इटली के साल्वातोर फेरागेमो उनके पसंदीदा वेस्टर्न डिजाइनर्स में थे. साल्वातोर ने अपनी आत्मकथा में लिखा, एक बार महारानी ने उनकी कंपनी को जूते बनाने का आर्डर दिया, इसमें एक आर्डर इस तरह की सैंडल बनाने का था जिसमें हीरे और मोती जड़े हों. उन्हें ये हीरे और मोती अपने कलेक्शन के ही चाहिए थे. लिहाजा उन्होंने आर्डर के साथ हीरे और मोती भी भेजे थे.
इंदिरा की शादी की रोचक कहानी:- 
महारानी इंदिरा देवी 1892 में पैदा हुई थीं और 1968 में उनका निधन हुआ. उन्होंने 76 साल की जिंदगी पाई. बाद में महाराना जितेंद्र नारायण के निधन के बाद वो कूच बिहार राज्य की रिजेंट भी बनीं, क्योंकि उनका बेटा उस समय छोटा था.
हो चुकी थी सगाई लेकिन किसी और से हो गया प्रेम:- 
महारानी इंदिरा की शादी की भी रोचक कहानी है. बड़ौदा के गायकवाड़ राजवंश से ताल्लुक रखने वाली इंदिरा की सगाई बचपन में ही ग्वालियर के होने वाले राजा माधो राव सिंधिया से पक्की हो चुकी थी. इस बीच वो अपने छोटे भाई के साथ 1911 में दिल्ली दरबार में गईं, वहीं उनकी मुलाकात कूचबिहार के तत्कालीन महाराजा के छोटे भाई जितेंद्र से हुई. कुछ ही दिनों में उन्हें उनसे प्यार हो गया और उन दोनों ने शादी का फैसला किया.
इंदिरा को मालूम था कि उनके अभिभावकों को इसका पता लगेगा तो नाराज हो जाएंगे, क्योंकि इसमें कई मामले जुड़े हुए थे. इससे ग्वालियर के सिंधिया शासकों और बड़ौदा के बीच राजनीतिक संबंध बिगड़ जाएंगे. उस समय ग्वालियर राजघराना देश के विशिष्ट राजवंशों में था. शादी तोड़ने का मतलब था एक बड़े विवाद को खड़ा करना. वहीं जितेंद्र चूंकि महाराजा के छोटे भाई थे लिहाजा उनके राजा बनने के हालात भी नहीं नजर आ रहे थे.
खुद खत लिखकर तोड़ी सगाई:- 
तब इंदिरा देवी ने खुद साहस दिखाते हुए ये सगाई तोड़ दी, उस दौर में सोचा नहीं जा सकता था कि कोई 18 साल की राजकुमारी ऐसा भी कर सकती है. उन्होंने अपने मंगेतर को खत लिखा कि वो उनसे शादी नहीं करना चाहतीं. इसके बाद बड़ौदा में इंदिरा के पिता को ग्वालियर के महाराजा का एक लाइन का टेलीग्राम मिला, आखिर राजकुमारी के पत्र का क्या मतलब है.
इंदिरा देवी के पेरेंट्स बेटी के इरादों के बारे में जानकर स्तब्ध रह गए. हालांकि ग्वालियर के महाराजा इस मामले में बहुत शालीनता से पेश आए. उन्होंने फिर एक खत लिखकर इंदिरा के पेरेंट्स से कहा कि उनकी स्थिति समझ सकते हैं, इसके नीचे उन्होंने आपका बेटा लिखकर अपने हस्ताक्षर किए. हालांकि बेटी के कदम से अभिभावकों को गहरा झटका लगा था.
पेरेंट्स नहीं चाहते थे कि वो प्रेम विवाह करें:- 
इंदिरा के अभिभावकों ने ग्वालियर के राजघराने से सगाई का टूट जाना तो किसी तरह स्वीकार किया लेकिन उन्हें कतई मंजूर नहीं था कि उनकी बेटी जितेंद्र से शादी करे. क्योंकि उसकी इमेज प्लेबॉय की थी. उन्होंने जितेंद्र को चेतावनी दी कि वो उनकी बेटी से दूर रहें. लेकिन ये सब कुछ काम नहीं कर सका.
क्योंकि जितेंद्र और इंदिरा आपस में शादी करने का पक्का मन बना चुके थे.
पेरेंट्स ने कहा घर छोड़कर करें पसंद की शादी:- 
आखिरकार उनके पेरेंट्स को ये बात माननी पड़ी. उन्होंने इंदिरा से घर छोड़कर लंदन जाने को कहा. जहां दोनों की शादी हुई. इंदिरा और जितेंद्र ने लंदन के एक होटल में शादी की, जिसमें इंदिरा के परिवार से कोई मौजूद नहीं था. उन्होंने ब्रह्म समाज के रीतिरिवाजों से शादी की. शादी के कुछ ही समय बाद जितेंद्र के बड़े भाई और कूच बिहार के महाराजा राजेंद्र नारायण गंभीर तौर पर बीमार पड़े और उनका निधन हो गया. फिर जितेंद्र कूच बिहार के महाराजा बने. इस दंपति का आगे का जीवन खुशनुमा रहा. उनके पांच बच्चे हुए. हालांकि बाद में ज्यादा शराब पीने से जितेंद्र का भी जल्दी ही निधन हो गया.
ज्यादा समय यूरोप में बीतता था:-
फिर लंबे समय तक कूच बिहार का राजकाज महारानी इंदिरा देवी ने ही पांच बच्चों के साथ संभाला. इंदिरा की प्रशासकीय क्षमता औसत थी लेकिन सोशल लाइफ में उनकी सक्रियता गजब की थी. उनका ज्यादा समय यूरोप में गुजरा करता था.