Breaking

Showing posts with label JARA HATKE. Show all posts
Showing posts with label JARA HATKE. Show all posts

Saturday, May 23, 2020

5/23/2020 05:07:00 AM

कपड़ों की जगह पारदर्शी PPE किट पहन पहुंची नर्स, तस्वीर वायरल सोशल मीडिया पर चर्चा

मास्को। रूसी अस्पताल के पुरुष कोरोना वार्ड में अंडरगारमेंट्स के ऊपर पारदर्शी पीपीई किट पहनने वाली नर्स को अब अपनी नौकरी जाने का डर लग रहा है। बता दें कि इस महिला नर्स की तस्वीर सोशल मीडिया में खूब वायरल हुई थी, जिसके बाद रूसी क्षेत्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी। मंत्रालय ने कहा कि नर्स ने यूनिफार्म के नियमों को तोड़ा है इसलिए उसके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।
समर्थन में उतरे डॉक्टर्स और नेता:-
महिला नर्स के समर्थन में अस्पताल के डॉक्टर्स, दूसरे सहकर्मी और राजनेता भी उतर आए हैं। उन्होंने अस्पताल प्रशासन पर आरोप लगाते हुए मांग की है कि कोरोना वायरस वार्ड में काम करने वालों को सही पीपीई किट मुहैया कराएं। उन्होंने कहा कि जो पीपीई किट उपलब्ध करवाया गया वह इतना पतला था जो स्वास्थ्यकर्मियों को नुकसान पहुंचा सकता है।
सोशल मीडिया में तस्वीर वायरल:-
मास्को के 100 मील की दूरी पर स्थित टूला के रीजनल क्लिनिकल हॉस्पिटल में एक मरीज ने इस तस्वीर को सोशल मीडिया में पोस्ट किया था। नर्स ने अपनी सफाई में अस्पताल प्रशासन से कहा कि उसे इस बात का अहसास नहीं था कि उसने जो पीपीई किट पहना है वह ज्यादा पारदर्शी है।
अस्पताल प्रशासन ने शुरू कार्रवाई:-
अस्पताल प्रशासन ने जांच के दौरान पहले कहा कि महिला ने पीपीई किट के नीचे अंडर गारमेंट्स पहना था। लेकिन, उन्होंने बाद में दावा किया कि वह अंडर गारमेंट नहीं बल्कि स्विमिंग सूट था। बता दें कि नर्स ने घटना पर सार्वजनिक रूप से बात नहीं की है और उसके खिलाफ अब अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा रही है।
सोशल मीडिया में चर्चा:-
हालांकि सोशल मीडिया में कई लोगों ने नर्स का सपोर्ट भी किया, वहीं कई ने आलोचना भी की। समर्थकों ने कहा कि चिल्लाना तो अस्पताल प्रबंधन पर चाहिए, महिला नर्स ने गर्मी के कारण ऐसा किया। जबकि कई ने कहा कि घोर निराशा से डूबे कोरोना वायरस के मरीजों में आशा का संचार किया।
रूस में कोरोना के 3 लाख से ज्यादा मामले:-
बता दें कि रूस में कोरोना संक्रमण के तीन लाख से ज्यादा मामले सामने आए हैं जबकि, 2837 मरीजों की मौत हो चुकी है। कई विशेषज्ञों ने रूस में कोरोना के मरीजों के मौत पर सवाल भी उठाए हैं।

Thursday, May 7, 2020

5/07/2020 05:17:00 AM

जानिए क्यों है शराब की बिक्री राज्य सरकारों के लिए इतनी जरूरी, कमाई सुनकर रह जाएंगे हैरान

दिल्ली। शराब दूकानें खुलने के बाद देश में इसे लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं लेकिन जानिए क्यों राज्यों के लिए है यह इतनी अहम... 4 मई से जहां देश में Lockdown 3.0 की शुरुआत हुई है वहीं दूसरी तरफ देश के कई राज्यों में शराब दुकानें भी खुल गई हैं। इन शराब दुकानों को खोलने का फैसला केंद्र सरकार का था जिस पर ज्यादातर राज्यों ने मुहर लगा दी। नतीजा यह निकला कि पहले दिन जब कर्नाटक, यूपी, महाराष्ट्र और दिल्ली जैसे राज्यों में शराब की ये दुकनें खुलीं तो लोग टूट पड़े। शराब के शौकीन कहिए या फिर शराब के दीवाने, हजारों की भीड़ किसी भी नियम और कानून की परवाह किए बगैर, लॉकडाउन की धज्जियां उड़ाते हुए शराब दुकानों पर ऐसे झूम उठी जैसे मधुमक्खियां छत्ते में नजर आती हैं।
कर्नाटक में जहां पहले ही दिन 45 करोड़ की शराब बिक गई वहीं यूपी और दिल्ली में भी रिकॉर्ड टूटने वाले हैं। दिल्ली वालों ने तो शराब पर लगे 70 प्रतिशत टैक्स के बावजूद जी भर के पी है। हालात तो ये हो गए कि लोग सोशल मीडिया में शराब के इन दीवानों को अर्थव्यस्था का अहम योगदानकर्ता तक कहने लगे। असल में ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि शराब से मिलने वाला रेवेन्यू किसी भी राज्य के अपने टैक्स रेवेन्यू का तीसरा बड़ा हिस्सा पैदा करता है।
शराब से मिलने वाला रेवेन्यू किसी भी राज्य में आसान और सबसे बड़ी कमाई है। वहीं राज्य में पब्लिक और प्राइवेट ट्रांसपोर्ट के अलावा दूसरी चीजों से मिलने वाला रेवेन्यू सीमित होता है। हालांकि, इसके बावजूद गुजरात और बिहार में इसी सबसे ज्यादा रेवेन्यू देने वाली शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा है।
दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, असम, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और राजस्थान ऐसे राज्य हैं जिन्होंने 4 मई से शराब की बिक्री की मंजूरी दे दी है लेकिन वो भी चुनिंदा जगहों पर। जहां तक एक्साइज या आबकारी टैक्स की बात है तो राज्यों के लिए यह रेवेन्यू का बड़ा साधन है। 2019-20 में शराब ने ही इसका 12.5 प्रतिशत रेवेन्यू दिया है। राज्यों को सबसे ज्यादा कमाई पेट्रोलियम उत्पादों पर स्टेट गुड्स एंड सर्विस टैक्स (SGST) और वैट या सेल्स टैक्स से होती है।
पेट्रोलियम प्रोडक्ट पर GST लागू नहीं होता है और ऐसे में हर राज्य अपने अनुसार इन पर वैट या सेल्स टैक्स वसूलता है। राज्यों के अपने रेवेन्यू में SGST का 2019-20 में हिस्सा 43.5 प्रतिशत था वहीं पेट्रोलियम उत्पादों पर सेल्स और वेट 23.2 प्रतिशत था।
राज्यों का बजट और एक्साइज ड्यूटी:-
रिजर्व बैंक द्वारा स्टेट फाइनेंसेस में दी गई राज्यों के बजट की जानकारी के अनुसार 2019-20 में राष्ट्रीय स्तर पर शराब की सेल पर लगी एक्साइज ड्यूटी 1.75 लाख करोड़ थी। बता दें कि राज्यों के अपने टैक्स से मतलब उन टैक्सेस से है जो राज्य सरकारें लगाती हैं। मसलन पेट्रोल और शराब पर लगने वाला टैक्स राज्य सरकारें बढ़ा और घटा सकती हैं।
शराब से संभावित टैक्स कलेक्शन:-
रिजर्व बैंक ने अपनी स्टडी में बताया गया है कि उत्तर प्रदेश में शराब से 31,517 करोड़ की एक्साइज ड्यूटी मिलने वाली है वहीं कर्नाटक को 20,950 करोड़ के रेवेन्यू का अनुमान जताया गया था जबकि पश्चिम बंगाल को 11.873 करोड़ का। 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों दिल्ली और पुडुचेरी ने संयुक्त रूप से 1.75 लाख करोड़ का रेवेन्यू पाया जो कि 2018-19 के मुकाबले 16 प्रतिशत ज्यादा था। औसतन राज्यों ने हर महीने 12,500 करोड़ रुपए का रेवेन्यू 2018-19 में कमाया जो बढ़कर 2019-20 में 15,000 करोड़ प्रति माह हो गया।
राज्यों के अलग-अलग टैक्स की बात करें तो पिछले वित्त वर्ष में यूपी ने हर महीने शराब से औसतन 2,500 करोड़ टैक्स के रूप में कमाए वहीं इस वित्त वर्ष में इसके बढ़कर 3000 करोड़ होने की उम्मीद जताई गई थी।
राज्यों के टैक्स:-
जहां तक शराब पर टैक्स की बात है तो कई राज्य वैट और एक्साइज ड्यूटी के अलावा शराब के विदेशी ब्रांड्स पर भी टैक्स वूसलते हैं जैसे तमिलनाडु में किया जाता है। वहीं यूपी में शराब पर अलग से विशेष टैक्स भी लगाया जाता है जिसका उपयोग विभिन्न कामों के लिए किया जाता है।
कौन सा राज्य कमाता है सबसे ज्यादा टैक्स:-
अगर इसकी बात करें तो फिलहाल राज्यों के वित्त वर्ष 2018-19 के ही आंकड़े उपलब्ध हैं और इनके अनुसार पांच राज्यों ने इस दौरान सबसे ज्यादा एक्साइज ड्यूटी कमाई. इनमें उत्तर प्रदेश ने सबसे ज्यादा 25,100 करोड़, कर्नाटक ने 19,750 करोड़, महाराष्ट्र ने 15,343 करोड़, पश्चिम बंगाल ने 10,554 करोड़ और तेलंगाना ने 10,313 करोड़।

