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Thursday, May 28, 2020

5/28/2020 06:21:00 AM

DNA ANALYSIS: 24 घंटे में अचानक चीन क्‍यों पड़ा नरम, जानें 'इनसाइड स्टोरी'

नई दिल्ली: लद्दाख सीमा पर चीन की हरकतों के बारे में मंगलवार को हमने आपको विस्तार से समझाया था. हमने ये बताया था कि चीन के इरादे क्या हैं और वो क्यों अचानक सीमा पर भारत से भिड़ रहा है? लेकिन जिसके पास संयम है और जिसके पास शक्ति है, उसका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता. भारत ने अपने संयम और शक्ति से चीन को ऐसा जवाब दिया है कि 24 घंटे के अंदर उसके तेवर बदल गए हैं. इसे चीन के तीन बयानों से समझ सकते हैं. 
मंगलवार को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी सेना को युद्ध की तैयारी तेज करने के लिए कहा था. वैसे तो चीन के राष्ट्रपति ने ये बयान खासतौर पर ताइवान और अमेरिका के लिए दिया था, लेकिन इस बयान को भारत के संदर्भ में भी देखा जा रहा था, क्योंकि चीन की सेना लद्दाख सीमा पर भारत को आक्रामक तेवर दिखा रही है. 
इसके बाद दूसरा बयान चीन के विदेश मंत्रालय का आया. उसने कहा कि भारत के साथ सीमा पर हालात स्थिर हैं और काबू में हैं, दोनों देशों के पास बातचीत करके मुद्दों को हल करने के माध्यम मौजूद हैं. 
तीसरा बयान भारत में चीन के राजदूत का आया. उन्होंने कहा कि दोनों देश कोरोना वायरस से लड़ रहे हैं और इस वक्त रिश्तों को मजबूत करने की जरूरत है. चीन के राजदूत ने कहा कि दोनों देश एक दूसरे के लिए खतरा नहीं बल्कि अवसर हैं. रिश्तों पर मतभेद हावी नहीं होने चाहिए और बातचीत से ही मतभेदों का समाधान निकालना चाहिए. 
अब इन बयानों से यही समझा जाना चाहिए कि चीन अब बातचीत की टेबल पर आना चाहता है. पहले वो लद्दाख में अपने सैनिकों की संख्या बढ़ाकर भारत को धमकाना चाहता था, और भारत को सड़क बनाने से रोकना चाहता था, लेकिन भारत के सख्त रवैये से चीन को लग गया है कि उसके हथकंडे भारत के सामने नहीं चल पाएंगे. 
क्योंकि भारत ने साफ कह दिया था कि सीमा पर अपने इलाके में सड़क बनाना भारत बंद नहीं करेगा. इंफ्रास्ट्रक्चर पर उतनी ही रफ्तार से काम होगा, जितनी रफ्तार से पिछले कुछ वर्षों से काम हो रहा है.
सीमा पर चीन ने अपने सैनिकों की संख्या बढ़ाई तो भारत ने भी उसी के बराबर अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी है. यानी भारत ने चीन के आक्रामक रवैये के सामने किसी भी दबाव में आने से इनकार कर दिया.
भारत चीन को ठीक उसी तरीके से जवाब दे रहा है, जैसा जवाब दो वर्ष पहले उसने डोकलाम में दिया था. चीन की हरकतों को भारत हल्के में नहीं ले रहा है, ना ही किसी उकसावे में आकर काम कर रहा है. 
मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लद्दाख के हालात पर मीटिंग की थी. इसमें सेना की तरफ से प्रधानमंत्री को मौजूदा हालत और तैयारियों पर रिपोर्ट दी गई और तनाव बढ़ने की स्थिति में विकल्पों के बारे में सुझाव दिए गए. यानी अगर तनाव बढ़ता है तो फिर क्या क्या किया जा सकता है? आज सेना के बड़े अधिकारियों की तीन दिन की Commanders’ Conference भी शुरू हुई है, जिसमें सेना प्रमुख की सेना के कमांडरों के साथ मौजूदा हालात पर चर्चा हो रही है. 
ये तो सेना की तैयारियों से जुड़ा मामला है, लेकिन लद्दाख के मामले को लेकर प्रधानमंत्री की फिर वही रणनीतिक टीम एक्शन में आई है, जिसने डोकलाम विवाद को हल करने में मुख्य भूमिका निभाई थी. इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और विदेश मंत्री एस जयशंकर का नाम है. इसी टीम ने 2017 में डोकलाम विवाद पर भारत की रणनीति बनाई थी, जो विवाद 73 दिन तक चला था. जनरल बिपिन रावत तब सेना प्रमुख थे और एस जयशंकर तब भारत के विदेश सचिव थे. 
चीन के साथ सीमा विवाद तो पहले भी होते रहे हैं, सैनिकों के बीच धक्कामुक्की और झड़प भी होती रही है, लेकिन बातचीत से मामला खत्म हो जाता था. इस बार ऐसा हुआ है कि लद्दाख में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के पास कई जगहों पर चीन के हजारों सैनिक बंकर बनाकर और टेंट लगाकर बैठ गए. लेकिन चीन के इस उकसावे पर भारत ने बौखलाकर नहीं, शांत होकर संयम और शक्ति से जवाब दिया. जानकारी के मुताबिक भारत ने भी अपने 10 से 12 हजार सैनिकों को आगे बढ़ने और तैयार रहने को कहा है. 
भारतीय सेना ने साफ संदेश दिया है कि वो चीन को सीमा पर स्थिति बदलने नहीं देगी. जिन पांच जगहों पर चीन ने घुसपैठ की, वहां उनकी हर हरकत पर पूरी नजर रखी जा रही है. 
भारत ने साफ कह दिया है कि उसके सैनिक अपने फॉरवर्ड पोजीशन से पीछे नहीं हटेंगे. भारत ने ये भी तय किया है कि अगर जरूरत पड़ी तो वो सीमा पर और संसाधन लगाएगा. सीमा के हालात पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और एनएसए अजीत डोवल की लगातार नजर है. 
लद्दाख सीमा पर भारत से उलझा चीन, ये सोच रहा था कि वो भारत को झुका लेगा, डरा-धमका लेगा और अपनी बात मनवाने पर मजबूर कर देगा, लेकिन भारत ने भी चीन को सीधे संदेश दे दिए हैं, कि ये 1962 का भारत नहीं, नया भारत है. हर हाल में भारत अपने हितों की रक्षा करेगा और चीन उसी तरह से जवाब देगा, जैसा जवाब डोकलाम में दिया था. 
गलवान घाटी में तो चीन ने अपने सैनिकों को उस जगह तक तैनात कर दिया, जो जगह भारत के नियंत्रण वाली मौजूदा सीमा के तीन किलोमीटर अंदर है. इसी तरह पेंगांग लेक के पास भी उसने सैन्य ताकत बढ़ा दी है, जो रणनीतिक रूप से बहुत अहम है. अभी इस लेक के एक तिहाई हिस्से पर ही भारत का कब्जा है. 
चीन ऐसा इसलिए कर रहा है कि क्योंकि उसे लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर भारत के तेजी से बनते इंफ्रास्ट्रक्चर से बहुत परेशानी हो रही है. उसे लग रहा है कि उसकी रणनीतिक स्थिति कमजोर हो रही है. लद्दाख में पिछले वर्ष भारत ने 255 किलोमीटर लंबी सड़क जो बनाई है, उसे चीन बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है. इस सड़क के जरिए मौजूदा टकराव वाली गलवान घाटी तक पहुंचने का रास्ता भी है. 
भारत सीमा पर सख्ती दिखाना जानता है तो बातचीत की टेबल पर संयम बरतना भी भारत को आता है. इसीलिए पिछले 24 घंटों में चीन इस मुद्दे पर नर्म पड़ गया है. आप चीन की सोच में आए इस बदलाव को चीन की पांच परेशानियों से समझिए जिन परेशानियों का चीन इस समय सामना कर रहा है. 
पहली परेशानी है कोरोना वायरस की महामारी जिससे चीन अब भी संघर्ष कर रहा है. दूसरी परेशानी है कोरोना वायरस को लेकर चीन के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय जांच का दबाव. चीन की तीसरी परेशानी है अमेरिका के साथ उसका विवाद. अमेरिका ने अब साफ कर दिया है कि जब तक चीन कोरोना वायरस को लेकर जिम्मेदारी भरा व्यवहार नहीं करता, तब तक चीन के साथ रिश्ते सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं है.
चीन की चौथी परेशानी है HONG KONG. जहां फिर से विरोध प्रदर्शन शुरु हो गए हैं. ये विरोध प्रदर्शन चीन द्वारा प्रस्तावित उस कानून के विरोध में हो रहे हैं जिसके जरिए चीन HONG KONG की आजादी कुचलना चाहता है. 
चीन की पांचवी परेशानी है पूरी दुनिया में ताईवान के लिए बढ़ता समर्थन. चीन ताईवान को अपना हिस्सा मानता है और वो उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई की धमकी भी दे चुका है, लेकिन अब पूरी दुनिया धीरे धीरे ताइवान का समर्थन कर रही है और चीन के लिए ये बहुत बड़ी कूटनीतिक विफलता है. 
आज हमने चीन के व्यवहार में आए इस बदलाव पर कुछ विशेषज्ञों से बात की. उनसे बातचीत के आधार पर तीन निष्कर्ष निकलकर आए. पहला- चीन के रवैये में बदलाव आया है और Back Channel Diplomacy काम कर रही है. 
दूसरा- चीन गंभीर सवालों से खूबसूरत शब्दों की आड़ में बचना चाहता है. उदाहरण के लिए चीन अब भारत के साथ शांति और सौहार्द की बात कर रहा है लेकिन ये नहीं बता रहा कि उसने लद्दाख में ये कदम किस नियत से उठाया. 
और तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि लद्दाख में विवाद तभी थमेगा जब चीन अपनी सेनाओं को वापस बुला लेगा. क्योंकि ये पूरी दुनिया जानती हैं कि इसमें गलती भारत की नहीं सिर्फ चीन की है, और उसी ने बिना उकसाए ये आक्रमक रवैया अपनाया है. 
भारत को दबाव में लाने के लिए चीन ने लद्दाख में नई चाल चली, लेकिन चीन अपने ही इस खेल में फंस गया है. इसी बीच अमेरिका से एक बड़ा बयान आया है, जिसने सबको हैरान कर दिया. ये बयान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प का है. 
डोनल्ड ट्रम्प ने आज Tweet करके भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की पेशकश कर दी.  ऐसा पहली बार हुआ है, अमेरिका ने भारत और चीन के आपस के मामले में इस तरह से बीच-बचाव करने का प्रस्ताव दिया है. 
वैसे तो डोनल्ड ट्रम्प इससे पहले भारत और पाकिस्तान के मामले में इसी तरह की बात कर चुके हैं, लेकिन भारत और चीन के मामले की बात अलग है. और जब इन दो बड़े देशों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति बातचीत या मध्यस्थता का प्रस्ताव दें तो फिर सवाल यही उठता है कि इस पर चीन की क्या प्रतिक्रिया होगी, क्योंकि चीन कोरोना वायरस की वजह से इस वक्त अमेरिका का दुश्मन नंबर वन बन चुका है. वैसे भारत और चीन के सीमा विवाद पर अमेरिका की पहले से ही नजर रही है. कुछ दिन पहले अमेरिका की एक टॉप डिप्लोमेट ने कहा था कि भारत की सीमा पर चीन जिस तरह की हरकतें कर रहा है, वो उसके आक्रामक रवैये को दिखाता है. 
ये सिर्फ इत्तेफाक नहीं था कि चीन के तेवर नरम पड़े तो नेपाल भी भारत के साथ टकराव से पीछे हटता दिख रहा है. नेपाल ने अपने जिस नए नक्शे पर भारत से लड़ने के लिए तैयार था, उस नक्शे पर नेपाल की संसद में चर्चा नहीं हो सकी. मंगलवार को नेपाल की संसद में इसको लेकर एक संवैधानिक सुधार पर प्रस्ताव पेश होना था, लेकिन वो प्रस्ताव पेश नहीं हुआ. इसी वजह तो नेपाल की घरेलू राजनीति बताई जा रही है, लेकिन माना यही जा रहा है कि भारत के कड़े रुख के बाद नेपाल बैकफुट पर आ गया. दरअसल नेपाल ने अपना नया नक्शा जारी करके भारत के कई हिस्से नेपाल में दिखाए थे. जिन स्थानों को नेपाल ने अपने देश के नक्शे में दिखाए थे, उन सभी जगहों पर भारत का ही हमेशा से कब्जा रहा है और इस पर नेपाल को कभी आपत्ति नहीं हुई, लेकिन ऐसा माना जाता है कि चीन के इशारे पर नेपाल ने भारत के साथ नए विवाद को जन्म दिया. लेकिन भारत ने नेपाल को साफ कह दिया था कि वो इस तरह के विस्तारवादी दावों को कभी स्वीकार नहीं करेगा. 
चीन के साथ मौजूदा सीमा विवाद, भारत को आजादी के बाद विरासत में मिला. भारत और चीन के बीच में कई इलाकों में Line Of Actual Control यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा स्पष्ट नहीं है और बार-बार यही तनाव की वजह भी बनती है. भारत और चीन के बीच 3500 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी Line Of Actual Control है. चीन जान-बूझ कर सीमा विवाद का हल नहीं करना चाहता और समय-समय पर इसका इस्तेमाल भारत पर दबाव बनाने के लिए करता रहता है. 
लद्दाख में नए विवाद और चीन की हरकतों के बाद अक्साई चिन पर भी लोग बात करने लगे हैं. ये वो इलाका है, जो भारत का ही हिस्सा है, लेकिन इस पर चीन का अवैध कब्जा है. हम इसके इतिहास के बारे में आपको बताते हैं. 1865 में ब्रिटिश शासनकाल में Civil Servant रहे, ब्रिटेन के W. H. Johnson ने एक वैचारिक रेखा खींची थी, जिसके मुताबिक अक्साई चिन का इलाका जम्मू-कश्मीर में आता है. इसको 'जॉनसन लाइन' कहा जाता है. भारत का इसी ऐतिहासिक आधार पर अक्साई चिन पर दावा है. 
लेकिन चीन ने इस लाइन को कभी नहीं माना और 1951 से अक्साई चिन पर कब्जा करने वाली चालें चलने लगा. चीन ने पहले 1951 में एक सड़क के जरिए तिब्बत को चीन के शिनजियांत प्रांत से जोड़ा फिर इसी से जुड़े इलाकों में सड़कें बनकर अक्साई चिन पर कब्जा करने के इरादे दिखाने लगा. भारत ने तब तक इस पर ध्यान नहीं दिया. इसके बाद 1962 का युद्ध हुआ तो भारत का अक्साई चिन चीन के पास चला गया.
1962 के युद्ध के वक्त भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे. कांग्रेस पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं कि कि पहले 1948 में जम्मू कश्मीर का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के हाथों गंवा दिया. फिर 1962 के युद्ध में अक्साई चिन को चीन के हाथों गंवा दिया. ये करीब 38 हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका है, जो चीन के अवैध कब्जे में है. 

