लेखक:- बृजेश पाठक
मध्य प्रदेश में सत्तारूढ़ दल आजकल गुटीय राजनीति के संकट में जबरदस्त फसा हुआ। सभी को नजर आ रहा है। राजनीतिक समीकरणों पर निगाहें डालें तो सत्तारूढ़ दल में तीन गुट की राजनीति किसी भी राजनीतिक से छुपी नहीं है। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के पूर्व जनता ने ज्योतिरादित्य सिंधिया पर अपना विश्वास जताया था। इस कारण से ग्वालियर चंबल क्षेत्र में महाकौशल मालवा प्रांत से अधिक कांग्रेस को ताकत मिली थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेसका उभरता हुआ सितारा चेहरा है। जो कांग्रेस 15 साल से बैकफुट पर थी। उसे अपने दम पर आज सत्ता के दरवाजे पर ला खड़ा किया।
गत 8 माह से सरकार कांग्रेश की प्रदेश में हैं अभी तक कांग्रेस ने कोई भी अपना प्रदेश अध्यक्ष नहीं चुना इसका कारण कांग्रेश के जन ही बता सकते हैं। लेकिन यदा-कदा कभी-कभार जनता के बीच नेताओं की बयानी गवाही देती है की सत्ता के तथा कथित नेता किसी योग इमानदार राजनेता को संगठन की बागडोर सौंपना नहीं चाहते ऐसा प्रतीत हो रहा है। इसका ही कारण है की ज्योतिरादित्य जैसे कद्दावर नेता को कांग्रेश के नेता अभी तक समझ नहीं सके यदि समय रहते कांग्रेश के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चापलूस सलाहकारों ने विचार नहीं किया तो मध्य प्रदेश से भी कांग्रेश की सरकार की नाव गहरे पानी में डूब सकती है।
मध्य प्रदेश कांग्रेश के अध्यक्ष पद की लड़ाई अब प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है, ज्योतिरादित्य सिंधिया इस पद के लिए काफी गंभीर हैं और सीएम कैंडिडेट पद से दो बार समझौता करने के बाद अब किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं है। इधर कमलनाथ की काला वादियां और दिग्विजय सिंह की जादूगरी भी कमजोर नहीं पढ़ रही एक बार फिर वर्चस्व का टकराव शुरू हुआ है। 1960 के दशक में भी ऐसा ही कुछ हुआ था और ग्वालियर राजघराने की राजमाता विजय राजे सिंधिया ने कांग्रेस की चलती सरकार गिरा दी थी। सवाल यह है कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया के मन में भी ऐसा ही कोई प्लान है।
मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट तीसरी सबसे बड़ी ताकत है, सिंधिया गुट से सरकार में छह मंत्री हैं। तख्तापलट हो पाएगा या नहीं यह तो समय ही बताएगा। परंतु इतना जरूर तय है कि सरकार भरभरा कर चारों खाने चित हो जाएगी। हालांकि कमलनाथ कैंप के एक कद्दावर नेता का मानना है कि यदि ज्योतिराज सिंधिया ने कांग्रेश छोड़ी तो वह अकेले रह जाएंगे। उनके छह मंत्री इस्तीफा नहीं देंगे। इधर मंत्रियों के अलावा कुछ अन्य कांग्रेसी नेताओं ने जरूर दावा किया है कि यदि सिंधिया के साथ अन्याय हुआ तो वह इस्तीफा दे देंगे। समय रहते कांग्रेश के राष्ट्रीय नेताओं को सिंधिया के प्रदेश अध्यक्ष बनने की मांग पर विचार करना चाहिए।
याद रहे कांग्रेश को सबक क्यों सिखाया था राजमाता सिंधिया ने:-
मध्य प्रदेश के बुजुर्ग कहानियों में बताते हैं कि पचमढ़ी में कांग्रेश कार्यकर्ता सम्मेलन में सीएम डी पी मिश्रा ने राजाशाही पर तीखी टिप्पणी की और लोकतंत्र को इसका दुश्मन बता दिया। दूसरी कहानी बताते हैं कि विश्वविद्यालय छात्रों की मांग को तत्कालीन कांग्रेश मुख्यमंत्री ने ठुकरा दिया था। इस बात की चर्चा राजमाता विजय राजे सिंधिया ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी से की थी। परिस्थिति बस इंदिरा गांधी ने राजमाता सिंधिया को उचित मार्गदर्शन नहीं दे पाई। इस कारण से राजमाता सिंधिया ने कांग्रेश से इस्तीफा दिया।
राजमाता ने तख्तापलट कैसे किया:-
राजमाता के कांग्रेश छोड़ने के बाद पार्टी में दरारें पड़ने लगी। पार्टी के कई बड़े नेता डीपी मिश्रा के स्वभाव से नाराज हो गए थे। इसका फायदा राजमाता ने उठाया कांग्रेश के करीब 35 विधायक सतना के गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेश से अलग हो गए और राजमाता के पास पहुंचे राजमाता ने कांग्रेश का तख्तापलट कर दिया और गोविंद नारायण सिंह को सीएम बनाया वह खुद सदन की नेता चुनी गई। इस तरह मध्य प्रदेश के इतिहास में पहली बार संवेद सरकार बनी यानी मिले-जुले विधायकों से गठित की गई । हालांकि संविदा सरकार महज 19 माह ही चल पाई और गोविंद नारायण ने 10 मार्च 1969 को इस्तीफा दे दिया।
पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को मध्य प्रदेश के हजारों से लेकर लाखों कांग्रेसी कार्यकर्ता अपना प्रिय नेता मानते हैं इसी का कारण है कि आज मध्य प्रदेश के ग्वालियर, मुरैना, भिंड, दतिया, अशोकनगर, शिवपुरी, गुना, विदिशा, जबलपुर, छतरपुर, टीकमगढ़, निवाड़ी, सीहोर, भोपाल, उज्जैन, मंदसौर, इंदौर आदि जिलों में सिंधिया के समर्थन में लोग मांग कर रहे हैं।