Saturday, May 2, 2020

5/02/2020 02:54:00 PM

DNA ANALYSIS: कोरोना काल ने दिए अंतिम संस्कार के नये 'संस्कार'

नई दिल्ली: इरफान खान के जनाजे में सिर्फ 12 लोग शामिल हुए थे, जबकि ऋषि कपूर के अंतिम संस्कार में भी सिर्फ 20 लोगों को ही शामिल होने की इजाजत मिली. यानी कोरोना वायरस के सामने हर कोई मजबूर है. पूरी दुनिया में मृत लोग अब सिर्फ एक शरीर बनकर रह गए हैं. परिवार का कोई सदस्य भी अब मरने वाले के शरीर को गले नहीं लगा सकता, छूकर अंतिम स्पर्श की अऩुभूति भी नहीं कर सकता. यानी इंसानी भावनाओं के बीच भी कोरोना वायरस की दीवार आ गई है. वैसे तो शरीर नश्वर ही होता है, लेकिन जिन शरीरों में हम जीवन भर सांस लेते हैं, उसकी ये नियति दिल तोड़ने वाली है. कई लोगों के लिए जीवन के साथ-साथ अंतिम यात्रा भी अब अकेलेपन का नाम बन गई है और अंतिम बार अलविदा कहने की रस्में पहले से छोटी हो गई हैं.
हिंदुओं के अंतिम संस्कार सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुए किए जा रहे हैं. मृत लोगों की अस्थियां विसर्जन के लिए लंबा इंतजार कर रही हैं. मुस्लिम और ईसाई धर्म में शव को दफनाने की परंपरा है, लेकिन ये परंपरा भी अब बदलने लगी है. इन धर्मों में जब किसी के शव को दफनाया जाता है तो बहुत सारे लोग मिलकर धीरे धीरे ताबूत को कब्र में उतारते हैं. ताबूत बहुत भारी होते हैं लेकिन लोगों की संख्या कम होने की वजह से अब इन ताबूतों को धीरे धीरे उतारने की बजाय सीधे कब्र में धक्का दे दिया जाता है.
अमेरिका जैसे देशों में तो अंतिम संस्कार को लेकर नियम बहुत कड़े हैं. वहां शवों को एक नहीं बल्कि दो-दो बॉडी बैग्स में बंद किया जाता है और शव का चेहरा भी फेस मास्क से ढंका जाता है. 50-60 साल के वैवाहिक जीवन के बाद भी लोग अंतिम संस्कार के दौरान अपने मृत जीवन साथी को गले तक नहीं लगा पा रहे. बहुत सारे देशों में तो अब अंतिम सस्कार को ऑनलाइन देखने की व्यवस्था की गई है. यानी अगर आपको किसी को श्रद्धांजलि देनी है तो ऐसा आप अपने घर पर रहते हुए भी कर सकते हैं. इसी तरह इस दौरान जिन बच्चों का जन्म हो रहा है उनके चेहरों को पैदा होते ही फेस शील्ड से ढंक दिया जा रहा है. अगर मां को कोरोना वायरस है तो वो अपने बच्चे को सीने से भी नहीं लगा सकती. कुल मिलाकर एक महामारी ने मृत्यु और जन्म की प्रथाओं को हमेशा के लिए बदल दिया है.
वर्ष 2012 में इरफान की खान की एक फिल्म Life Of Pi आई थी इसमें इरफान कहते हैं कि अगर आप जीवन के अंत को स्वीकार भी कर लें तो भी ये स्वीकार करना बहुत मुश्किल है कि आप अपनों को आखिरी बार अलविदा नहीं कह पाए. आध्यात्मिक गुरु ओशो ने एक बार कहा था कि हर इंसान मृत्यु से भयभीत है, इसकी वजह सिर्फ़ ये है कि उसने जीवन का स्वाद कभी लिया ही नहीं है. ओशो ने अपने प्रवचन में कहा था कि जो व्यक्ति ये जानता है कि जीवन क्या है, वो कभी मृत्यु से नहीं डरता, वो मृत्यु का स्वागत करता है.
एक सच ये भी है कि मृत्यु भेदभाव नहीं करती, जबकि जन्म हमेशा भेदभाव करता है, अन्याय करता है. आपने गौर किया होगा कि जन्म होते ही इंसान की पहचान और उसका जीवन, धर्म, जाति, देश और अमीरी या ग़रीबी के आधार पर बंट जाता है. जन्म लेते ही ये तय हो जाता है कि कोई किस जाति या धर्म से होगा. किसी भी इंसान का जन्म किसी अमीर के घर में हो सकता है या किसी गरीब के घर में भी हो सकता है. इस पर किसी का वश नहीं होता. इसी तरह कोई संपन्न देश में पैदा होता है, तो कोई गरीब देश का निवासी बन जाता है. हैरानी की बात ये है कि जीवन का पूरा चक्र इस बात पर निर्भर है कि आप कहां पैदा होंगे और किस घर में पैदा होंगे, जबकि मृत्यु के मामले में कुछ भी तय नहीं है. मृत्यु की रेखा के पार हर व्यक्ति बराबर है, मृत्यु फिल्म नहीं देखती, मृत्यु खेल नहीं देखती, मृत्यु किसी स्टारडम से प्रभावित नहीं होती. मृत्यु बंटवारा नहीं करती, वो राजा और रंक को बराबरी पर लाकर खड़ा कर देती है. ये वो आध्यात्मिक सत्य है जो हर इंसान को याद रखना चाहिए. जीवन भले ही धर्म और पंथ निरपेक्ष ना हो, लेकिन मृत्यु धर्मनिरपेक्ष और पंथ निरपेक्ष है. मृत्यु के दरबार में हर कोई बराबर है.

Monday, April 27, 2020

4/27/2020 03:59:00 AM

UAE के अरबपति बिजनस टायकून भारतीय मूल के बीआर. शेट्टी की आसमान से फर्श तक पहुंचने की कहानी