Tuesday, May 19, 2020

5/19/2020 07:56:00 AM

अलर्ट: दूसरी बार आ रहा महाचक्रवात, ‘चक्रवात अम्फान’ से निपटने सेनाएं हाईअलर्ट पर

नई दिल्ली। बंगाल की खाड़ी में उठे चक्रवात ‘अम्फान’ के 20 मई को विकराल रूप के साथ भारतीय तट से टकराने का अनुमान है। इससे पश्चिम बंगाल और ओडिशा के तटीय इलाकों में भारी तबाही हो सकती है। इससे निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने व्यापक इंतजाम किए हैं। इन राज्यों में राहत और बचाव के लिए एनडीआरएफ की 32 टीमें तैनात की गई हैं और 9 टीमों को स्टैंडबाई में रखा गया है। किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए सेना, एयरफोर्स, नेवी और कोस्ट गार्ड की टीमों को भी अलर्ट पर रखा गया है
एनडीआरएफ के डीजी एसएन प्रधान और भारतीय मौसम विभाग के डीजी मृत्युंजय महापात्र ने सोमवार रात एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस तूफान के बारे में विस्तृत जानकारी दी। महापात्र ने बताया कि ‘अम्फान’ तेजी से विकराल रूप धारण करता जा रहा है। यह 16 मई को बंगाल की खाड़ी में उठा था और सोमवार सुबह साढ़े 11 बजे सुपर साइक्लोन में तब्दील हो गया। 20 मई को दोपहर से शाम के बीच इसके सुंदरबन में दीघा और हटिया के बीच तट से टकराने का अनुमान है।
एजेंसियों पर दोहरी चुनोती:-
कोरोना संकट में एजेंसियों के सामने दोहरी चुनौती
राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) के प्रमुख एस.एन. प्रधान ने सोमवार को कहा कि महाचक्रवात को एनडीआरएफ हल्के में नहीं ले रहा है क्योंकि भारत दूसरी बार इस तरह के चक्रवात का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि यह एक बहुत महत्वपूर्ण घटना है क्योंकि 1999 के बाद भारत में आने वाला यह दूसरा प्रचंड चक्रवाती तूफान होगा। महानिदेशक ने कहा कि उनके बल ने चक्रवात से प्रभावित होने वाले ओडिशा और पश्चिम बंगाल राज्यों के लिए 53 टीमों को तैयार रखा है। उन्होंने कहा, ‘यह एक दोहरी चुनौती है क्योंकि चक्रवात कोविड-19 महामारी के समय आ रहा है, हम सभी एहतियात बरत रहे हैं।’
NDRF ने तस्वीर से समझाया कैसी है तैयारी।
6 मीटर ऊंची लहरें उठने की आशंका:-
इससे पश्चिम बंगाल के उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिलों तथा पूर्वी मिदनापुर में भारी तबाही हो सकती है। साथ ही कोलकाता और हुबली में भी नुकसान की आशंका है। इस दौरान 165 से 175 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवा चलेगी और कई स्थानों पर 12 से 20 सेमी तक भारी बारिश हो सकती है। ओडिशा में इसका प्रभाव थोड़ा कम रहने का अनुमान है। तूफान से दौरान सामान्य से 4 से 6 मीटर ऊंची लहरें भी उठ सकती हैं। इससे समुद्र का खारा पानी अंदर तक आ सकता है जिससे फसलों, मकानों और पेयजल को नुकसान हो सकता है।
तेज हवा के कारण कच्चे और पुराने पक्के मकानों को नुकसान हो सकता है। उन्होंने इस दौरान मछुआरों को समुद्र में नहीं जाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि लोगों को घरों में ही रहना चाहिए और निचले इलाके के लोगों को सुरक्षित जगह पर पहुंचाया जाना चाहिए।
एनडीआरएफ की टीमें तैनात:-
एनडीआरएफ के डीजी ने कहा कि तूफान जिस जगह तट से टकराएगा, वह रिहायशी इलाका है और इस कारण जानमाल के नुकसान की भारी आशंका है। केंद्र सरकार ने इसे गंभीरता से लिया है। आज नेशनल क्राइसिस मैनेजमेंट कमेटी की बैठक हुई, फिर गृह मंत्री ने तैयारियों की समीक्षा की और अंत में प्रधानमंत्री ने भी उच्च स्तरीय बैठक की अध्यक्षता की। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और स्थानीय पुलिस मिलकर तैयारियों में जुटे हैं। पश्चिम बंगाल में एनडीआरएफ की 19 और ओडिशा में 13 टीमें तैनात की गई हैं। साथ ही कई टीमों को स्टैंडबाई पर रखा गया है।
इसके अलावा 6 बटालियनों को हॉट स्टैंडबाई पर रखा गया है। वायु सेना के साथ समन्वय किया गया है ताकि आपात स्थिति में इन टीमों को सी-130 के जरिए प्रभावित इलाकों में पहुंचाया जा सके। उन्होंने कहा कि देश कोरोना और अम्फान की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। राहत एवं बचाव के दौरान कोरोना संक्रमण को रोकने लिए सभी एहतियाती कदम उठाए गए हैं।

Wednesday, May 13, 2020

5/13/2020 03:36:00 PM

सामाजिक दूरी हटी, कोरोना महामारी बढ़ी... दो साल तक रहने वाला है कोरोना-काल

विशेष डेस्क। ताजा अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि कोरोना महामारी के लंबे समय तक बने रहने के आसार हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि दुनियाभर में सिर्फ एक दौर की सामाजिक दूरी से काम नहीं चलेगा। हमें अगले दो साल के लिए बचाव के इंतजाम करने होंगे।
उनका अनुमान है कि संक्रमण का भविष्य भौगोलिक स्थिति, मौसम से लेकर रोकथाम नीतियों, सामाजिक दूरी और हर्ड इम्युनिटी जैसे अलग-अलग कारकों पर निर्भर करेगा। लिहाजा, निकट भविष्य में संक्रमितों की तादाद कम होने मात्र से निश्चिंत होकर नहीं बैठना चाहिए। आगे भी संक्रमण रह-रहकर सामने आता रहेगा या इसमें पहले के मुकाबले अचानक इजाफा भी देखने को मिल सकता है।
वायरस फैलने की तीन स्थितियां:-
हार्वर्ड एचटी चान स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ के महामारी विशेषज्ञ डॉ मार्क लिपसिच के मुताबिक, निकट भविष्य में संक्रमण थमना मुश्किल है। लिपसिच हाल ही में हुए दो अध्ययनों के सह-लेखक रहे हैं।
इनमें एक अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा और दूसरा हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हुआ है। अध्ययन में आगामी महीनों में महामारी के संभावित स्वरूप पेश किए गए हैं। एक अध्ययन में कोरोना की तीन स्थितियां बताई गई हैं तो दूसरे में मौसम, हर्ड इम्युनिटी और सामाजिक दूरी पर फोकस किया गया है। 
..तो ऐसे फैलेगा कोरोना, शिखर और गर्त
इसके तहत कोरोना की मौजूदा लहर में ज्यादा मामले सामने आएंगे। फिर इसमें गिरावट के बाद इसी साल दोबारा संक्रमितों का ग्राफ ऊपर चढ़ने लगेगा। 2022 तक सतत उतार-चढ़ाव के बाद महामारी समाप्त हो जाएगी।
लौटकर आएगा...
मौजूदा लहर कमजोर पड़ने के बाद संक्रमण सर्दियों में बड़ी ऊंचाई पर पहुंच जाएगा। फिर यह तेजी से नीचे आएगा और इसके बाद दो साल तक महामारी छोटी-छोटी लहरों में आती रहेगी। इसे फॉल पीक मॉडल कहते हैं। यह स्थिति 1918-19 में आए स्पैनिश फ्लू महामारी जैसी होगी। 
धीमी लहर...
मार्च से मई तक शीर्ष पर पहुंचने के बाद महामारी बिना उतार-चढ़ाव के 2022 तक बहुत मंथर गति से जारी रहेगी। इन संभावनाओं के मद्देनजर विशेषज्ञों का कहना है कि हमें अगले 18-24 माह के लिए कोविड संक्रमण के लिए तैयार रहना चाहिए। इस दौरान विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में हॉट-स्पॉट सामने आते रहेंगे।
सामाजिक दूरी, हर्ड इम्युनिटी और मौसम की भूमिका:-
दूसरे अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कहा है कि आमतौर पर प्रति दस हजार लोगों में 35 मामले सामने आने पर सामाजिक दूरी अपनाई जाने लगती है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर इसका पैमाना अलग हो सकता है। इसके बाद, प्रति दस हजार पांच मामले रह जाने पर सामाजिक दूरी में ढिलाई दी जाती है। वहीं, हर्ड इम्युनिटी का पैमाना 55 फीसदी आबादी में प्रतिरक्षा को माना जाता है। महामारी के प्रसार में एक अन्य बड़ा कारक मौसम है। शोधकर्ताओं का कहना है कि गर्म दिनों में वायरस धीमा हो जाता है।हालांकि, इस साल वायरस की अतिसक्रियता के कारण गर्मी में भी बड़ी आबादी जोखिम में रहेगी।
सतर्कता के साथ रियायत:- 
एक दूसरे मॉडल के अनुसार, शोधकर्ताओं ने क्रिटिकल केयर क्षमता को दोगुना करने पर जोर दिया है ताकि सामाजिक दूरी के पैमानों में ढील दी जा सके। उनका कहना है कि इससे प्रति दस हजार 70 लोगों में संक्रमण होने पर सामाजिक दूरी अपनाई जा सकती है।
सामाजिक दूरी, बहुत जरूरी:-
कुल मिलाकर शोधकर्ताओं ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि महामारी नियंत्रित करने के लिए सामाजिक दूरी का एक चरण पर्याप्त नहीं होगा। इसे हटाने के फौरन बाद ज्यादा लोग संक्रमण के जोखिम में रहेंगे। हर्ड इम्युनिटी बनने में भी काफी वक्त लगेगा। लिहाजा, वैक्सीन नहीं आई तो 2021-22 तक यह महामारी बनी रह सकती है।
मौसम और महामारी भविष्यवाणी में समानता:-
विशेषज्ञों के अनुसार, मौसम भविष्यवाणी और महामारी मॉडलिंग में समानता है। दोनों को ही साधारण गणितीय व्याख्या से समझा जाता है। मौसम के मामले में यह व्याख्या फिजिक्स और कैमेस्ट्री आधारित होती है।
वहीं, संक्रामक रोगों की मॉडलिंग वायरस और महामारी विज्ञान के आधार पर की जाती है। जाहिर तौर पर इंसान मौसम को तो नहीं बदल सकता। लेकिन अपने व्यवहार, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों के बीच संतुलन से महामारी का भविष्य बदला जा सकता है।

