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Friday, October 4, 2019

भूतों की दुनिया मानो या न मानो ये घटना है उस ज़माने की जब...

ये दुनिया अलग अलग विचार धाराओं के लोगों से बानी हुई है कुछ लोग जो मानते हैं के ये दुनिया के बाहर भी एक दुनिया है जिसे हम भूतों की दुनिया कहते हैं। मेरे विचार से भूत मतलब जो बीत चूका है, अगर आप मानते है तो है अगर आप नहीं मानते तो वह नहीं है। बिल्कुल वैसे ही जैसे आप भगवान् को मानते है। आज मैं आपको ऐसे ही कुछ लोगो के बारे में बताने जा रही हूँ जो भूत प्रेत में कम विश्वास रखते हैं, परन्तु इस घटना के बाद कोई दो राहें नहीं उन्हें विश्वास करना ही पड़ा।
बात उस रात की है जब उज्जैन रेडियो स्टेशन में कुछ लोग मौजूद थे, रात के कुछ 9 बज रहे थे करारी ठण्ड के दिसंबर का महीना और चारों तरफ घना कोहरा था, थोड़ी दूर भी सब धुंदला सा दिख रहा था। बनर्जी सर जो के एउरोपों कार्यक्रम के इंचार्ज थे, स्टूडियो से ऐसे ही टहलते हुए बहार निकलकर लॉन में आये तो वहां कुछ दूरी पर लगे आम के पेड़ के नीचे एक पुरूष की छाया देखी। अपना दिमागी वहां समझकर ने ध्यान नहीं दिया और कुछ और ही ख्यालो में खो गए। लेकिन कुछ ही देर में बनर्जी सर ने कुछ ऐसा पाया के डर के मारे उनके होश ही उड़ गए।
इतनी सी देर में बैनर्जी सर ने लॉन में रखी मेज को हवा में उड़ते हुए और नाचते हुए देखा, उनोहने देखा की से हवा चल रही है सीढ़ी के दरवाज़े एक दूसरे से टकराकर ज़ोर ज़ोर से आवाज़ कर रहे हैं। हवा में टहलती कुर्सी भी उस दरवाज़े से टकरा कर टेढ़ी हो गयी।
डर से कांपते हुए बैनर्जी साहब मेज पर रखे टेलीफोन तक पहुंचे, कांपते हुए हाथों से उनोहने टेलीफोन उठाया और ड्यूटी रूम में फोन करके साड़ी वार्ता विस्तार में कहे डाली।
उन्होंने बताया के देर रात गलियारे में कोई छाया टहल रही है जिसका कद लंबा, और कांति अंग्रेज़ो जैसी है , यह सुनकर ड्यूटी रूम में मौजूद लोग लॉन में जा पहुंचे। ये घटना यही कोई 1945 – 1946 की मानी जाती है। कहा जाता है इस घटना के बाद बैनर्जी साहब ने इस बात का कभी भी ज़िक्र नहीं किया।