नई दिल्ली। संयुक्त अरब अमीरात में कई मुकदमों का सामना कर रहे वहां की सबसे बड़ी हेल्थकेयर कंपनी के मालिक बी .आर. शेट्टी का सितारा डूब रहा है। भारतीय मूल के अरबपति शेट्टी की कंपनियां पांच अरब डॉलर के कर्ज में डूबी हैं, बल्कि इनके खिलाफ फर्जीवाड़े की जांच भी की जा रही है और उनकी कंपनियों के शेयरों को स्टॉक एक्सचेंज पर कारोबार करने पर रोक दिया गया है।
मामले से जुड़े एक सूत्र ने वेबसाइट अरेबियन बिजनस को यह जानकारी दी है कि एनएमएसी हेल्थ तथा यूएई एक्सचेंज कंपनियों के खिलाफ मामलों का सामना कर रहे भारतीय मूल के अरबपति बी .आर. शेट्टी भारत में हैं। सूत्रों ने बताया, 'लंबे वक्त से वह यूएई में नहीं हैं। मेरे हिसाब से वह लगभग एक महीने से देश में नहीं हैं।' उन्होंने कहा कि शेट्टी तथा उनकी कंपनी एनएमसी के खिलाफ कम से कम पांच मामले चल रहे हैं।
मात्र 8 डॉलर लेकर पहुंचे थे यूएई:-
यूएई में हेल्थकेयर इंडस्ट्री में काफी संपत्ति बनाने वाले 77 साल के शेट्टी पहले भारतीय हैं। उन्होंने 1970 में एनएमसी हेल्थ की शुरुआत की थी, जो आगे चलकर साल 2012 में लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होने से पहले देश की अपने तरह की पहली कंपनी बनी। 70 के दशक में शेट्टी महज आठ डॉलर लेकर यूएई पहुंचे थे और मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत की थी।
फाइनैंस के क्षेत्र में भी रखा कदम:-
उन्होंने 1980 में अमीरात के सबसे पुराने रेमिटेंस बिजनस यूएई एक्सचेंज की शुरुआती की। यूएई एक्सचेंज, यूके की एक्सचेंज कंपनी ट्रैवलेक्स तथा कई छोटे-छोटे पेमेंट सॉल्यूशंस प्रोवाइडर्स तथा शेट्टी की फिनब्लर के साथ मिलकर 2018 में सार्वजनिक हुई। शेट्टी ने हेल्थकेयर और फाइनैंशल सर्विसेज के अलावा हॉस्पिटेलिटी, फूड ऐंड बीवरेज, फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग तथा रियल एस्टेट में भी हाथ आजमाया।
एक रिपोर्ट छपी और फूटी किस्मत:-
शेट्टी के बिजनस को तब करारा झटका लगा, जब पिछले साल दिसंबर में मड्डी वाटर रिसर्च के फाउंडर तथा शॉर्ट सेलर कारसन ब्लॉक ने अपनी एक रिपोर्ट में एनएमसी हेल्थ पर संपत्ति का फर्जी आंकड़ा देने तथा कंपनी की संपत्तियों की चोरी का आरोप लगाया। इसके महज तीन महीने के बाद ही एनएमसी के शेयरों को लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर कारोबार करने से रोक दिया गया और दो सप्ताह पहले इसने घोषणा की कि उसपर लगभग 5 अरब डॉलर (लगभग 40 हजार करोड़ रुपये) का कर्ज है।
केंद्रीय बैंक ने शुरू की जांच:-
यूएई एक्सचेंज ने इस सप्ताह अपनी शाखाओं तथा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए नया लेनदेन बंद कर दिया, क्योंकि यूएई के केंद्रीय बैंक ने घोषणा की थी कि उसने यूएई एक्सचेंज के खिलाफ जांच शुरू की है और इसके ऑपरेशंस मैनेजमेंट की जांच करेगा।
शेट्टी का बुर्ज खलीफा में है दो फ्लोर:-
यूएई में शेट्टी की निजी संपत्तियों में दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा में दो फ्लोर और पॉम जुमेरिया में एक विला है। पिछले साल सितंबर में उन्होंने अरेबियन बिजनस से बातचीत में कहा, 'चुनौतियां हर वक्त होती हैं, लेकिन जब आप उनके सामने नहीं झुकते हैं और सही तरीके से काम करते हैं तो वह आपके रास्ता से हट जाता है। हम नंबर वन हैं।

Saturday, April 25, 2020

4/25/2020 05:21:00 AM

DNA ANALYSIS: तीसरा 'विश्वयुद्ध' शुरू हो चुका है, क्या आपको इसका अहसास है?

जरा हटके। कोरोना वायरस के दम पर चीन ने पूरी दुनिया के खिलाफ तृतीय विश्वयुद्ध छेड़ दिया है. चीन इस विश्वयुद्ध की तैयारी बहुत पहले से कर रहा था.  चीन इस युद्ध को तीन चरणों में अंजाम तक पहुंचाना चाहता है. इसका पहला चरण है दुनिया को धोखा देना. दूसरा चरण है पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर अराजकता फैलाना और तीसरा चरण है दुनिया के लोगों का दमन और शोषण करना. 
वर्ष 1945 में जापान के हिरोशिमा पर अमेरिका ने जो एटम बम गिराया था उसका द्रव्यमान यानी मास सिर्फ 0.7 ग्राम था. इसी तरह नागासाकी पर गिराए गए एटम बम का द्रव्यमान सिर्फ एक ग्राम था.  ये एक चुटकी नमक के बराबर है । लेकिन परमाणु बम इसी मामूली सी शक्ति को असीम ऊर्जा में बदल देता है जिसका नतीजा सिर्फ और सिर्फ तबाही होता है। इसी तबाही के साथ दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हो गया था।

लेकिन आज 75 वर्षों के बाद दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध में जा चुकी है और आपको इसका पता भी नहीं चला. इस युद्ध के केंद्र में कोई बड़ा हथियार, मिसाइलें या फिर एटम बम नहीं है, बल्कि सिर्फ एक वायरस है. इस वायरस का वजन परमाणु बम के द्रव्यमान से भी लाखों करोड़ गुना कम है. लेकिन इस वायरस में भी दुनिया को तबाह करने की असीम शक्ति समाई हुई है. इसी वायरस के दम पर चीन ने पूरी दुनिया के खिलाफ तृतीय विश्वयुद्ध छेड़ दिया है. चीन इस विश्वयुद्ध की तैयारी बहुत पहले से कर रहा था. चीन इस युद्ध को तीन चरणों में अंजाम तक पहुंचाना चाहता है. इसका पहला चरण है दुनिया को धोखा देना. दूसरा चरण है पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर अराजकता फैलाना और तीसरा चरण है दुनिया के लोगों का दमन और शोषण करना.
चीन इस युद्ध के किस चरण में है ये हम आपको आगे बताएंगे लेकिन पहले ये समझ लीजिए कि किसी भी बड़े युद्ध या यूं कहें कि विश्वयुद्ध की पहचान क्या होती है. इसकी पहली पहचान होती है, हर तरफ मौत और दुख का पसर जाना. इसकी दूसरी पहचान है अर्थव्यवस्थाओं का दम तोड़ना. तीसरी पहचान है जरूरी चीज़ों की आपूर्ति में कमी आना. चौथी पहचान है नए इलाकों पर कब्ज़ा करना और पांचवी और आखिरी पहचान है नई ताकतों का उदय. 

आप गौर करेंगे तो आपको ये पांचों बातें इस समय आपके आस पास घटित होती दिखाई देंगी. पूरी दुनिया में करीब 27 लाख लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं. 1 लाख 91 हज़ार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और अमेरिका जैसा दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश इस वायरस से ऐसे लड़ रहा है. जैसे वो तीसरी दुनिया का देश है. अमेरिका में 8 लाख से ज्यादा लोगों को संक्रमण हो चुका है और 50 हज़ार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं.
अब आप सोचिए जिस देश को दुनिया का लीडर कहा जाता था, जिस देश के बारे में कहा जाता था कि वो दुनिया की कोई भी समस्या अपनी सैन्य ताकत या फिर पैसों के दम पर सुलझा सकता है. वो देश आज अपने हजारों लाखों लोगों का जीवन नहीं बचा पा रहा. ऐसे में अब पूरी दुनिया में अमेरिका का भला क्या महत्व रह जाएगा? यानी चीन बिना परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किए सिर्फ एक कीटाणु के दम पर अमेरिका को घुटनों पर लाने में सफल रहा है. वायरस सीमाएं नहीं देखता और इसकी सबसे ज्यादा मार विकसित और अमीर देशों पर ही पड़ी है. फ्रांस में 21 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. इटली में 25 हज़ार से ज्यादा तो ब्रिटेन में 18 हजार से ज्यादा लोग मारे गए हैं.
इतना ही नहीं, अमेरिका समेत दुनिया की बड़ी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी दम तोड़ रही हैं. इस वर्ष दुनिया की GDP माइनस 3 रहने का अनुमान है. 1930 के बाद से सबसे बड़ी आर्थिक मंदी दस्तक दे चुकी है. अमेरिका में करीब 2 करोड़ 60 लाख लोग बेरोजगार हो चुके हैं. अमेरिका में इस समय बेरोजगारी दर 1930 के बाद से सबसे ज्यादा है. फ्रांस जैसे देश में तो प्राइवेट नौकरी करने वाले 50 प्रतिशत लोगों के पास आज रोजगार नहीं है. चीन इस मौके का फायदा उठाकर पूरी दुनिया में निवेश कर रहा है और बड़ी-बड़ी कंपनियां सस्ते दामों पर खरीद रहा है. यानी चीन चाहता है कि आने वाले समय में आपकी तन्ख्वाहें चीन से ही आए.