Monday, May 4, 2020

5/04/2020 12:09:00 PM

शराब दुकानें खुलते ही सुबह-सुबह उमड़ पड़े लोग, नाई की दुकानों पर भी भीड़, देखिए तस्वीरें

विशेष डेस्क। लॉकडाउन नए सिरे से लागू होने के साथ ही देशभर में रेड, ऑरेज और ग्रीन जोन के हिसाब से नई व्यवस्था लागू हो गई। ग्रीन और ऑरेज जोन में Liquor Shop यानी शराब दुकान खोलने की अनुमति गई है। इसके बाद सुबह से ही इन दुकानों के बाहर लंबी-लंबी लाइनें देखी गईं। कर्नाटक से लेकर महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से ऐसी तस्वीरें आई हैं। वहीं ग्रीन और ऑरेज जोन में नाई की दुकानें भी सोमवार से खुल गईं। बीते करीब डेढ़ महीने से घरों में कैद लोग अपनी कटिंग और शेविंग बनवाने पहुंच रहे हैं। हालांकि सभी दूर फिजिकल डिस्टेंसिंग यानी शारीरिक दूरी का पालन हो रहा है और लोग मास्क लगाकर पहुंच रहे हैं। (See wine shop Pictures)
(कर्नाटक में शराब दुकान के बाहर खड़े लोग)
(लखनऊ में दुकान के बाहर खुलने का इंतजार करते लोग)
(लखनऊ में अलीगंज स्थित शराब की दुकान के बाहर लगी लाइन)

Saturday, May 2, 2020

5/02/2020 02:06:00 PM

कोरोना महासंकट: वुहान से मिले संकेत, दुनिया मे असली जंग लॉकडाउन के बाद शुरू होगी

वुहान (चीन)। घरों में बंद दुनिया के ज्यादातर लोग जल्द से जल्द यह खुशखबरी सुनना चाहते हैं कि कोरोना महामारी पर काबू पा लिया गया है और अब सामान्य जिंदगी शुरू होने वाली है। लेकिन क्या लॉकडाउन खत्म होने के बाद जिंदगी पहले जैसी सामान्य हो जाएगी? इसका जवाब हमें महामारी के केंद्र रहे चीन के वुहान से मिल सकता है। 8 अप्रैल को वुहान में 76 दिन के बेहद कड़े लॉकडाउन को खत्म किया गया था।
वुहान में छूट मिलने के बाद भी वहां के हालात देखकर लगता है कि पहले जैसी जिंदगी अभी बहुत दूर है। असली लड़ाई तो लॉकडाउन खत्म होने के बाद शुरू हुई है। मीडिया रपटों के अनुसार वुहान के जमीनी हालात चीन के सरकारी दावों से बिलकुल उलट हैं। वुहान के लोगों और व्यापारियों की नई जिंदगी बहुत कठिन है। शहर की रफ्तार धीमी है। लगभग आधी दुकानें अभी भी बंद हैं। रेस्तरां सिर्फ होम डिलिवरी से काम चला रहे हैं।
एक-दूसरे से मिलने से कतराते हैं लोग:-
मास्क लगाकर निकलते लोग एक-दूसरे से मिलने में कतराते हैं। दूसरी ओर अधिकारी कह रहे हैं, ‘हमने दो तरफा जीत हासिल की है- जिंदगी और आर्थिक विकास फिर ने रफ्तार पकड़ ली है।’ हालांकि एक्सपर्ट इस दावे को झूठ बता रहे हैं। वुहान के कई बड़े बिजनेसमैन कह चुके हैं कि वे भारी संकट के दौर से गुजर रहे हैं। 
कंपनियों पर कर्ज बढ़ चुका है और उनका मुनाफा जीरो है:-
वुहान के बिजनसमैन का कहना है कि सबकुछ सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं। क्योंकि ज्यादातर कर्मचारी अभी भी बाहर निकलने में कतरा रहे हैं। जब उनका डर खत्म होगा तो वे काम पर लौटेंगे। फिर कंपनियों का प्रॉडक्शन सुधरेगा। उसके बाद कहीं जाकर खपत बढ़ेगी। इस प्रक्रिया में तीन साल लग सकते हैं। इन सबके बीच लोगों के चेहरे पर कोरोना की दूसरी लहर आने का डर साफ दिखाई देता है।
बड़ी इंडस्ट्री तो रफ्तार पकड़ लेंगी, छोटे धंधे डूब गए:-
लॉकडाउन खत्म होने के बाद कई रेस्तरां शुरू हुए थे। लेकिन कस्टमर नहीं आ रहे। रोजाना सिर्फ 2 से 3 ऑनलाइन ऑर्डर आए। ज्यादातर रेस्तरां दोबारा बंद हो गए। छोटी दुकानों को बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं हो पा रहे हैं। इसलिए वे बंद हैं। फिटनेस सेंटर, मूवी थिएटर भी नहीं खुले। बड़ी फूड चेन- स्टारबक्स, मैकडी, बर्गर किंग, केएफसी और पिज्जा हट ने अपने स्टोर खोले हैं। लेकिन लोगों को बैठकर खाने नहीं दिया जा रहा है। लोग स्टोर के बाहर खड़े होकर ऑर्डर ले जा सकते हैं या ऑनलाइन ऑर्डर करें।
चीन सरकार ने कहा है:- 
वह इंडस्ट्री से 3 महीने तक टैक्स या किराया नहीं वसूलेगी। लेकिन प्राइवेट मालिकों के यहां किराए पर बिजनेस चलाने वालों को कोई छूट नहीं मिल पा रही है। ऐसे में वे बिजनेस बंद करने को मजबूर हैं। लाखों मजदूर लौट गए, जिन्हें लौटने में पता नहीं कितना वक्त लगेगा। छोटे-मझोले कारोबार पूरी तरह ठप पड़ गए हैं। अब इन्हें काम शुरू करने के लिए पैसा जुटाने में भारी समस्या हो रही है। ऐसे में इनके खुलने की उम्मीद कम है।
वुहान में सर्विस सेक्‍टर को लगेगा लंबा वक्‍त:-
दूसरी ओरे, एक्सपर्ट्स का कहना है कि मैन्युफैक्चरिंग भले ही धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ लेगी, लेकिन सर्विस सेक्टर को पटरी पर लौटने में लंबा समय लेगा। एक करोड़ 10 लाख आबादी वाला वुहान चीन का इंडस्ट्रियल शहर है। ज्यादातर प्रॉडक्ट यहीं बनते हैं, फिर यहां से पूरे चीन में भेजे जाते हैं। कड़े लॉकडाउन की वजह से सारी फैक्ट्रियां, इंडस्ट्री और ऑफिस बंद हो गए। लगभग आधी दुकानें अभी भी बंद हैं। रेस्तरां सिर्फ होम डिलिवरी से काम चला रहे हैं।

Friday, May 1, 2020

5/01/2020 06:52:00 PM

प्लान B: महामारी से बचने के लिए सबको कोरोना वायरस से संक्रमित कर देना चाहिए! इसे लेकर दुनिया में छिड़ी बहस

नई दिल्ली। क्या कोरोना वायरस महामारी से बचने के लिए सभी लोगों को इससे संक्रमित होने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए? हो सकता है कि यह आपको मजाक लगे या यह सुनकर आपको गुस्सा आए लेकिन दुनिया में इसे भी एक विकल्प के तौर पर देखा जाने लगा है। अभी दुनिया में विशेषज्ञों के बीच इसे लेकर बहस छिड़ी हुई है कि ऐसा किया जाना चाहिए या नहीं। इसके पक्ष में भी दलीलें आ रही हैं तो इसके खिलाफ भी। आखिर इस विकल्प का आधार क्या है और क्यों इस तरह की चर्चा छिड़ी है, आइए समझते हैं।
क्या है वह प्लान बी, जिस पर छिड़ी है बहस:-
दरअसल, लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग हमेशा के लिए लागू नहीं हो सकता। जब तक कोविड-19 की वैक्सीन नहीं बन जाती तब तक तो खतरा बहुत ही ज्यादा है। तो क्या वैक्सीन बनने तक लॉकडाउन जारी रहे? बिल्कुल नहीं, क्योंकि तब बीमारी से ज्यादा लोग इसे रोकने की इस कवायद से मरने लगेंगे। इकॉनमी चौपट हो जाएगी, अभूतपूर्व बेरोजगारी बढ़ जाएगी। हो सकता है कि लोगों के भूखों मरने की नौबत तक आ जाए।
ऐसी सूरत में वैक्सीन बनने तक 'हर्ड इम्यूनिटी' के कॉन्सेप्ट से लोगों की उम्मीदें बढ़ी हैं। इसी को प्लान बी के तौर पर बताया जा रहा है कि लोगों को खुला छोड़ दें संक्रमण के लिए, इससे 'हर्ड इम्यूनिटी' विकसित होगी और आखिरकार महामारी खत्म हो जाएगी। लेकिन इसमें इतना ज्यादा जोखिम है कि दुनिया भर के विशेषज्ञ इसे लेकर बंट चुके हैं।
तो क्या एक बड़ी आबादी मरने के लिए छोड़ दी जाए:-
कई विशेषज्ञ इस विकल्प का तीखा विरोध कर रहे हैं। अगर लोगों को वायरस के संक्रमण में आने के लिए छोड़ दिया जाए तो जोखिम वाले लोग जैसे बुजुर्ग और पहले से गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों के साथ यह बहुत बड़ा अन्याय होगा। ऑस्ट्रेलिया के एपिडेमियोलॉजिस्ट गिडियन मेयरोविट्जकाट्ज ने द गार्डियन में लिखा, 'इसके लिए हमें इकॉनमी की बलि वेदी पर जोखिम वाले लोगों की बलि देनी पड़ेगी।'
क्या हर्ड इम्यूनिटी के लिए लोगों को संक्रमित होने के लिए खुला छोड़ देना बेहतर विकल्प है? विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक यह कतई समझदारी भरा नहीं है।
स्वीडन में कोई लॉकडाउन नहीं हुआ, बढ़ रही इम्यूनिटी:-
स्वीडन ने अपने यहां लॉकडाउन नहीं किया। इस वजह से वहां पड़ोसी देशों के मुकाबले ज्यादा लोगों की मौत जरूर हुई लेकिन इसके बावजूद वहां कई अन्य यूरोपीय देशों के मुकाबले कोरोना की स्थिति अच्छी है।
बहुत जोखिमभरा है यह विकल्प:-
हर्ड इम्यूनिटी के लिए लोगों को संक्रमित होने के लिए छोड़ना बहुत खतरनाक हो सकता है। 60 से 85 प्रतिशत आबादी संक्रमित हो जाए तो इसके विनाशकारी नतीजों की कल्पना तक नहीं की जा सकती। तब लाखों लोग या हो सकता है कि करोड़ में लोगों की मौत हो जाए। कनाडा के चीफ पब्लिक हेल्थ ऑफिसर थेरेसा टैम ने चेताया है कि अगर ऐसा किया गया तो मौत ही नहीं, बीमारी के असर भी खतरनाक साबित होंगे। उन्होंने कहा, 'सिर्फ मौत ही चिंता की बात नहीं है। बीमारी से जो जिंदा बच रहे हैं उनके किडनी, लिवर, हृदय और दिमाग को होने वाला नुकसान भी बड़ी चिंता की बात होगी।
क्या है 'हर्ड इम्यूनिटी:-
दरअसल जब बहुत सारे लोग किसी संक्रामक बीमारी के प्रति इम्यून हो जाते हैं यानी उनमें उसके प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है तो वह बीमारी बाकी बचे असंक्रमित लोगों को अपनी चपेट में नहीं ले पाती है क्योंकि पूरा समूह ही इम्यून हो चुका होता है। इसी को हर्ड इम्यूनिटी कहते हैं। यह प्रतिरोधक क्षमता या तो वैक्सीन के जरिए मिलेगी या फिर बड़ी तादाद में लोगों के संक्रमित होने और उनके भीतर संबंधित बीमारी के प्रति इम्यूनिटी विकसित होने से होगी। उदाहरण के तौर पर न्यूमोनिया और मेनिन्जाइटिस जैसी बीमारियों की वैक्सीन देकर बच्चों को इसके प्रति इम्यून बनाने का नतीजा यह हुआ कि वयस्क लोगों के इन बीमारियों की चपेट में आने की गुंजाइश बहुत कम हो गई।
कैसे काम करती है हर्ड इम्यूनिटी:-
अगर कुछ लोगों में ही किसी बीमारी के प्रति इम्यूनिटी है तो वह संक्रामक बीमारी आसानी से फैलती है। अगर ज्यादातर लोगों में वैक्सीन या एक्सपोजर की वजह से इम्यूनिटी आ जाए तो वायरस का फैलना रुक जाता है।
कितने प्रतिशत लोगों में इम्यूनिटी मानी जाएगी हर्ड इम्यूनिटी:-
विशेषज्ञों के मुताबिक, कोविड-19 की बात करें तो अगर 60 से 85 प्रतिशत आबादी में इसके प्रति इम्यूनिटी आ जाए तो इसे हर्ड इम्यूनिटी करेंगे। डिप्थीरिया में यह आंकड़ा 75 प्रतिशत, पोलियो में 80 से 85 प्रतिशत और मीजल्स में 95 प्रतिशत है।
5/01/2020 12:29:00 PM