पूरी दुनिया में लोगों की जान बचाने के लिए जिन उपकरणों और दवाइयों की जरूरत है उनकी भारी कमी हो गई है. चीन अब पूरी दुनिया को घटिया मेडिकल उपकरणों की सप्लाई कर रहा है और उसने इस महामारी के बीच भी मुनाफा कमाने का तरीका ढूंढ लिया है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि दुनिया के करीब साढ़े 26 करोड़ लोगों के पास भोजन की भयंकर कमी हो सकती है. एक अनुमान के मुताबिक करीब 55 देश ऐसे हैं जिनके पास इस वर्ष के अंत तक पौष्टिक भोजन की कमी हो जाएगी.
●चीन में पटरी पर लौटने लगा जीवन
चीन में जीवन पटरी पर लौटने लगा है. वहां सब कुछ सामान्य हो रहा है और चीन ने एक छोटे से ब्रेक के बाद अपनी विस्तारवाद वाली नीति का इंजन फिर से रीस्टार्ट कर दिया है. चीन ताइवान पर कब्जा करना चाहता है तो CPEC के बहाने उसने पाकिस्तान को भी अपना उपनिवेश बनाने की तैयारी कर ली है. इसके अलावा, हांगकांग के साथ विवाद और भी इसी का नतीजा है. इतना ही नहीं अब तक चीन विश्व स्वास्थ्य संगठन को भी पैसे देकर उसे अपनी तरफ करने की कोशिश में लग गया है. दक्षिण चीन सागर में भी चीन ने अपनी गतिविधियां बढा दी है और हाल ही में इस सागर में चीन और अमेरिका के कुछ वार शिप एकदूसरे के सामने आ गए थे और विवाद की स्थिति पैदा हो गई थी. जब पूरी दुनिया एक वायरस से जूझ रही है, तब चीन अपनी विस्तारवादी नीतियों को अंजाम देने में जुटा है. 
और चीन ने अमेरिका से उसकी कुर्सी छीनने की पूरी तैयारी कर ली है. इसके लिए चीन ने अमेरिका के साथ कोई सीधा युद्ध नहीं छेड़ा है बल्कि उसने ये काम आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और तकनीकी आधार पर शुरू कर दिया है. यानी अब दुनिया का शक्ति संतुलन बदलने लगा है और चीन का पलड़ा भारी होने लगा है. 
●चीन की ओर से दिखाई ना देने वाले विश्वयुद्ध
पहला विश्वयुद्ध करीब 4 वर्षों तक चला था. दूसरा विश्वयुद्ध करीब 6 वर्षों तक चला लेकिन ये तीसरा विश्वयुद्ध चीन अभी कम से कम तीन और दशकों तक लड़ना चाहता है. चीन ने इसकी तैयारी 1980 में कर ली थी. ये दिखाई ना देने वाले ऐसा विश्वयुद्ध है जिसे चीन तीन चरणों में अंजाम देना चाहता है. पहला चरण है दुनिया को धोखा देना. 1980 के दशक में चीन में आर्थिक उदारवाद का दौर शुरू हुआ. चीन ने अर्थव्यवस्था के दरवाज़े खोले तो अमेरिका ने उसका हाथ थाम लिया. क्योंकि अमेरिका को चीन जैसे बड़े बाज़ार की जरूरत थी लेकिन ये चीन का धोखा था. उदारवाद के बहाने से चीन ने अपने बहुत सारे लोगों को और छात्रों को अमेरिका जैसे देशों में भेजा. कहा जाता है कि यही Exchange Programmes चीन द्वारा अमेरिका की सीक्रेट टेक्नोलॉजी और सेना की रणनीतियों से जुड़े राज़ चुराने का जरिया भी बने. चीन ने अपने दरवाज़े दुनिया के लिए खोले तो बड़ी-बड़ी कंपनियां चीन आने लगीं.  इससे चीन को नए जमाने की तकनीक हासिल होती गई. 1990 से लेकर 21वीं सदी की शुरुआत तक, जब पश्चिम की ताकतें, मध्य और पश्चिम एशिया के विवादों में उलझी थीं, तब चीन चुप चाप बड़ी शांति से अपनी योजना को अमल में लाता रहा. चीन इन विवादों में नहीं उलझा बल्कि उसने उन देशों में अपना वर्चस्व बढ़ाना शुरू किया जिनकी अर्थव्यवस्थाएं कमजोर थीं. उसने अफ्रीकी देशों से लेकर श्रीलंका, बांग्लादेश, क्यूबा, यूक्रेन, पाकिस्तान, इक्वाडोर और ताजिकिस्तान जैसे देशों में भारी भरकम निवेश किया. 
अफ्रीका में चीन ने वर्ष 2015 तक साढ़े 4 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया था जो 2018 तक बढ़कर साढ़े 22 लाख करोड़ रुपये हो गया है. चीन दुनिया का अकेला ऐसा व्यापारी है जो दूसरों को उधार देने के बाद, कभी उधार वापस नहीं मांगता. चीन सिर्फ ये चाहता है कि ये देश कभी उसका उधार चुका ही ना पाएं, ताकि चीन इनके बदले में उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर कब्ज़ा कर ले, उनकी बड़ी बड़ी कंपनियों को कौड़ियों के भाव खरीद ले, बंदरगाहों पर कब्ज़ा कर ले, वहां अपने सैन्य ठिकाने बना ले और उधार के बदले में इन देशों को अंत में अपना उपनिवेश बना ले. 
ये तो हुई छद्म उदारवाद और आर्थिक धोखे की बात लेकिन आधुनिक दुनिया के विश्वयुद्ध सिर्फ इन दो बातों के दम पर नहीं जीते जा सकते.  इनमें मनोविज्ञान और वैचारिक वायरस की भी जरूरत पड़ती है. इसके लिए चीन ने दुनियाभर की यूनिवर्सिटीज में ऐसे कैंपस खोले, जहां चीन के दार्शनिक विचारों को पढ़ाया जाता है. ये देखकर लोगों को लगता है कि चीन तो बहुत दार्शनिक देश है, उसकी भला क्या महत्वाकांक्षाएं हो सकती हैं लेकिन ये भी चीन का एक बड़ा धोखा है. चीन ने दुनिया के बडे-बड़े थिंक टैंक यही वजह है कि इस महामारी के बावजूद ज्यादातर थिंक टैंक, नीति निर्माता, विश्व की संस्थाएं और विदेशी पत्रकार चीन की आलोचना से बच रहे हैं. 
चीन ने अपनी जिस विचारधारा को पूरी दुनिया में फैलाया उसके अवशेष भारत में भी दिखाई देते हैं. Peopel's Republic Of china के संस्थापक माओ जेडोंग के विचार भारत में भी माओवाद और नक्सलवाद का आधार माने जाते हैं. अब कुछ आंकड़ों की मदद से समझिए कि चीन इस युद्ध को कैसे दूसरे चरण में ले जा चुका है. इस विश्व युद्ध का दूसरा चरण है पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर अराजकता पैदा करना. 27 लाख से ज्यादा लोगों के संक्रमित होने के बाद और 1 लाख 93 हज़ार से ज्यादा लोगों के मारे जाने के बाद दुनिया में फैली अराजकता सबको दिखाई दे रही है लेकिन इस दौरान सबसे ज्यादा फायदा चीन को ही हो रहा है. पूरी दुनिया में जितनी चीज़ों का उत्पादन होता है उसमें से 28.4 प्रतिशत चीन में ही बनाई जाती है. 16.6 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ अमेरिका दूसरे नंबर पर है जबकि तीसरे नंबर पर मौजूद जापान की हिस्सेदारी 7.2 प्रतिशत है. दुनिया के कुल उत्पादन में भारत समेत बाकी देशों की कितनी हिस्सेदारी है उसका आंकड़ा इस समय आपकी स्क्रीन पर है. चीन ने पिछले कुछ वर्षों में खुद को दुनिया की फैक्ट्री बना लिया और अब दुनिया के लिए एक झटके में इस फैक्ट्री पर ताला लगाना संभव नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर दुनियाभर में जरूरी चीज़ों की आपूर्ति पूरी तरह बाधित हो जाएगी, जिसके बाद हालात और भयावह हो सकते हैं. 
चीन ने सिर्फ गरीब देशों को ही उधार बांटकर अपना शिकार नहीं बनाया है बल्कि अमेरिका जैसे देश में भी चीन ने यही चाल चली है. अमेरिका पर सबसे ज्यादा उधारी जापान की है. जो करीब 95 लाख 25 हज़ार करोड़ रुपये के बराबर है. दूसरे नंबर पर चीन है जिसने अमेरिका को 82 लाख करोड़ रुपये उधार दिए हुए हैं. अगर चीन का ये उधार अमेरिका की जनसंख्या के बीच बराबर बांट दिया जाए तो हर अमेरिकी को चीन को ढाई लाख रुपये चुकाने पड़ेंगे. अब अमेरिका जैसे देशों को डर ये है कि अगर चीन ने अपने ये पैसे निकाल लिए तो फिर अमेरिका की अर्थव्यवस्था और बड़े संकट में चली जाएगी और यहीं से इस विश्व युद्ध का दूसरा चरण शुरू होता है जिसकी झलक आप इन दिनों देख रहे हैं. 
चीन इस युद्ध को वर्ष 2049 तक किसी भी कीमत पर जीतना चाहता है. इसके लिए चीन ने एक योजना बनाई है. मशहूर Political Scientist Graham Allison के मुताबिक इस योजना का पहला चरण 2025 में पूरा होगा जब चीन खुद को टेक्नोलॉजी की दुनिया की महाशक्ति बना लेगा. इसके केंद्र में Artificial Intelligence, Robots और ड्राइवर लेस कारें होंगी. इसके बाद वर्ष 2035 तक चीन दुनिया का Innovation Leader बनना चाहता है.
यानी चीन का इरादा है कि अगले 15 वर्षों में दुनिया के सभी बड़े अविष्कार उसी की ज़मीन पर हों. इसके बाद 2049 तक चीन खुद को दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बनाना चाहता है. 2049 में ही चीन की कम्यूनिस्ट क्रांति के 100 वर्ष पूरे होंगे और चीन इस डेडलाइन को किसी भी सूरत में मिस नहीं करना चाहता और चीन के लिए ये राह तभी आसान होगी जब दुनिया में अराजकता फैलेगी. अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश घुटने टेक चुके होंगे और तब चीन इस विश्व युद्ध के तीसरे चरण की शुरुआत करेगा जिसमें वो उसकी बात ना मानने वाले देशों का दमन करेगा और शोषण के जरिए अपनी बादशाहत कायम करेगा. 
चीन ने आज से पहले भी जो कुछ हासिल किया वो भी इसी महा योजना का हिस्सा है. वर्ष 2009 तक चीन दुनिया की अर्थव्यवस्था का इंजन बन चुका था. 2011 तक वो Manufacturing Hub बन गया, 2012 में चीन ने खुद को एक बड़े व्यापारिक देश के तौर पर स्थापित कर लिया. 2014 में चीन ने Purchasing Power Parity यानी PPP के मामले में अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया, 2015 में चीन का मध्यमवर्ग दुनिया का सबसे बड़ा मध्यम वर्ग बन गया औऱ 2016 में तो अरब पतियों की संख्या के मामले में चीन ने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया था. चीन इस योजना को कैसे अंजाम दे रहा है. ये हम आपको बता चुके हैं लेकिन वो ऐसा कर क्यों रहा है ये आपको समझना चाहिए. दरअसल चीन दुनिया का सबसे ताकतवर देश बनना चाहता है और इसके लिए जरूरी ये है कि वो दुनिया के बाकी शक्तिशाली देशों को कमजोर कर दें.  Corona Virus की वजह से ठीक ऐसा ही हो रहा है. 
इस महामारी का सबसे ज्यादा असर G-7 देशों पर पड़ा है. इसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों का समूह भी माना जाता है. G7 में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, इटली, जापान और जर्मनी शामिल हैं. ये वो देश हैं जिनके पास दुनिया की GDP का 46 प्रतिशत हिस्सा है और दुनिया की 58 प्रतिशत दौलत भी इन्हीं देशों के पास है लेकिन एक छोटे से वायरस ने इन देशों की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया है और ये चीन का सपना पूरा होने जैसा है. अब सवाल ये है कि हम जिस तीसरे विश्वयुद्ध की बात कर रहे हैं उसके परिणाम क्या होंगे? इसके लिए चीन इसे तीसरे चरण में ले जाकर दमन और शोषण की नीति पर काम शुरू कर सकता है लेकिन ये इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि चीन को कई शक्तिशाली देशों से टकराना होगा. 
कुछ दिनों पहले हमने आपके इतिहास के जनक माने जाने वाले Thucy-dides (थ्यूसी-डिडस) द्वारा लिखी गई एक किताब के बारे में बताया था. जिसका नाम था History of the Pelopo-nnesian War. इस पुस्तक में थ्यूसी-डिडस कहते हैं कि जब एक महाशक्ति के सामने दूसरी शक्ति उभरने लगती है तो दोनों के बीच युद्ध होकर रहता है. इसे Thucy-dides Trap भी कहा जाता है. इस समय दुनिया भी इसी ट्रैप में है. चीन उभरती हुई महाशक्ति है, लेकिन चीन दुनिया के देशों को युद्ध की धमकी नहीं दे रहा बल्कि वो बहुत सब्र के साथ इस बात का इंतज़ार कर रहा है कि दुनिया की अर्थव्यस्था कमज़ोर होती रहे, दुनिया के देश कोरोना वायरस को कंट्रोल करने में जुटे रहें और मौके का फायदा उठाकर चीन इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को कंट्रोल कर लें. इसके लिए वो परमाणु बम नहीं बल्कि विषाणुओं का इस्तेमाल कर रहा है, दुनिया को मिसाइलों का डर नहीं दिखा रहा, बल्कि मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल कर रहा है. और हो सकता है कि देर सवेर चीन को इसके लिए खून भी बहाना पड़े तो वो पीछे नहीं हटेगा क्योंकि इतिहास गवाह है कि चीन का इरादा हमेशा सिर्फ युद्ध जीतना होता है. चाहे उसे इसके लिए साम दाम दंड भेद का इस्तेमाल ही क्यों ना करना पड़े.
कोरोना का सबसे ज्यादा असर G-7 देशों पर पड़ा है जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, इटली, जापान और जर्मनी शामिल हैं. ये वो देश हैं जिनके पास दुनिया की GDP का 46 प्रतिशत हिस्सा है और दुनिया की 58 प्रतिशत संपत्ति भी इन्हीं देशों के पास है. कोरोना संक्रमण से सबसे ज्यादा मौतें भी इन्हीं देशों में हो रही हैं और Lockdown की वजह से इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को ही सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है. अमेरिका में तो बेरोजगारी दर 25 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुकी है जिसके इस वर्ष के अंत तक तीस प्रतिशत हो जाने की आशंका है. ब्रिटेन में प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले 27 प्रतिशत लोग बेरोजगार हो चुके हैं. फ्रांस भी वर्ष 2008 के बाद सबसे बड़ी मंदी के दौर में पहुंच चुका है. विशेषज्ञों के मुताबिक कोरोना और Lockdown के असर से इटली की अर्थव्यवस्था का साइज इस वर्ष के अंत तक 9 प्रतिशत घट जाएगा. जापान, जर्मनी और कनाडा की अर्थव्यवस्था भी मंदी के दौर में पहुंच चुकी है.