भारत में कोरोना वायरस से कम मौतों का रहस्य क्या है..?

दिल्ली। कोविड-19 की चपेट में आए दुनिया के कई देशों की तुलना में भारत में इस संक्रमण से काफी कम लोगों की मौत हुई है. इसकी खूब चर्चा हो रही है. कुछ लोग इतनी कम मृत्यु दर के रहस्य पर बात कर रहे हैं तो कुछ का कहना है कि भारत कोरोना वायरस की घातक मार से खुद को बचाने में कामयाब दिख रहा है. कुछ लोग कोरोनावायरस के ग्लोबल हॉटस्पॉट्स की तुलना में प्रमुख भारतीय शहरों में कम मौतों पर सवाल कर रहे हैं.
भारत में कोविड-19 संक्रमण का पहला पॉजिटिव केस दो महीने पहले रिकॉर्ड किया गया था. लेकिन तब से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले इस देश में कोरोना वायरस संक्रमण के 29,000 से अधिक मामले दर्ज हुए हैं. अब तक इस संक्रमण से यहां 900 से अधिक मौतें हुई हैं. भारत में कोरोना वायरस से मौतें किस कदर बढ़ रही हैं, इसे समझने के लिए यह देखना होगा ये कितने दिनों में दोगुनी हो रही हैं. भारत में इस वक्त मौतें नौ दिनों में दोगुनी हो रही हैं. 25 अप्रैल तक यहां 825 मौतें हो चुकी थीं, जबकि 16 अप्रैल को ये मौतें लगभग इनकी आधी थीं.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह भारत के लिए बेहद राहत की बात है क्योंकि संक्रमण के इस स्टेज में न्यूयॉर्क में दो या तीन दिन में ही मौतों का आंकड़ा दोगुना तक पहुंच जा रहा है. पब्लिक हेल्थ सेक्टर के कई विशेषज्ञों और पेशेवरों का कहना है कि भारत में संक्रमण और मौतें अगर काबू में हैं तो इसके पीछे एक महीने से ज्यादा वक्त से चल रहे कड़े लॉकडाउन का रोल हो सकता है. मेडिकल जर्नल लान्सेट ने भी इसकी पुष्टि की है और कहा है कि लॉकडाउन, संक्रमण के बढ़ते ग्राफ को सपाट करने में मुफीद साबित हुआ है. कुछ लोगों का मानना है कि भारत में युवा आबादी ज्यादा है और इस वजह से संक्रमण से मौतें कम हो रही हैं. बुजुर्गों में इस संक्रमण से मौत का जोखिम ज्यादा होता है. कुछ हलकों में इस बात पर भी चर्चा हो रही है भारत में जिस वायरस का अटैक हुआ है, वह कम खतरनाक किस्म का है.
साथ ही कुछ लोग यह भी अंदाजा लगा रहे हैं कि शायद भारत के गर्म मौसम की वजह यह वायरस उतनी तेजी से यहां नहीं फैल रहा है, जितनी तेजी से ठंडे मौसम वाले पश्चिमी देशों में. हालांकि इन दावों और कयासों की अभी तक कोई पुष्टि नहीं हुई है. इसके उलट, कोविड-19 के गंभीर मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि भारत में फैला कोरोना वायरस उतना ही संक्रामक है, जितना किसी और दूसरे देश में हो सकता है. तो क्या यह माना जाए कि भारत सचमुच कोरोना वायरस से होने वाली मौतों के मामले में काफी पीछे है?
क्या भारत में कम टेस्टिंग की वजह से मौतों का आंकड़ा कम:-
कुछ लोग इससे इत्तेफाक नहीं रखते. भारतीय मूल के अमरीकी चिकित्सक और कैंसर रोग विशेषज्ञ सिद्दार्थ मुखर्जी ने पत्रकार बरखा दत्त से हाल में कहा, "साफ कहूं तो भारत में इतनी कम मौतों के बारे में मैं कुछ नहीं जानता. दुनिया को भी इसके बारे में कुछ पता नहीं है. इतनी कम मौतें एक रहस्य है. मेरा तो मानना है कि कुछ हद तक कम टेस्टिंग इसके लिए जिम्मेदार है. भारत में हम पर्याप्त संख्या में टेस्टिंग नहीं कर रहे हैं. अगर हम ज्यादा टेस्टिंग कर रहे होते तो हमें इस सवाल का जवाब मिल सकता था. वह साफ तौर पर दोनों तरह के टेस्ट- डायगोनेस्टिक (संक्रामक लोगों की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाला) और एंटीबॉडी टेस्ट (संक्रमित और ठीक हो चुके व्यक्ति का टेस्ट) की ओर इशारा कर रहे थे.
क्या भारत कोविड-19 से हुई मौतों का पता नहीं लगा पा रहा है:-
कोरोनावायरस संक्रमण से प्रभावित कई देशों ने अनजाने में ही सही, मौतों की अंडर रिपोर्टिंग की है. मौतों के आंकड़ों की स्टडी के बाद न्यूयॉर्क टाइम्स ने पाया कि कोरोनावायरस से संक्रमण के दौरान मार्च में अमेरिका में कम से कम और 40 हजार मौतें हुई थीं. इन मौतों में कोविड-19 के साथ दूसरी वजहों से हुई मौतें भी शामिल थीं. फाइनेंशियल टाइम्स' ने हाल में कोरोनावायरस संक्रमण के दौरान 14 देशों में हुई मौतों का विश्लेषण किया था. अखबार के मुताबिक कोरोना वायरस से हुई मौतें आधिकारिक आंकड़ों से 60 फीसदी ज्यादा हो सकती हैं. हालांकि 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और 'फाइनेंशियल' टाइम्स की स्टडी में भारत को शामिल नहीं किया गया था. भारत की महत्वाकांक्षी 'मिलियन डेथ स्टडी' का नेतृत्व करने वाले टोरंटो यूनिवर्सिटी के प्रभात झा कहते हैं कि मौतों के आंकड़ों की रिपोर्टिंग सही तरीके से हो. कोरोना वायरस से हुई जिन मौतों की गिनती छूट गई हैं, उन्हें इसमें शामिल करना जरूरी है. प्रभात झा का कहना है कि भारत में ज्यादातर मौत घरों में होती है, और यहां आगे भी ऐसा ही होता दिखता है. इसलिए मौतों के सही आंकड़े के लिए दूसरे तरीके आजमाने भी जरूरी हैं.
भारत में 80 फ़ीसदी मौतें घरों में इसलिए रिपोर्टिंग में दिक्कत:-
डॉक्टर प्रभात झा का कहना है कि भारत में अभी भी 80 फीसदी मौतें घरों में होती हैं. इनमें मलेरिया और न्यूमोनिया जैसी संक्रामक बीमारी से होने वाली मौतें शामिल हैं. प्रसव के दौरान मौत, हार्ट अटैक और दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की रिपोर्टिंग तो अक्सर अस्पतालों से हो जाती है. काफी लोगों को कुछ वक्त तक इलाज मिल जाता है. फिर वे लौट जाते हैं और घरों में उनकी मौत हो जाती है. इसलिए सिर्फ अस्पताल से हुई मौतों की गिनती से ही हम यह पता नहीं लगा सकते कि भारत में वास्तव में कोविड-19 से कितने लोगों की मौत हुई है.श्मशान या कब्रों में लाई गई लाशों का हिसाब रख कर मौतों का सही आंकड़ा पता करना काफी पेचीदा और मुश्किल काम है. भारत के गांवों और सुदूर इलाकों के बड़े हिस्से में लाशों का खुले में अंतिम संस्कार कर दिया जाता है. कोई श्मशान घाट या निर्धारित कब्रिस्तान नहीं होता. भारतीयों की बहुत छोटी आबादी के पास अंतिम संस्कार के लिए खास सुविधा है.
श्रीनाथ रेड्डी ने बताया:-
पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट के श्रीनाथ रेड्डी ने मुझसे कहा कि अस्पतालों में होने वाली मौतों में इधर जो तेज इजाफा हुआ है, उन पर लोगों की नज़र तो गई ही होंगी. ( मसलन,हाल के वर्षों में उत्तर भारत के अस्पतालों में हुई बच्चों के मौतों रिपोर्टिंग सही हुई है. और यह लोगों की नजर में है. देश में लोगों को यह बात पता है). इसी तरह प्रोफेसर रेड्डी का मानना है कि इतने लंबे समय से घरों में होने वाली मौतों में जो इजाफा हो रहा है, वे भी लोगों की नजर में होगी.
मौतों के सही रिकॉर्ड के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल:-
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पब्लिक हेल्थ सिस्टम में मजबूत निगरानी तंत्र के अभाव में मोबाइल फोन का इस्तेमाल मौतों पर नजर रखने के लिए किया जा सकता है. इन्फ्लुएंजा से होने वाली मौतों के लिए मोबाइल से रिपोर्टिंग की जा सकती है ताकि यह पता किया जा सके कि क्या इन मौतों का संबंध कोविड-19 से था. भारत में 85 करोड़ लोग मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं. उन पर इस बात के लिए जोर दिया जा सकता है कि वे अपने गांव में किसी भी असामान्य मौत के बारे में एक टोल-फ्री नंबर पर जानकारी दें. इसके बाद अधिकारी परिवार से संपर्क कर मौत के बारे में मौखिक जानकारी ले सकते हैं.
भारत में मौतों की गिनती का विज्ञान कभी भी सटीक नहीं रहा है:-
भारत में हर साल एक करोड़ लोगों की मौत हो जाती है. 'मिलियन डेथ स्टडी' ने पाया कि कुछ मौतों के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर आकलन किया जाता है (मसलन भारत में 2005 में एचआईवी से प्रीमैच्योर मौतों की संख्या एक लाख थी, यह डब्ल्यूएचओ के आकलन की सिर्फ एक चौथाई थी). खुद भारत सरकार ने माना है कि भारत में सिर्फ 22 फीसदी मौतें डॉक्टरों की ओर से सर्टिफाइड होती हैं.
कोविड-19 से हुई मौत को परिभाषित कैसे किया जाए:-
कुछ भारतीय डॉक्टरों का कहना है कि कई लोग कोविड-19 के लक्षणों से मर रहे हैं. लेकिन न तो उनकी टेस्टिंग हुई थी और न ही उन्हें इलाज मिला था. इस तरह गलत डायग्नोसिस का भी सवाल पैदा होता है. अक्सर गलत डाइग्नोसिस भी मौत की वजह बन जाती है. बेल्जियम के इरेसमी यूनिवर्सिटी अस्पताल के प्रोफेसर ज्यां लुई विंसेंट ने मुझसे कहा कि भारत समेत कई देशों में कोविड-19 से हुई मौतों की अंडर रिपोर्टिंग हुई है. वह कहते हैं "जब आपसे कोई कहता है कि मौत से पहले किसी शख्स को बुखार था या सांस से जुड़ी कोई दिक्कत थी, तो आपको लगता है कि यह कोविड-19 की वजह से हुई मौत हो सकती है. लेकिन हो सकता है कि यह कुछ और हो.
अस्पताल में मरीजों को ट्रैक करना:-
मौत अक्सर किसी संक्रमण के बाद होती है, और कई बार यह बहुत मामूली होता है. लेकिन अगर आप इसकी जांच नहीं करते हैं तो मान लेंगे कि कोविड-19 से मौत हुई होगी. या फिर आप इसे पूरी तरह नकार भी सकते हैं. यही वजह है कि 1918 के स्पेनिश फ्लू से हुई मौतों के आंकड़ों में इतना अंतर है. डॉ. विंसेंट को नहीं लगता कि संक्रमण के बारे में पूरी कहानी मौतों के आंकड़ों से ही पता चलती है. वह कहते हैं "इस बीमारी की गंभीरता का जायजा लेने के लिए इससे हुई मौतों का रिकॉर्ड ज्यादा कारगर नहीं है. बीमारी कितनी प्रचंड है, यह जानना हो तो अस्पताल में मरीजों की भर्ती पर नजर रखना ज्यादा अच्छा तरीका होगा. लेकिन इसमें भी पेच यह है कि अस्पताल से बाहर घरों या दूसरी जगहों पर मरने वाले मरीज इसमें शामिल नहीं हो सकेंगे. विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि ज्यादातर सरकारें इस बात को लेकर चिंतित हैं कि मौतों की रिपोर्टिंग से दहशत फैल सकती है. सरकारों यह चिंता स्वाभाविक है. डॉक्टर प्रभात झा कहते हैं कि कोई भी जानबूझ कर मौतों के आंकड़ों को नहीं छिपा रहा है. आप इस तरह बड़ी तादाद में हो रही मौतों को छिपा भी नहीं सकते. वह कहते हैं कि केसों की तुलना में मौतों को ट्रैक करना विश्वसनीयता के लिहाज से ज्यादा मुश्किल काम है क्योंकि इसमें टेस्टिंग से जुड़े कई पूर्वाग्रह सामने आ जाते हैं. इसलिए यह पक्का करना जरूरी है कि सारी मौतों का रिकॉर्ड रखा जाए. अच्छे रैंडम सैंपल लिए जाएं या हर मरने वाले मरीज की तस्वीर ली जाए.
कोरोना से होने वाली मोतें कम है:-
हो सकता है कि भारत कोरोना से हो रही कुछ मौतों का आंकड़ा नहीं जुटा पा रहा हो. हर मरीज की सही डायग्नोसिस न हो पा रही हो लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि कोरोना वायरस से भारत में होने वाली मौतें कम हैं. फिर भी यह कहना जल्दबादी होगी कि भारत ने इस घातक बीमारी की मार से काफी हद तक खुद को बचा लिया है. लेकिन एक बात साफ है और जैसा कि मुझे एक एक्सपर्ट ने कहा- इस बारे में अभी कुछ नहीं कह सकते.