Thursday, April 23, 2020

4/23/2020 06:02:00 PM

चोरी-छिपे डार्क-वेब पर क्यों बिक रहा कोरोना को हराने वाले मरीजों का खून.? ये है वजह

नई दिल्‍ली। कोरोना वायरस महामारी ने डार्क वेब पर कुछ ऐसी चीजों की बिक्री शुरू करा दी है जो वहां कभी नहीं होती थी। वहां वायरस डिटेक्‍टर्स से लेकर कोरोना वायरस की 'वैक्‍सीन' तक बेची जा रही है। यही नहीं, चोरी-छिपे गैरकानूनी तरीके से रिकवर हो चुके पेशेंट्स का खून बेचा जा रहा है। Agartha नाम की एक डार्क वेब मार्केट पर 'कोरोना वायरस के खिलाफ इम्‍युनिटी के लिए रिकवर्ड पेशेंट्स का प्‍लाज्‍मा' लिस्‍टेड है। इसके सेलर ने 25ml प्‍लाज्‍मा से शुरुआत की थी। फिर 50ml, 100ml, 500ml के पैकेट्स भी लिस्‍ट किए। अब वह 2.036 बिटक्‍वाइंस (10.86 लाख रुपये) में एक लिटर खून बेचने का दावा कर रहा है।
क्‍यों बेचा जा रहा खून, प्लाज्मा थेरेपी क्या है:-
कोरोना वायरस जैसी महामारी के बीच प्लाज्मा थेरेपी एक उम्‍मीद बनकर उभरी है। रिर्सर्चर्स को भरोसा है कि COVID-19 से ठीक हो चुके मरीजों के प्‍लाज्‍मा से बाकी मरीजों की जिंदगी बचाई जा सकती है। जिस मरीज को एक बार कोरोना का संक्रमण हो जाता है, वह जब ठीक होता है तो उसके शरीर में एंटीबॉडी डिवेलप होती है। यह एंटीबॉडी उसको ठीक होने में मदद करते हैं। ऐसा व्यक्ति रक्तदान करता है। उसके खून में से प्लाज्मा निकाला जाता है और प्लाज्मा में मौजूद एंटीबॉडी जब किसी दूसरे मरीज में डाला जाता है तो बीमार मरीज में यह एंटीबॉडी पहुंच जाता है, जो उसे ठीक होने में मदद करता है। एक शख्स से निकाले गए बीच की मदद से दो लोगों का इलाज संभव बताया जाता है। कोरोना नेगेटिव आने के दो हफ्ते बाद वह प्लाज्मा डोनेट कर सकता है।
डार्क वेब पर कोरोना से जुड़ा क्‍या-क्‍या:-
safetyfirst2020 नाम का सेलर 'कोरोना एंटीवायरस डिटेक्टिव डिवाइस' बेच रहा है। Agartha पर ही 'कोरोना वायरस की वैक्‍सीन' भी 0.065 बिटक्‍वाइंस (34,751 रुपये) में बेची जा रही है। Pax Romana नाम की साइट पर 'रिकवरी के बेहतर चांस' के लिए 20 कैप्‍सूल्‍स का पैकेट 43 डॉलर (3,291 रुपये) में उपलब्‍ध है। इसके अलावा chloroquine (Covid-19 में यूज हो रही hydroxychloroquine का कम जहरीला रूप) और favipiravir (जापान में फ्लू के खिलाफ यूज होने वाली एंटी वायरल दवा) भी सेल के लिए है। इनके दाम 23,000 रुपये से डेढ़ लाख रुपये के बीच हैं।
धोखा है ये सब, संभलकर रहें:-
डार्क वेब पर एक ओर जहां अधिकतर सेलर अपने वादे पूरे करते हैं, Covid-19 से जुड़ा बिजनेस मुख्‍य रूप से धोखा है। वहां बिकने वाली चीजें, जैसे Covid-19 की वैक्‍सीन अभी तक तैयार ही नहीं हुई है। अबतक डीप वेब की मार्केट्स में ड्रग्‍स, डेटा और फेक क्रेडेन्‍शियल्‍स ही बिका करते थे। मगर कोरोना आउटब्रेक की वजह से सप्‍लाई चैन टूटी और बिजनेस को नुकसान पहुंचा। ऐसे में बहुत से सेलर्स ने यह शर्त जोड़ दी है कि डिलीवरी में खासा समय लग सकता है। बहुत से सेलर्स ने धोखेबाजी का रास्‍ता अपना लिया है।
बैन हो सकते हैं ऐसे सेलर्स:-
डीप वेब पर मौजूद रेडिट जैसी एक साइट में पिछले कुछ हफ्तों से कोरोना को लेकर जोरदार चर्चा हो रही है। यूजर्स उन जगहों के बारे में पूछ रहे हैं जहां से सामान खरीदना सेफ है। एक पूरी मार्केट खड़ी हो गई है जो ऐसे सामान बेच रही है जिसकी डिलीवरी ही नहीं हो सकती। जैसे एक हजार डॉलर में 'कोरोना वायरस टेस्‍ट किट' बेची जा रही है। एक वेब रिसर्चर क्रिस मॉन्‍टीरो के मुताबिक, "एक नियम की तरह, डार्क वेब की मार्केट्स उन कैटेगरीज को बैन कर देती हैं जो हमेशा स्‍कैम होते हैं।" ऐसी ही एक मार्केट, व्‍हाइट हाउस मार्केट ने होमपेज पर लिख दिया है कि "कोरोना वायरस के इलाज वाले विज्ञापनों को रिजेक्‍ट किया जाएगा और वेंडर्स को बैन भी किया जा सकता है।

Wednesday, April 22, 2020

4/22/2020 06:45:00 AM

एक मात्र ऐसे भारतीय, जिन्हें जापान में भगवान की तरह पूजा जाता है जाने क्यों

फीचर डेस्क। राधाबिनोद पाल, शायद आपने इस महान शख्स का नाम भी न सुना हो। और भी बहुत सारे भारतीय ऐसे हैं, जो इन्हें न तो जानते हैं और न ही पहचानते हैं, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इस शख्स को जापान में न सिर्फ लोग जानते हैं बल्कि उसे भगवान की तरह पूजते भी हैं। यही वजह है कि जापान के यासुकुनी मंदिर और क्योतो के र्योजेन गोकोकु देवालय में इनकी याद में विशेष स्मारक बनवाए गए हैं।
जनवरी 1886 को तत्कालीन बंगाल प्रांत में जन्मे राधाबिनोद पाल अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भारतीय विधिवेत्ता और न्यायाधीश थे। उन्होंने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज और कोलकाता विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा ली थी और उसके बाद 1923 से 1936 तक वो इसी विश्वविद्यालय में अध्यापक भी रहे थे। साल 1941 में उन्हें कोलकाता उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। इसके अलावा वह अंग्रेजों के सलाहकार भी रहे थे।
राधाबिनोद पाल द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान द्वारा किए गए युद्ध अपराधों के खिलाफ चलाए गए अंतरराष्ट्रीय मुकदमे 'टोक्यो ट्रायल्स' में भारतीय जज थे। उन्हें ब्रिटिश सरकार ने भारत का प्रतिनिधि बनाया था। कुल 11 जजों में वो इकलौते ऐसे जज थे, जिन्होंने ये फैसला किया था कि सभी युद्ध अपराधी निर्दोष हैं। इन युद्धबंदियों में जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो सहित 20 से ज्यादा अन्य नेता और सैन्य अधिकारी शामिल थे।
न्यायाधीश पाल ने अपने फैसले में लिखा था कि किसी घटना के घटित होने के बाद उसके बारे में कानून बनाना उचित नहीं है और इसीलिए उन्होंने युद्धबंदियों पर मुकदमा चलाने को विश्वयुद्ध के विजेता देशों की जबरदस्ती बताते हुए सभी को छोड़ने का फैसला सुनाया था जबकि बाकी जजों ने उन्हें मृत्युदंड दिया था। यही वजह है कि जापान में उन्हें आज भी एक महान व्यक्ति की तरह सम्मान दिया जाता है। 
साल 2007 में जब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे भारत आए थे, तो उन्होंने राधाबिनोद पाल के बेटे से कोलकाता में मुलाकात की थी और तस्वीरों का आदान-प्रदान भी किया था। दरअसल, उस समय के युद्ध अपराधियों में शिंजो आबे  के नाना नोबूसुके किशी भी शामिल थे, जो बाद में प्रधानमंत्री बने।

Sunday, March 8, 2020

3/08/2020 03:06:00 PM

पिता की मौत के बाद संभाली घर की जिम्मेदारी, जीवन भर रही कुंवारी, जानें इनकी सफलता का राज