Thursday, April 30, 2020

4/30/2020 07:54:00 PM

चंद्रमा के पांचवे सबसे बड़े टुकड़े की हो रही है नीलामी, जानिए कितनी है उसकी कीमत

लंदन। दुनिया के सबसे बड़े चंद्र उल्का पिंडों में से एक की गुरुवार को क्रिस्टी पर नीलामी हो रही है। इसका मूल्य 2 मिलियन पाउंड (करीब 20 करोड़ रुपए) रखा गया है। 13.5 किलोग्राम वजन वाली चंद्रमा की चट्टान संभवत: एक क्षुद्रग्रह या धूमकेतु के साथ टकराने के बाद चंद्रमा की सतह से टूटकर सहारा रेगिस्तान पर गिर गई थी। इसका नाम NWA 12691 रखा गया है और यह पृथ्वी पर पाए जाने वाला चंद्रमा का पांचवा सबसे बड़ा टुकड़ा है। धरती पर पर ज्ञात सिर्फ 650 किलो चंद्रमा की चट्टान हैं।
क्रिस्टी के विज्ञान और प्राकृतिक इतिहास के प्रमुख जेम्स हैस्लोप ने कहा कि आपके हाथों में दूसरी दुनिया का टुकड़ा रखने का अनुभव है, जिसे आप कभी नहीं भूलेंगे। यह चंद्रमा का एक वास्तविक टुकड़ा है। यह एक फुटबॉल के आकार का है, जो उससे थोड़ा अधिक तिरछा है और यह आपके सिर से बड़ा है।
खोजे गए कई उल्कापिंडों की तरह, यह भी सहारा रेगिस्तान में एक अनाम व्यक्ति को मिला था। फिर एक दूसरे हाथों से होते हुए यहां तक पहुंचा है। संयुक्त राज्य अमेरिका के अपोलो अंतरिक्ष अभियानों द्वारा चंद्रमा से वापस लाए गए रॉक नमूनों के साथ तुलना करने के बाद वैज्ञानिक इस बात से सुनिश्चित हो सकते हैं कि यह चंद्रमा का ही टुकड़ा है। बताते चलें कि 1960 और 1970 के दशक में अपोलो कार्यक्रम में वैज्ञानिक अपने साथ लगभग 400 किलोग्राम चंद्रमा की चट्टान वापस लाए थे।
वैज्ञानिकों ने उन चट्टानों की रासायनिक और समस्थानिक रचनाओं का विश्लेषण किया और उन्होंने निर्धारित किया है कि वे कुछ उल्कापिंडों से मेल खाते हैं। उन्होंने कहा कि उल्कापिंड अविश्वसनीय रूप से दुर्लभ हैं और एक हजार में से केवल एक ही चंद्रमा से आता है, जो इसे बेहद विशेष बनाता है। इतना ही नहीं, क्रिस्टी निजी बिक्री के लिए 13 लौह उल्कापिंडों के एक समूह की पेशकश करेगी। उस संग्रह की कीमत 1.4 मिलियन पाउंड होने का अनुमान है।

Tuesday, April 28, 2020

4/28/2020 06:13:00 PM

रिसर्च: वैज्ञानिक का बड़ा दावा, चमगादड़ ही बचाएगा इंसानों की जान, दुनिया को करेगा कोरोना मुक्त

नई दिल्ली. कोरोना वायरस महामारी से पूरी दुनिया जूझ रही है। इस महामारी के चलते दुनिया के कई देश अपने घरों में कैद हैं और लाखों लोग मारे गए हैं। चीन के वुहान शहर से फैले कोरोना वायरस का स्रोत चमगादड़ों का माना जा रहा है और वहां पर इसकी बिक्री पर रोक लगा दी गई है। वहीं इस बीच एक वैज्ञानिक ने दावा किया है कि चमगादड़ की वजह से दुनिया में कोरोना वायरस फैला है।
चमगादड़ों के जालों, थूक और खून के नमूने किए गए एकत्रित:-
बता दें दुनियाभर के शोधकर्ता चमगादड़ों से के अंदर मौजूद 500 से ज्यादा कोरोना वायरसों की खोज कर चुके हैं, जो इंसानों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इन चमगादड़ों और वायरसों को ऐसी गुफाओं में खोजा गया है, जहां इनकी पूरी बस्ती है। वैज्ञानिक यहां से चमगादड़ों के जालों, थूक और खून समेत कई तरह के नमूने एकत्रित करते हैं।
10 सालों में 20 से ज्यादा खतरनाक वायरस की कर चुके हैं खोज:-
जिस वैज्ञानिक ने यह दावा किया है उनका नाम है पीटर डैसजैक। पीटर इकोहेल्थ एलायंस नाम की एक गैर सरकारी संस्था के कर्ताधर्ता हैं। यह वैज्ञानिक संस्था है जो घातक वायरसों की खोज, पहचान और बचाव करने में दुनियाभर के शोधकर्ताओं की मदद करता है। पी़टर डैसजैक 10 सालों में 20 से ज्यादा देशों में खतरनाक वायरस की खोज कर चुके हैं। पीटर दुनिया भर के शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों को हर तरह के वायरस की जानकारी देते हैं।
चमगादड़ों के खून से मिले वायरस से लड़ने वाले एंटीबॉडी:-
फिर पीटर से मिली जानकारी के अनुसार ये पता लगाया जाता है कि कौन सा वायरस इंसानों में फैल सकता है। ताकि कोरोना जैसी महामारी के लिए दुनिया को पहले से तैयार किया जा सके। पीटर डैसजैक ने कहा कि चमगादड़ों के खून में कोरोना और उसके जैसे कई वायरसों से लड़ने वाले एंटीबॉडी मिले हैं। ये एंटीबॉडी चमगादड़ों को कोरोना जैसे कई वायरसों से लड़ने में मदद करते हैं।
घरों के बंद कर दिए गए छेद:-
पीटर डैसजैक ने कहा कि केन्या में लोगों को बताया जा रहा है कि अपने घरों में मौजूद छेद बंद कर दें ताकि चमगादड़ घरों में न घुसें। कई जानवरों से वायरस फैल सकता है। इसलिए बिल्ली, ऊंट, पैंगोलिन और अन्य स्तनपायी जीवों जो इंसानों के आसपास रहते हैं, उनसे उपयुक्त दूरी और साफ-सफाई रखने की जरूरत है।

Monday, April 27, 2020

4/27/2020 04:01:00 AM

Coronavirus: चीन की चालाकी, इंसानों में इन्फेक्शन पता चलते ही दवा का पेटेंट फाइल किया

पेइचिंग। चीन के ऊपर आरोप लगते रहे हैं कि उसने न सिर्फ अपने देश में कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कदम उठाए बल्कि बाकी दुनिया को भी देर से जानकारी दी। चीन इन आरोपों का खंडन करता रहा लेकिन अब चीन की एक और चालाकी सामने आई है जिससे उसके सारे दावों पर सवाल उठता है। दरअसल, चीन ने कोरोना वायरस के खिलाफ सबसे कारगर मानी जा रही दवा को तभी पेटेंट कराने की कोशिश की थी जब वहां सबसे पहले इंसानों के बीच इसके फैलने की पुष्टि हुई थी।
वुहान लैब ने दी अर्जी:-
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 20 जनवरी को इस बात की पुष्टि की थी कि यह वायरस इंसानों से इंसानों में फैल सकता है। हालांकि, लीक हुए कुछ दस्तावेजों से यह साबित होता है कि अधिकारियों को यह पता चल चुका था कि यह एक महामारी है लेकिन लोगों को चेतावनी 6 दिन बाद दी गई। यही नहीं इबोला से लड़ने के लिए अमेरिका की बनाई हुई Remdesivir को 21 जनवरी को ही पेटेंट कराने की अर्जी दे दी गई। ये अर्जी वुहान की वायरॉलजी लैब और मिलिट्री मेडिसिन इंस्टिट्यूट ने बनाई थी।
चीन के खिलाफ जांच की मांग:-
फॉरन अफेयर्स सिलेक्ट कमिटी के चेयरमैन टॉम टुगनढट ने चीन के खिलाफ जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि इस बीमारी और इससे निपटने के बारे में हमें बहुत सी बातें नहीं पता हैं। हमें इससे सीख लेने की जरूरत है ताकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भविष्य में बेहतर तरीके से रिस्पॉन्स दे सके। चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता इस बात का आरोप झेल रहे हैं कि उन्होंने डेटा छिपाया और पब्लिक हेल्थ टीमों को जांच करने से रोका, महामारी की जानकारी देने वाले डॉक्टरों को चुप करा दिया और इंसानों के बीच इसके फैलने की बात भी छिपाई।
इबोला के लिए बनी थी:-
Remdesivir दवा को इबोला के ड्रग के रूप में विकसित किया गया था लेकिन समझा जाता है कि इससे और भी कई तरह के वायरस मर सकते हैं। अमेरिका के वाशिंगटन राज्‍य में कोरोना से जंग जीतने वाली एक महिला ने अपना निजी अनुभव शेयर करते हुए बताया था कि दवा remdesivir की मदद से उनके पति कोरोना से ठीक हो गए थे। अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने ऐलान किया था कि Remdesivir एक ऐसी दवा है जिससे कोरोना के खात्‍मे की संभावना देखी जा रही है।
(Source: DailyMailUK)

Sunday, April 26, 2020

4/26/2020 07:28:00 AM

क्या है Vitamin C का Corona कनेक्शन? किन-किन आहारों से कितना मिल सकता है विटामिन सी