ग्वालियर/शिवपुरी। महिलाएं आज किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं, चाहे वह कोई भी क्षेत्र हो वह हर कदम पर एक पायदान आगे पहुंचकर हर दिन रोज एक नए कीर्तिमान गढ़ रही हैं। ग्वालियर चंबल संभाग में भी ऐसी कई महिलाएं है, जिन्होंने खुद तो संघर्ष किया ही, साथ ही अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए समाज के लिए भी एक प्रेरणास्रोत बनीं। शिवपुरी जिले के शहर गुरुद्वारा चौक पर स्थित वाहनों की बैटरी की दुकान का संचालन पिछले 11 साल से एक महिला कर रही है। पांच बहनों में शामिल प्रेमलता कपूर ने अपने पिता की मौत के बाद से परिवार की जिम्मेदारियों को संभालने के लिए अपनी शादी भी नहीं की। इस महिला दिवस पर हम आपको बताने जा रहे है उनके जीवन की कहानी।
पिता को दी थी मुखाग्नि:-
लॉ में ग्रेजुएट प्रेमलता पहले कोर्ट में केस लड़ती थीं और पिता के देहांत के बाद वे जीवन के संघर्षों से लड़ रही हैं। उनका कहना है कोमल है-कमजोर नहीं, नारी का नाम ही शक्ति है। शहर की आदर्श कॉलोनी में रहने वाली प्रेमलता कपूर गुरुद्वारा चौक पर स्थित अपने पिता स्व. नंदकिशोर कपूर की मौत के बाद वर्ष 2006 से दुकान का संचालन कर रही हैं। पे्रमलता की दो बड़ी व दो छोटी बहने हैं, जिनकी शादी हो चुकी है, लेकिन प्रेमलता ने शादी नहीं की। क्योंकि जब वो छोटी थीं, तब उन्होंने दादी व अपनी मां के बीच यह बातें सुनी थीं कि बेटा नहीं है, तो कैसे जीवन कटेगा। प्रेमलता कहती हैं कि यह बातें सुनने के बाद से ही मैंने यह सोच लिया था कि परिवार में बेटे की कमी को मैं कभी महसूस नहीं होने दूंगी। तभी से यह ठान लिया कि जैसे बेटा अपने परिवार की देखभाल करता है, ठीक वैसे ही मैं भी अपने परिवार का बेटा बनूंगीं। पिता का देहांत होने के बाद उनकी चिता को मुखाग्रि भी पे्रमलता ने दी थी।
धीरे धीरे सीखा बैटरी का काम:-
यहां बता दें कि पहले वे शिवपुरी कोर्ट में प्रेक्टिस किया करती थीं, लेकिन जैसे ही पिता का साया सिर से उठा तो वे मां की देखभाल व परिवार में बेटे का फर्ज निभाने के लिए कोर्ट की प्रेक्ट्सि को छोड़कर पिता की बैटरी की दुकान पर आ गईं। चूंकि उन्होंने कभी बैटरी के काम को न तो किया और न समझा, लेकिन उन्होंने दुकान पर काम करने वाले लोगों से इस काम को धीरे-धीरे समझा। अब वे खुद ही बैटरी निकालने से लेकर उन्हें चैक करके उसे लगाने का काम बिना किसी की मदद के करती हैं।
नारी की कोमलता को दुर्बलता न समझें:-
प्रेमलता का कहना है कि मैं अपनी मां के साथ घर में रहती हूं। जब कभी अकेलापन महसूस होता है तो अपनी छोटी बहन के घर मां के साथ चली जाती हूं। वे पूरे विश्वास के साथ कहती हैं कि विवाह न करने के बाद भी जीवन के किसी मोड़ पर ऐसी कोई कमी महसूस नहीं होगी। पे्रमलता कहती हैं कि नारी की कोमलता को उसकी दुर्बलता न समझें। नारी जननी है और यह सृष्टि जो चल रही है,उसी से है। वे कहती हैं कि पिता की मौत के बाद जब दुकान संभाली,तो इतनी कारोबार में इतनी प्रतिद्वंदता नहीं थी, लेकिन अब आसपास ही बैटरी की दुकानें खुल गई हैं।

Thursday, February 27, 2020

2/27/2020 05:55:00 PM

ये मुख्यमंत्री कहलाते थे दिल्ली की राजनीति के 'मुगल-ए-आजम', एक बने 'दिल्ली के शेर'

जरा हटके। दिल्ली चुनाव के नतीजे साफ हो चुके हैं। देश की राजधानी में एक बार फिर आम आदमी पार्टी की सरकार बन चुकी है। अरविंद केजरीवाल एक बार फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ चुके है। इस बीच हम आपको बता रहे हैं दिल्ली की राजनीति की ऐसी दो शख्सियतों के बारे में जिन्हें यहां की जनता ने खूब प्यार तो दिया ही, साथ ही एक उपाधि भी दी। उस मुख्यमंत्री के बारे में जिन्हें दिल्ली की राजनीति का मुगल-ए-आजम कहा जाता था। साथ ही उस राजनीतिक हस्ती के बारे में जो 'दिल्ली का शेर' कहलाते थे।
मदन लाल खुराना:-
★मदन लाल खुराना का जन्म अविभाजित भारत के ल्याल्लपुर (वर्तमान फैसलाबाद) में हुआ। विभाजन के समय उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा, जिसके बाद वे नई दिल्ली के कीर्ति नगर के शरणार्थी शिविर में रहे।
★मदनलाल खुराना उन चुनिंदा नेताओं में शामिल थे जो भाजपा के गठन से पहले से ही संघ परिवार से जुड़े हुए थे।वे साल 1965 से 1967 तक जनसंघ के महासचिव रहे और दिल्ली में जनसंघ के चर्चित चेहरों में से एक रहे।
★मदन लाल खुराना के राजनीतिक कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1990 के दशक में वे भाजपा की दिल्ली इकाई का चेहरा थे।
★साल 2013 में उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ जिस कारण वे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। 24 अक्तूबर 2014 को उनका निधन हो गया। कार्यकर्ताओं के बीच उन्हें 'दिल्ली का शेर' कहा जाता था।
चौधरी ब्रह्म प्रकाश:-
★चौधरी ब्रह्म प्रकाश केवल 33 साल की उम्र में दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए थे। उस समय के सबसे युवा मुख्यमंत्री थे।
★चौधरी जनता के बीच काफी चर्चा में रहते थे। जनता के बीच ज्यादा समय बिताने के लिए वो आम लोगों की तरह सरकारी बसों में सफर किया करते थे।
★उन्हें पढ़ने-लिखने का बहुत शौक था। वे लगभग हर दूसरे दिन दिल्ली के कनॉट प्लेस से कोई किताब जरूर लिया करते थे।उन्होंने कभी अपनी जाति को नाम के साथ नहीं जोड़ा। राष्ट्र के प्रति उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उनके सम्मान में 11 अगस्त 2001 को स्मारक डाक टिकट जारी किया गया था।
★इतिहासकार आरवी स्मिथ के अनुसार चौधरी ब्रह्म प्रकाश का जन्म केन्या में हुआ था और 16 साल की उम्र में माता-पिता के साथ वे दिल्ली आ गए थे।
दिल्ली की राजनीति में चौधरी ब्रह्म प्रकाश को 'मुगल-ए-आजम' के नाम से भी जाना जाता था।

Friday, February 14, 2020

2/14/2020 02:53:00 PM

ऐसा ठग जिसने एफिल टावर को दो बार बेच डाला, आती थी पांच भाषाएं, उसके थे 47 फर्जी नाम