हेल्थ। केवल हमारी इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाता बल्कि, हमारे मोटापे को कम करके हमें फीट भी रखने में मददगार है. इसके नियमित सेवन से सर्दी, खांसी व अन्य तरह के इन्फेक्शन होने का खतरा कम हो जाता है.
क्या है विटामिन सी:-
विटामिन सी हमारे शरीर की कार्यप्रणाली को सुचारू रूप से चलाने के लिए अति आवश्यक पोषक तत्वों है. यह केवल इंसानों के लिए नहीं, बल्कि अन्य स्तनधारी जानवरों के लिए भी महत्वपूर्ण है. हालांकि, स्तनधारी जानवर अपने शरीर की कोशिकाओं की मदद से ही यह विटामिन उत्पन्न कर लेते हैं, लेकिन मनुष्यों को फल व सब्जियों के सेवन से प्राप्त होता है.
क्यों जरूरी है विटामिन सी:-
- यह हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. जिसके कारण हम कई तरह के संक्रमणों से बचे रह सकते हैं, जैसे- सर्दी, खांसी व अन्य.
- कैंसर से भी बचाव में भी विटामिन सी काफी जरूरी है.
- यह हमारे शरीर में आयरन के अवशोषण की क्षमता को भी बढ़ाता है.
- यह एक ऐंटि-एलर्जिक व ऐंटि-ऑक्सिडेंट के रूप भी काम करता है.
- दांत, मसूड़ों व आंखों को भी स्वस्थ रखने में भी यह काफी मददगार है.
अंग्रेजी वेबसाइट Runners world की मानें तो प्रतिदिन विटामिन सी की मात्रा पुरूषों को 90 मिलीग्राम और महिलाओं को 75 मिलीग्राम लेनी चाहिए. जैसा कि ज्ञात हो फल और सब्जियां विटामिन और मिनीरल के सबसे अच्छे स्रोत होते हैं.
कोरोना से विटामिन सी का क्या कनेक्शन:-
कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए विशेषज्ञों ने भरपूर मात्रा में विटामिन सी लेने की सलाह दी है. गौरतलब है कि कोरोना के मामले ज्यादातर उनमें पाए जा रहे है, जिनका इम्यूनिटि पावर कमजोर है. ऐसे में विटामिन सी उसे मजबूत करके स्वस्थ रखने में मददगार साबित हो सकता है.
शरीर में विटामिन सी के कम होने के लक्षण:-
- अक्सर सर्दी जुकाम होना
- कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता होना. जिसके कारण कोई भी काम करने पर थकावट महसूस करना.
- अचानक वजन कम हो जाना
- बाल ड्राई हो जाना होना और बालों का झरना
- त्वचा का रंगत उड़ना
- घाव होने पर ज्यादा दिनों तक परेशान करना, भरने में समय लगना
- दांत और मसूड़े संबंधी समस्याएं
जानें कौन से आहार में कितने मात्रा में पाया जाता है विटामिन सी:-
- 95 मिलीग्राम विटामिन सी, प्रति 1/2 कप कच्ची लाल शिमला मिर्च से
- एक नारंगी में 70 मिलीग्राम विटामिन सी
- एक किवी फल में 64 मिलीग्राम विटामिन सी
- 51 मिलीग्राम विटामिन सी, प्रति 1/2 कप पका हुआ ब्रोकोली
- 49 मिलीग्राम विटामिन सी, प्रति 1/2 कप कटा हुआ स्ट्रॉबेरीज में
- 1/2 कप पकाया हुआ ब्रसल स्प्राउट (Brussels Sprouts) में 48 मिलीग्राम विटामिन सी
- 39 मिलीग्राम विटामिन सी प्रति 1/2 चकोतरा (Grapefruit) फल में
- 33 मिलीग्राम विटामिन सी प्रति 3/4 कप टमाटर जूस में

Saturday, April 25, 2020

4/25/2020 05:32:00 AM

कोरोना से पहले कई विशाल महामारियों ने ली करोड़ों लोगों की जानें, जाने इनका इतिहास

नई दिल्ली। कोविड-19 महामारी अब तक दुनिया में 27 लाख से ज्यादा लोगों को अपनी चपेट में ले चुकी है। वैश्विक महामारी घोषित होने के बाद भी कई देशों ने कोरोना से लड़ने के लिए देर से रणनीति अपनाई। कोरोना अकेली ऐसी बीमारी नहीं है जिसने दुनिया को हिला कर रख दिया हो। 
कोरोना ने एक बार फिर महामारियों के परिणामों को चर्चा में ला दिया है। इससे पहले भी कई ऐसी बीमारी रही है जिन्होंने मानव समाज और सरकारों को अलग आकार दिया है। 6वीं शताब्दी के जस्टिनियन प्लेग से लेकर 20वीं शताब्दी के स्पेनिश फ्लू तक कई बीमारियों ने समाज में उथल-पुथल पैदा की थी। आइए जानते हैं ऐसी महामारियों के बारे में...
●जस्टिनियन प्लेग (Justinian Plague)
यह महामारी अब तक इतिहास में सबसे घातक बीमारी मानी जाती है। इस बीमारी की उत्पत्ति 6वीं शताब्दी में मिस्र में हुई थी जो तेजी से पूर्वी रोमन साम्राज्य में फैली थी। इस प्लेग का नाम पूर्वी रोमन साम्राज्य के तात्कालिक सम्राट जस्टिनियन के नाम पर 'जेस्टिनियन प्लेग' पड़ा। इस महामारी की चपेट में आकर लगभग 2.5 से 10 करोड़ लोग मारे गए थे। उस समय रोमन साम्राज्य में इटली, रोम और उत्तरी अमेरिका समेत पूरा भूमध्यसागरीय तट शामिल थे। 750 ईसवीं तक प्लेग के लगातार प्रकोप से पूर्वी रोमन साम्राज्य आर्थिक रुप से कमजोर होता गया। जब रोमन साम्राज्य से प्लेग खत्म हुआ तब तक इस साम्राज्य ने यूरोप में जर्मन-भाषी फ्रैंक्स क्षेत्र को खो दिया था और मिस्र और सीरिया अरब साम्राज्य के नियंत्रण में आ गए थे। 
●ब्लैक डेथ (Black Death)
ब्लैक डेथ भी खतरनाक महामारियों में से एक है। 14वीं शताब्दी के दौरान इस महामारी का असर यूरोप और एशिया जैसे बड़े महाद्वीपों में रहा। इतिहास गवाह है कि ब्लैक डेथ से सबसे ज्यादा मानव सभ्यता को नुकसान हुआ। ब्लैक डेथ ने लगभग 7.5 से 20 करोड़ लोग मारे गए थे। ब्लैक डेश की शुरुआत 1340 के शुरू के दशक में हुई थी। इस महामारी से चीन, भारत, सीरिया और मिस्र काफी ज्यादा प्रभावित हुआ था और 1347 आते आते ये बीमारी यूरोप तक फैल गई थी। ब्लैक डेथ की वजह से यूरोप की लगभग 50 फीसद आबादी खत्म हो गई थी। इस महामारी के लिए यूरोप में यहूदियों को जिम्मेदार ठहराया गया था और यहीं से यूरोप में यहूदियों के उत्पीड़न की शुरुआत हुई थी। ब्लैक डेथ के बाद कैथोलिक चर्च का असर कम हो गया था और लोगों के भगवान के साथ संबंधों तो चुनौती दी गई थी। 
●स्पैनिश फ्लू (Spanish Flu)
पहले विश्व यूद्ध के अंतिम चरण के दौरान स्पैनिश फ्लू महामारी का प्रभाव रहा। यह 20वीं शताब्दी की सबसे घातक महामारी थी जिसमें लगभग पांच करोड़ लोगों की मौत हो गई थी। स्पैनिश फ्लू का कहर सबसे पहले यूरोप में देखा गया जो बाद में अमेरिका और एशिया में तेजी से फैला।
इसके अलावा भारत में भी स्पैनिश फ्लू का कहर देखने को मिला था। देश में उस समय इस महामारी से लगभग 1.7 से 1.8 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। महामारी का सबसे ज्यादा असर पहले विश्व युद्ध के परिणाम पर रहा। फ्लू से विश्व युद्ध में शामिल दोनों तरफ के लोग मारे गए थे लेकिन जर्मन और ऑस्ट्रियाई सेनाएं इससे सबसे ज्यादा प्रभावित थी।
●कोरोना वायरस (COVID-19)
कोविड-19 या कोरोना वायरस पिछले साल 2019 में शुरू हुई महामारी है। चीन के वुहान शहर के वेट मार्केट से इसकी उत्पत्ति मानी जाती है। कोरोना वायरस ने दुनिया में अबतक 27 लाख से ज्यादा लोगों को संक्रमित कर दिया है। इस बीमारी से 1,90,000 से ज्यादा लोगों की मौत भी हो चुकी है। कोरोना वायरस की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसके लक्षण बदलते जा रहे हैं। शुरुआत में खांसी, जुकाम, बुखार और सांस लेने में दिक्कत इसके लक्षण बताए गए थे लेकिन अब ये लक्षण ना होने पर भी मरीजों में कोरोना वायरस की पुष्टि की गई है।
4/25/2020 05:28:00 AM

'गैंग्स ऑफ पालघर' की इनसाइड स्‍टोरी, वर्चस्‍व की राजनीति की बलि चढ़े दो संत, मामला कुछ और ही

इनसाइड स्‍टोरी। पालघर में साधुओं की हत्या के मामले में Zee News लगातार रिपोर्टिंग कर रहा है. 16 अप्रैल की इस घटना पर फिर Zee News ने ग्राउंड ज़ीरो पर जाकर पड़ताल की है और हर उस व्यक्ति से बात की है, जो इस बड़े मामले की परतें खोलने में मदद कर सकता था. हमने पहले आपको इस मामले के पहले चश्मदीद से मिलवाया था, जो गढ़चिंचले गांव की सरपंच चित्रा चौधरी थीं. इसी गांव के पास दो साधुओं और उनके ड्राइवर की भीड़ ने हत्या कर दी थी. सरपंच चित्रा ने साधुओं की हत्या के पीछे राजनीतिक वजहों की तरफ इशारा किया था. अब पड़ताल में कई औऱ बड़ी बातें सामने निकल कर आई हैं:
धर्मांतरण थ्‍योरी:-
इस पड़ताल में ये पता चला कि इस आदिवासी इलाके में शराब को राजनीतिक हथियार बनाया गया है. कुछ विशेष राजनीतिक दल इसका इस्तेमाल अपने समर्थक बनाने और संगठन को मजबूत करने के लिए करते हैं. लेकिन जो लोग, जो संगठन और जो साधु-संत इस इलाके में नशे का विरोध करते हैं, इलाके में जागरूकता फैलाते हैं और सामाजिक सुधार की बात करते हैं. उन्हें दुश्मन की तरह देखा जाता है. Zee News की टीम ने आदिवासियों के बीच काम करने वाले लोगों से बात की है, जो इस आदिवासी इलाके को वर्षों से जानते हैं, उन्होंने पालघर को राजनीतिक वर्चस्व और धार्मिक वर्चस्व की लड़ाई का मैदान बताया.
स्थानीय जानकारों ने पालघर में वामपंथी दलों और ईसाई मिशनरियों के गठजोड़ की बात बताई, और ये बताया कि हिंदूवादी संगठन और हिंदू साधु संत इन लोगों की आंखों में चुभते हैं. हमें ये भी पता चला है कि ये इलाका ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार और धर्मांतरण करने का बड़ा गढ़ है. इस आदिवासी इलाके में कई Christian missionaries काम करती हैं. इसके अलावा ऐसे संगठनों का समर्थन करने के लिए कई हिंदू विरोधी संगठन भी पालघर में सक्रिय हैं. सवाल यही है कि क्या इन सभी बातों की वजह से पालघर में दो साधुओं की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई? क्य़ा इसी वजह से कल्पवृक्ष गिरी महाराज और सुशील महाराज की जान ले ली गई?
परत दर परत:-
वैसे तो साधुओं की हत्या के पीछे अफवाह को वजह बताया गया था, लेकिन ये बात इतनी साधारण नहीं है. ये सवाल इसलिए उठते हैं क्योंकि पालघर में पहले कभी भीड़ द्वारा हिंसा की ऐसी घटना नहीं हुई. दूसरी बड़ी बात ये है कि किसी को चोर समझ कर पीटना और पीट-पीट कर जान ले लेना...ये दोनों अलग अलग बातें है. साधुओं की हत्या करना और वो भी तब...जब सामने पुलिसवाले खड़े हो...ये मामूली बात नहीं है. इसके पीछे जो भी कारण हैं, वो सब कारण सामने आने चाहिए. इसलिए हम लगातार इस मामले की पड़ताल कर रहे हैं.
हमें पालघर से एक और बड़ी जानकारी मिली . पिछले दो साल से अचानक पालघर के कुछ इलाकों में रावण की पूजा के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. इसके ज़रिए आदिवासियों को हिंदू मान्यताओं का विरोधी बनाने की कोशिश की जा रही है . कुछ लोग आदिवासियों में ये भ्रम फैला रहे हैं कि आदिवासी रावण के वंशज है और उन्हें रावण की पूजा करनी चाहिए . आदिवासी एकता परिषद जैसे कुछ संगठन पालघर में रावण दहन पर रोक लगाने के लिए प्रशासन पर दबाव बनाते हैं और रावण को देवता की तरह दिखाने की कोशिश करते हैं.
अब सवाल ये है कि इस आदिवासी इलाके में क्यों ऐसा हो रहा है कि पिछले कुछ वर्ष से रावण की पूजा की जा रही है. क्यों हिंदू देवी देवताओं के बारे में गलत बातें फैलाई जा रही है? क्यों ऐसा हो रहा है कि ईसाई मिशनरियों के साथ-साथ हिंदू विरोधी संगठन सक्रिय हैं. लेकिन ये सभी बातें आपसे छुपाई जा रही हैं. कोई भी आपको इन बातों के बारे में नहीं बता रहा है. पालघर में साधुओं की हत्या को सिर्फ अफवाह से जोड़कर, सिर्फ गलतफहमी से जोड़कर और इसे गलत पहचान (Mistaken Identity) का केस बताकर मामले को दबाने की पूरी कोशिश हो रही है.

Thursday, April 23, 2020

4/23/2020 06:14:00 PM

कोरोना वायरस पर होगा चमत्कार, ब्रिटेन में आज से शुरू हुआ Covid-19 वैक्सीन का सबसे बड़ा ट्रायल

ब्रिटेन। कोरोना वायरस के कहर से जूझ रही दुनिया को इस महामारी से निजात दिलाने के लिए आज से ब्रिटेन में दुनिया का सबसे बड़ा ड्रग ट्रायल शुरू हो गया है। ब्रिटेन में बेहद अप्रत्‍याशित तेजी के साथ शुरू होने जा रहे इस परीक्षण पर पूरे विश्‍व की नजरें टिकी हुई हैं। वैज्ञानिकों को उम्‍मीद है कि ऑक्‍सफर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्‍सीन 'ChAdOx1 nCoV-19' से आने वाले कुछ सप्‍ताह में चमत्‍कार हो सकता है। आइए जानते हैं कि क्‍या है यह वैक्‍सीन....
दुनिया का सबसे बड़ा कोरोना ड्रग ट्रायल:-
ब्रिटेन में 165 अस्‍पतालों में करीब 5 हजार मरीजों का एक महीने तक और इसी तरह से यूरोप और अमेरिका में सैकड़ों लोगों पर इस वैक्‍सीन का परीक्षण होगा। ऑक्‍सफर्ड यूनिवर्सिटी के संक्रामक रोग विभाग के प्रफेसर पीटर हॉर्बी कहते हैं, 'यह दुनिया का सबसे बड़ा ट्रायल है।' प्रफेसर हॉर्बी पहले इबोला की दवा के ट्रायल का नेतृत्‍व कर चुके हैं। उधर, ब्रिटेन के हेल्थ मिनिस्टर मैट हैनकॉक ने कहा है कि दो वैक्सीन इस वक्त सबसे आगे हैं। उन्‍होंने कहा कि एक ऑक्सफर्ड और दूसरी इंपीरियल कॉलेज में तैयार की जा रही हैं। हैनकॉक ने बताया, 'मैं कह सकता हूं कि गुरुवार को ऑक्सफर्ड प्रॉजेक्ट की वैक्सीन का लोगों पर ट्रायल किया जाएगा। आमतौर पर यहां तक पहुंचने में सालों लग जाते हैं और अब तक जो काम किया गया है उस पर मुझे गर्व है।
जून में आ सकते हैं वैक्‍सीन के परिणाम:-
प्रफेसर हॉर्बी कहते हैं कि हमें अनुमान है कि जून में किसी समय कुछ परिणाम आ सकते हैं। यदि यह स्‍पष्‍ट होता है कि वैक्‍सीन से लाभ है तो उसका जवाब जल्‍दी मिल सकता है।' हालांकि हॉर्बी चेतावनी भी देते हैं कि कोविड-19 के मामले में कोई 'जादू' नहीं हो सकता है। दरअसल, इंग्लैंड में 21 नए रिसर्च प्रॉजेक्ट शुरू कर दिए गए हैं। इसके लिए इंग्लैंड की सरकार ने 1.4 करोड़ पाउंड की राशि मुहैया कराई है। ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी में 10 लाख वैक्सीन की डोज बनाने की तैयारी चल रही है।
युवाओं पर वैक्‍सीन का पहले परीक्षण:-
ऑक्‍सफर्ड की वैक्‍सीन का सबसे पहले युवाओं पर परीक्षण किया जा रहा है। अगर यह सफल रहा तो उसे अन्‍य आयु वर्ग के लोगों पर इस वैक्‍सीन का परीक्षण किया जाएगा। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी (Oxford University)में जेनर इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर आड्रियान हिल कहते हैं, हम किसी भी कीमत पर सितंबर तक दस लाख डोज तैयार करना चाहते हैं। एक बार वैक्सीन की क्षमता का पता चल जाए तो उसे बढ़ाने पर बाद में भी काम हो सकता है। यह स्पष्ट है कि पूरी दुनिया को करोड़ों डोज की जरूरत पड़ने वाली है। तभी इस महामारी का अंत होगा और लॉकडाउन से मुक्ति मिलेगी। कोरोना वायरस को खत्म करने के लिए वैक्सीन ही सबसे कारगर उपाय हो सकता है। सोशल डिस्टेंशिंग (Social Distancing) से सिर्फ बचा जा सकता है।
70 कंपनियां और शोध टीमें बना रही हैं वैक्‍सीन:-
जेनर इंस्टीट्यूट के मुताबिक दो महीने में पता चल जाएगा कि वैक्सीन मर्ज कितना कम कर पाएगी। किसी वैक्सीन को तैयार करने का प्रोटोकॉल 12 से 18 महीने का होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) की गाइडलाइन भी यही कहती है। उधर, ब्रिटेन के चीफ मेडिकल एडवाइजर क्रिस विह्टी कहते हैं, 'हमारे देश में दुनिया के जाने माने वैक्सीन वैज्ञानिक हैं, लेकिन हमें पूरे डिवलपमेंट प्रोसेस को ध्यान में रखना है। इसे कम किया जा सकता है। टास्क फोर्स इस पर काम कर भी रही है। हम सिर्फ यही चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी Covid-19 के इलाज के लिए वैक्सीन तैयार हो जाए। पूरी दुनिया में 70 से ज्‍यादा कंपनियां और शोध टीमें कोरोना वायरस की वैक्‍सीन बनाने पर काम कर रही हैं।
ऑक्‍सफर्ड की वैक्‍सीन पहले ही डोज में दिखाएगी असर:-
ऑक्‍सफर्ड की टीम के एक सदस्‍य ने बताया कि वैक्‍सीन को बनाने के लिए सबसे सटीक तकनीक का प्रयोग किया गया है। यह वैक्‍सीन पहले ही डोज से दमदार रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर सकती है। इस वैक्‍सीन पर शोध का नेतृत्‍व कर रहे प्रफेसर साराह गिलबर्ट कहते हैं कि वे लोग एक संभावित संक्रामक बीमारी पर काम कर रहे थे। इससे उन्‍हें कोविड-19 पर तेजी से काम करने में मदद मिली। उन्‍होंने कहा कि उनकी टीम पिछले लास्‍सा बुखार और मर्स पर काम कर रही थी जो एक अन्‍य कारोना वायरस वैक्‍सीन है। इसकी वजह से कोविड-19 की वैक्‍सीन बनाने में उन्‍हें जल्‍दी हुई। ताजा वैक्‍सीन को बनाने में ChAdOx तकनीक का प्रयोग किया गया है। इस तकनीक का अन्‍य बीमारियों में भी इलाज किया जा सकता है।

Wednesday, April 22, 2020

4/22/2020 05:15:00 PM

इस खास किस्‍म की रोशनी से होगा कोरोना का खात्‍मा, DRDO ने बनाई खास तरह की तकनीक

नई दिल्‍ली: रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने कोरोना वायरस को नष्ट करने के लिए दो नए उपकरण बनाए हैं. ये दोनों ही उपकरण ऑफिस या घरों में रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीज़ों को कोरोना वायरस के संक्रमण से मुक्त करने में बहुत कारगर हैं. डीआरडीओ का कहना है कि इनके उत्पादन के लिए निजी उद्योगों से बात अंतिम चरण में है और बहुत जल्द सस्ते दामों में ये बाज़ार में उपलब्ध हो जाएंगे. दोनों ही उपकरण अल्ट्रा वॉयलेट रोशनी से संक्रमण को खत्म करने के सिद्धांत पर काम करते हैं.
माइक्रोवेव ओवन के आकार का पहला उपकरण ऑफिस या घर पहुंचने पर मोबाइल, घड़ी, कार की चाबी, पर्स जैसी चीज़ों में मौजूद वायरस को खत्म करता है. इसके लिए संक्रमित वस्तु को उपकरण के अंदर रखकर उसे बंद कर दिया जाता है और उस पर एक मिनट तक अल्ट्रा वॉयलेट किरणें डाली जाती है. इन किरणों के लिए बॉक्स के अंदर ही प्रबंध किया गया है. एक मिनट के बाद वस्तुओं पर मौजूद वायरस मर जाता है और उसे बाहर निकाल लिया जाता है.
दूसरा उपकरण भी इसी सिद्धांत पर काम करता है और इसे हाथ में लेकर किसी फाइल, खाने-पीने की चीज़ों, सब्ज़ियों या दूध के पैकेट के ऊपर एक मिनट तक रखा जाता है. उपकरण से निकलने वाली अल्ट्रा वॉयलेट रोशनी संक्रमण को खत्म कर देती है. डीआरडीओ के डायरेक्टर भुवनेश कुमार ने बताया कि इन दोनों ही उपकरणों की क़ीमत 2 से 4 हज़ार तक रहने की संभावना है. उन्होंने बताया कि अब कई ऑफिस खुलने लगे हैं. ऐसे में ये उपकरण बहुत काम के साबित होंगे.
4/22/2020 06:44:00 AM

कोरोना काल में चीन पर चढ़ी परमाणु सनक, पहले फैलाई महामारी अब 'विश्वयुद्ध' की तैयारी!

नई दिल्ली: मुसीबत के वक्त ही नायकों और खलनायकों की पहचान होती है. इस वक्त दुनिया कोरोना की मुसीबत से जुझ रही है लेकिन कोरोना से विश्वयुद्ध के दौरान भी कुछ देश ऐसे हैं जो विनाशकारी हथियारों से युद्ध लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. यही हैं दुनिया के वो खलनायक जो कोरोना काल में भी युद्ध काल की तैयारी में जुटे हैं. इस देशों में सबसे उपर है चीन जिसने पहले दुनिया में कोरोना फैलाया और जब दुनिया कोरोना की वैक्सीन खोज रही है तब चीन एटमी परीक्षण कर रहा है.  
दुनिया के लिए चीन की खुराफातें मुसीबत बनती जा रही हैं. पहले चीन की वुहान लैब से कोरोना वायरस लीक के बाद दुनिया पर महामारी की मुसीबत टूटी और अब जिस वक्त पूरी दुनिया चीन से निकले वायरस के खिलाफ विश्वयुद्ध लड़ रही है. उस वक्त का इस्तेमाल भी चीन अपनी ताकत बढ़ाने के लिए कर रहा है. यानि ताकत बढ़ाने और ताकत दिखाने का ड्रैगन का नशा कोरोना काल में भी कम नहीं हो रहा और ताकत का यही नशा चीन को दुनिया की नजरो में खलनायक बना रहा है. 
कोरोना आपातकाल में चीन का परमाणु परीक्षण:-
एक तरफ दुनिया कोरोना की वैक्सीन बनाने की तैयारी में जुटी है. कहीं पर जानवरों तो कहीं पर मानवों पर टीके का परीक्षण किया जा रहा है लेकिन इस मुश्किल वक्त में चीन एटमी परीक्षण कर रहा है. ये खबर अमेरिका और चीन के बीच पहले से ही काफी बढ़ चुके तनाव को और ज्यादा बढ़ा सकती है. 
अमेरिका के गृह विभाग का आरोप:-
आरोप है कि चीन ने जमीन के नीचे परमाणु परीक्षण किए हैं. चीन कम तीव्रता वाले परमाणु बम तैयार कर रहा है. अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट ने चीन पर यह आरोप लगाया है कि चीन ऐसे ब्लास्ट्स को लेकर बनाए गए समझौते के पालन की बात करता है लेकिन फिर भी उसने कम तीव्रता के परमाणु बम के परीक्षण किए हैं. चलिए अब आपको अमेरिका के आरोपों के पीछे की वजह भी बताते है. इस इलाके को देखिए. ये चीन की लोप नुर टेस्ट साइट है जहां पर चीन परमाणु परीक्षण करता है. कभी यहां पर एक बड़ा तालाब हुआ करता था लेकिन चीन ने अपनी नापाक इरादों के लिए तालाब को सुखाकर यहां परमाणु परीक्षण करने शुरू कर दिए. 
क्यों बढ़ा चीन पर अमेरिका का शक:-
चीन लोप नूर टेस्ट साइट पर सालभर से तैयारी कर रहा है. लोप नुर टेस्ट साइट में बड़े स्तर पर खुदाई की गई है. न्यूक्लियर परीक्षण को लेकर चीन पारदर्शिता नहीं बरत रहा है. जिन कम तीव्रता वाले परमाणु बमों के परीक्षण का शक जताया गया है, उन पर चीन और पाकिस्तान साथ में काम कर रहे हैं और इनसे किसी छोटे इलाके को निशाना बनाना आसान होता है. 
4/22/2020 06:31:00 AM

लॉकडाउन खत्म होने के बाद कैसी होगी हमारी जिंदगी?

विशेष। कोरोना वायरस के कारण पूरी दुनिया में 24 लाख से अधिक लोग संक्रमित हैं और 1.5 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए अधिकतर देशों में लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का तरीका अपनाया गया है, क्योंकि जब तक कोई वैक्सीन नहीं आ जाती है तब तक कोरोना के संक्रमण को रोकने का एक ही रास्ता है और वह है सोशल डिस्टेंसिंग।
लॉकडाउन की वजह से लोग अपने ही घरों में कैद हैं। जो लोग कल तक चाय का कप धोने के लिए भी कामवाली बाई पर निर्भर रहते थे वे आज झाड़ू-पोंछा लगाने से लेकर खाना बना रहे हैं और बर्तन भी साफ कर रहे हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि कोरोना वायरस ने लोगों को आत्मनिर्भर बना दिया है। अब सवाल कोरोना वायरस और लॉकडाउन के बाद की जिंदगी का है। आइए समझते हैं कि कोरोना के बाद लोगों की जिंदगी कैसी होगी...
शॉपिंग में कटौती:- 
कोरोना महामारी ने यह बात साबित कर दिया है कि इंसान फिजूलखर्जी बहुत ज्यादा करता है। ऐसा नहीं है कि लॉकडाउन में लोगों के खर्चे नहीं हो रहे हैं लेकिन कोरोना ने अनावश्यक खरीदारी पर लगाम जरूर लगा दी है। इसे सीधे शब्दों में कहें तो पिछले दो महीने में शायद ही किसी ने नए कपड़े खरीदे होंगे। एक बात और ध्यान देने वाली है कि जब हम किसी शॉपिंग मॉल में जाते हैं तो हम उन चीजों को भी खरीद लेते हैं जिनकी हमें कुछ खास जरूरत नहीं होती है। ऐसे में हमारा महीने का खर्च बढ़ जाता है लेकिन लॉकडाउन में इस पर लगाम लगी है।
साफ-सफाई:- 
कोरोना महामारी फैलने के बाद हमें साफ-सफाई की अहमियत समझ में आई है। मेट्रो की सीढ़ियों के हैंडल पर हाथ रखकर चलना, बालकनी की रेलिंग को छूना, लिफ्ट में एक कोने में जाकर टेक लेना, नाखून चबाना, नाक में उंगली करना जैसी आदतें हमारी दिनचर्या में शामिल थीं जो अब धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं। बैचलर्स को लेकर कहा जाता है कि वे साफ-सफाई से नहीं रहते, लेकिन कोरोना महामारी ने उन्हें भी बदल दिया है।
आत्म निर्भरता:- 
बचपन से ही हमें मां-बाप से सीख मिलती है कि बेटा आत्म निर्भर बनो। लड़का हो या लड़की उसे घर-गृहस्थी का काम तो आना ही चाहिए, हालांकि कई लोग इन सब बातों को नहीं मानते। ऐसे लोग फिर होटल, टिफिन या फिर ऑनलाइन खाना डिलिवर करने वाली कंपनियों पर निर्भर रहते हैं, लेकिन लॉकडाउन ने यह बता दिया कि गृहस्थी का काम सीखना कितना जरूरी है। लॉकडाउन में सबसे अधिक परेशानी ऐसे लोगों को ही हो रही है।
मेल-मिलाप का तरीका:- 
आमतौर पर हम जब किसी से मिलते हैं तो हाथ मिलाते हैं या फिर कोई ज्यादा करीबी होता है तो उसे लगे से लगाते हैं, लेकिन कोरोना फैलने के बाद मेल-मिलाप का तरीका बदल गया है और उम्मीद है कि कोरोना खत्म होने के बाद भी यह जारी रहेगा। कोरोना खत्म होने के बाद भी लोग एक-दूसरे से हाथ मिलाने से कतराएंगे। ऐसे में मिलने का तरीका शुरुआत में नमस्ते ही होगा। 
जंक फूड से तौबा:- 
सोशल मीडिया पर आपको तमाम ऐसे पोस्ट मिल जाएंगे जिनमें लिखा हुआ मिल जाएगा कि आपुन को समोसा मांगता है, आपुन को मोमोज मांगता है और आपुन को गोलगप्पे मांगता है। डॉक्टर्स ने हमेशा से जंक और फास्ट फूड खाने से मना किया है। यह बात लॉकडाउन में साबित भी हो गई कि जंक फूड नहीं खाने से कोई बीमार नहीं पड़ता, बल्कि खाने के बाद बीमार जरूर हो सकता है। उम्मीद यही है कि लॉकडाउन खुलने के बाद फास्ट फूड से लोगों को कुछ खास लगाव नहीं रहेगा।
नशा शराब आदि:- 
लॉकडाउन में सबसे ज्यादा परेशानी जिन लोगों को हो रही है उनमें नियमित रूप से शराब सेवन करने वाले भी शामिल हैं। जो लोग रोज शराब पीते थे वे भी आज आराम से घरों में बिना शराब पीए रह रहे हैं और 21 दिन किसी आदत को छुड़ाने के लिए काफी होता है। संभव है कि लॉकडाउन खुलने के बाद कुछ लोग शराब पीना छोड़ दें। सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि लॉकडाउन के कारण घर ही नशामुक्ति केंद्र बन गया है।
परिवार से लगाव:- 
लॉकडाउन और कोरोना ने लोगों के पारिवारिक रिश्ते को मजबूत किया है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। जो लोग कल तक परिवार से दूर भाग रहे थे उन्हें भी आज परिवार की याद आ रही है। लॉकडाउन की वजह से लोगों को अपने बच्चों और परिवार के साथ वक्त बिताने का मौका मिला है जिसका सुखद परिणाम भविष्य में देखने को मिलेगा। कोरोना खत्म होने के बाद लोगों के पारिवारिक रिश्तों में मजबूती देखने को मिलेगी।
मांसाहार में कमी:- 
लॉकडाउन और कोरोना वायरस खत्म होने के बाद चिकन, मटन खाने वालों की संख्या में कमी देखने को मिल सकती है, क्योंकि लोगों की जेहन में यह बात धीरे-धीरे घर कर रही है कि मांसाहार से बीमारियां हो सकती हैं। कोरोना का संक्रमण फैलने के शुरुआती दौर में ही लोगों ने चिकन खाना बंद कर दिया था जिसकी वजह से महाराष्ट्र में पॉल्ट्री किसानों को लाखों का नुकसान हुआ, जबकि स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि चिकन से कोरोना फैलने की अभी तक कोई पुष्टि नहीं है।
वर्क फ्रॉम होम:- 
कुछ दिन पहले एक रिपोर्ट आई थी जिसमें अनुमान लगाया गया था कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी कई कंपनियां वर्क फ्रॉम होम के लिए राजी हैं। लॉकडाउन खत्म होने के बाद वर्क फ्रॉम होम (घर से ऑफिस का काम) एक ट्रेंड बन सकता है, क्योंकि वर्क फ्रॉम होम की स्थिति में कर्मचारी के लिए ऑफिस में कोई सेटअप की जरूरत नहीं है। इसके अलावा बिजली-पानी जैसे अन्य खर्च भी नहीं हैं| कई ऐसी कंपनियां पहले से ही वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दे रही हैं।
भीड़-भाड़ से दूरी:- 
लॉकडाउन के बाद इसकी पूरी संभावना है कि लोग भीड़-भाड़ वाले इलाके में जाने से ठीक उसी तरह परहेज करेंगे जिस तरह लॉकडाउन में कर रहे हैं। बाजार, मॉल और मेले में भी लोग जाएंगे लेकिन एक-दूसरे से एक तय दूरी का जरूर ख्याल रखेंगे और वैसे भी भीड़-भाड़ वाले इलाके से दूर रहना कोई बुरी बात नहीं है।

Friday, April 17, 2020

4/17/2020 07:21:00 AM

Coronavirus होने से पहले पैर पर नजर आते हैं ऐसे निशान, देखें तस्वीरें और रहें अलर्ट

दिल्ली। कोरोना वायरस की अब तक कोई दवा नहीं बन पाई है और इसके नए-नए लक्षण डॉक्टरों को हैरानी में डाल रहे हैं। ताजा समाचार यह है कि कोरोना वायरस होने से पहले पैरों पर अजीब निशान दिखाई पड़ते हैं। ये निशान ऐसे होते हैं मानों त्वचा के उस स्थान पर खून जम गया हो। स्पेन के वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया और दावा किया है कि यह कोरोना वायरस का बेहद शुरुआती लक्षण है। द स्पेनिश जनरल काउंसिल ऑफ ऑफिशियल पोडियेट्रिक कॉलेज के अनुसार, इटली के साथ ही फ्रांस और स्पेन में ऐसे लक्षण मिले हैं। जानिए ताजा खुलासे के बारे में -
कोरोना वायरस के बदलते लक्षण:-
बता दें, सबसे पहले कहा गया था कि सर्दी, जुकाम, खांसी, गले में दर्द, बुखार कोरोना वायरस के सामान्य लक्षण है। अब तक भी जिन लोगों में ये संकेत नजर आ रहे हैं, उन्हें कोरोना वायरस संदिग्ध मानकर इलाज किया जा रहा है। इसके बाद बताया गया कि मरीजों में सूंघने की क्षमता भी कम हो रही है। इसके बाद आंखों में जलन और दर्द को भी कोरोना वायरस का लक्षण बताया गया। अब यह खुलासा हुआ है।
बच्चों के पैरों में नजर आ रहे ये निशान:-
स्पेन की उक्त संस्था का दावा है कि कोरोना वायरस होने से पहले पैर में ये निशान होने के अधिकांश मामले बच्चों में सामने आए हैं। जारी बयान में कहा गया है कि शुरू में ये निशान पीले होते हैं। ठीक उसी तरह जैसे चिकनपॉक्स, खसरा या चिलब्लेंस में होते हैं। ये निशान आमतौर पर पैर की उंगलियों पर दिखाई देते हैं और आम तौर पर बगैर कोई निशान छोड़े ठीक हो जाते हैं।

दुनियाभर में कर दिया गया अलर्ट:-
द स्पेनिश जनरल काउंसिल ऑफ ऑफिशियल पोडियेट्रिक कॉलेज के अनुसार, दुनियाभर में डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को इस बारे में अलर्ट कर दिया गया है, क्योंकि इन निशानों को भांप कर जितनी जल्दी इलाज किया जाएगा, मरीज को उतनी जल्दी कोरोना वायरस से मुक्ति मिलेगी।