फीचर डेस्क। आपने नटवर लाल का नाम और ठगी के कारनामे सुने होंगे लेकिन ये कहानी एक ऐसे शख्स की है जिसका ठगी के मामले में कोई सानी नहीं था। पांच भाषाएं बोलने वाले इस शख्स को कम से कम 47 नामों से जाना गया। इनमें विक्टर लुस्टिग, चार्ल्स ग्रोमर, अलबर्ट फिलिप्स, रॉबर्ट जॉर्ज वेग्नर जैसे नाम शामिल हैं। हमने अब तक आपको इनका असली नाम नहीं बताया है, क्योंकि सच कहें तो हमें भी नहीं पता।  ये वो शख्स था, जो कई दशकों तक जांच एजेंसियों की आंखों में किरकिरी बना रहा। एफबीआई ने इस ठग को विक्टर लुस्टिग कहा है, लेकिन ये नाम इसके 47 नामों में से एक ही है। इस ठग की कहानी में जब जब एफबीआई का नाम आता है तो कहानी अपने आप दिलचस्प हो उठती है। ब्रिटिश पत्रकार जैफ मेश ने इस किस्से पर 'हैंडसम डेविल' नाम की किताब लिखी है। जैफ बताते हैं, 'जब भी वो एफबीआई से भाग रहा होता था तो अपना पीछा करने वाले एजेंट्स का मज़ाक उड़ाने के लिए उनके नाम से होटलों में कमरे बुक करने और उनके नाम पर जहाजों की सवारी किया करता था।'  एफबीआई के दस्तावेज के मुताबिक वह एक अक्तूबर, 1890 को होस्टाइन में पैदा हुआ था। होस्टाइन पहले अस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य था और अब इसे चेक गणराज्य के नाम से जाना जाता है। लेकिन ये भी सबसे ज्यादा कही जाने वाली बात ही है। जैफ बताते हैं, 'उसने हमें इतनी कहानियां सुनाईं कि हम आज भी ये तक नहीं जानते कि वो पैदा कहां हुआ था। मैंने एक स्थानीय इतिहासकार से इस बारे में बात की लेकिन यहां के दस्तावेजों में उसके इतने नामों में से कोई भी पंजीकृत नहीं है। वो यहां था ही नहीं!' अमेरिका में 1920 का दशक खूंखार गैंगस्टर अल कपोनी और जैज के लिए जाना जाता है। ये वो दौर था जब पहला महायुद्ध खत्म हुआ था, अमेरिका अपने चढ़ान पर था। डॉलर के आने और जाने की स्पीड बेहद तेज थी। इसी दौर में अमेरिका के 40 शहरों के जासूसों ने इस ठग को अल सिट्राज निकनेम दिया था। सिट्राज एक स्पैनिश शब्द है जिसका अर्थ घाव होता है। और, ये नाम इस शख्स के बाएं गाल पर एक चोट के निशान की वजह से मिला था जो उसे पेरिस में उसकी एक महबूबा से मिला था। ये साल 1925 की बात है। अमेरिकी सीक्रेट सर्विस के एजेंट जेम्स जॉनसन के संस्मरण के मुताबिक, विक्टर लुस्टिग मई के महीने में पेरिस पहुंचा। लुस्टिग ने पेरिस के एक लग्जरी होटल में मैटल वेस्ट इंडस्ट्री के बड़े उद्योगपतियों के साथ एक मीटिंग का आयोजन किया। इस मीटिंग के लिए लुस्टिग ने खुद को फ्रांसीसी सरकार का अधिकारी बताकर सरकारी स्टांप के साथ पत्र भिजवाया। लुस्टिग ने इस मीटिंग में कहा, 'इंजीनियरिंग से जुड़ी असफलताओं, खर्चीली मरम्मत और कुछ राजनीतिक समस्याएं जिन्हें मैं आपके साथ साझा नहीं कर सकता, की वजह से एफिल टावर का गिरना आवश्यक है।' उसने कहा, 'टावर सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को दिया जाएगा।' इस मीटिंग में मौजूद किसी भी व्यापारी ने लुस्टिग के इस प्रस्ताव पर शक नहीं किया क्योंकि उन्होंने समझा कि ये फ्रांसीसी सरकार का एक कदम है। कुछ सूत्रों का कहना है कि उसने ऐसा एक बार फिर किया। वह होटल में छिपा रहा और जब उसे पता चला कि वो एक बार फिर ऐसा कर सकता है तो उसने एक बार फिर ऐसा कर दिखाया। विक्टर लुस्टिग ने अपनी जिंदगी में ऐसे कई किस्सों को अंजाम दिया जिसने कई सरकारों की रातों की नींद हराम कर दी। जेलों को तोड़ना उसके लिए बाएं हाथ का खेल था। लेकिन, आखिर में अमेरिकी सरकार ने उसे एक अल्काट्राज जेल में रखा, जहां साल 1947 में 11 मार्च को शाम के आठ बजकर 30 मिनट पर उसकी मौत निमोनिया से हुई। वो सबसे खर्चीला और शानशाही से रहने वाला ठग था लेकिन उसकी मौत के सरकारी दस्तावेज में उसे सिर्फ नौसिखिया सेल्समैन कहा गया।

Thursday, February 13, 2020

2/13/2020 08:15:00 AM

एक आइडिया से बने करोड़ों रुपये के मालिक, 10 सबसे अमीरों की लिस्ट में छठे स्थान पर पहुंचे

नई दिल्ली. D-Mart के फाउंडर राधाकिशन दमानी (Radhakishan Damani Success Story) रिटेल बिजनेस के किंग माने जाते हैं. लेकिन उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शेयर बाजार में निवेशक के तौर पर की थी.  लेकिन एक आइडिया ने उनकी किस्मत बदल दी और महज 24 घंटे में उनकी संपत्ति 100 फीसदी बढ़ गई. आपको बता दें कि D-Mart को चलाने वाली कंपनी एवेन्यू सुपरमार्ट्स का मार्केट कैप सोमवार को 1.5 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया. सुपरमार्केट 'डीमार्ट' का मालिकाना हक एवेन्यू सुपरमार्ट्स के पास है. इस तरह अब यह कंपनी देश की 18वीं सबसे वैल्यूएबल  कंपनी बन गई है. इसका मार्केटकैप नेस्ले और बजाज फिनसर्व से ज्यादा हो गया है.
साल 1980 में राधाकिशन दमानी ने शेयर बाजार में एक निवेशक के तौर पर अपनी करियर की शुरुआत की थी. इसके बाद उन्होंने साल 2017 में D-Mart का IPO लाने का ऐलान किया. 20 मार्च 2017 तक  राधाकिशन दमानी सिर्फ एक रिटेल कंपनी के मालिक थे, लेकिन 21 मार्च की सुबह जैसे ही उनकी कंपनी के शेयर की ट्रेडिंग BSE में शुरू हुई, वैसे ही उनकी संपत्ति 100 फीसदी तक बढ़ गई.
21 मार्च की सुबह जब राधाकिशन दमानी की कंपनी का आईपीओ शेयर बाजार में लिस्ट हुआ तो उनकी संपत्ति, कई अमीर घरानों से ज्यादा हो गई.
डीमार्ट का शेयर 604.40 रुपये पर लिस्ट हुआ, जबकि इश्यू प्राइस 299 रुपये रखा गया था. यह 102 फीसदी का रिटर्न है. पिछले 13 साल में लिस्टिंग के दिन किसी शेयर की कीमत में इतनी बढ़ोतरी नहीं हुई थी.
वहीं, अब कुछ ऐसा ही सोमवार के कारोबार में देखने को मिला. एवेन्यू सुपरमार्ट्स के शेयर सोमवार को 9 फीसदी की तेजी के साथ 2,484.15 रुपये के भाव पर बंद हुए.
मंगलवार को यह शेयर कुछ फिसला. कंपनी ने हाल में योग्य संस्थागत निवेशकों को कुछ हिस्सेदारी बेची है, मगर इस डील की सारी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है.
21 मार्च 2017 को शेयर बाजार में लिस्ट हुई एवेन्यू सुपरमार्ट्स का बाजार पूंजीकरण तब 39,988 करोड़ रुपये था. तब से इस शेयर ने 290 फीसदी की छलांग लगाई है.
बीते एक साल में एवेन्यू सुपरमार्ट्स का शेयर 35 फीसदी चढ़ा है. यदि मार्च 2017 में इस शेयर में आपने 1 लाख रुपये का निवेश किया होता, तो उसकी वैल्यू 8.31 लाख रुपये के पार चली गई होती. डीमार्ट के संस्थापक राधाकिशन दमानी को शेयर बाजार का बड़ा खिलाड़ी माना जाता है.
बने देश के छठे सबसे अमीर शख्स:-
न्यूज एजेंसी ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में बताया गया हैं कि एवेन्यू सुपरमार्ट्स के शेयरों में आई जोरदार तेजी ने दमानी को देश का छठा सबसे अमीर शख्स बना दिया है. उनकी कुल दौलत $11 अरब तक पहुंच गई है, जो गौतम अडानी ($10.8 अरब) और सुनील मित्तल ($9.6 अरब) से अधिक है.
रमेश दमानी ने शुरुआती दिनों में बॉल-बियरिंग का कारोबार शुरू किया, लेकिन नुकसान होने के चलते बंद कर दिया.
पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने भाई के साथ स्टॉक मार्केट ट्रेडिंग शुरू की. उन्होंने बेहतर मौके तलाश कर छोटी कंपनियों में निवेश शुरू किया.
सन 1990 तक उन्होंने निवेश कर करोड़ों कमा लिए थे. फिर उन्होने रीटेल कारोबार में उतरने की सोची और धीरे-धीरे उनका कारोबार चल निकला. आज उनकी कंपनी की वैल्यू करीब 1.13 लाख करोड़ रुपये है.
हमेशा रहते हैं सुर्खियों से दूर- वह हमेशा सफेद कपड़े पहनते हैं और शेयर बाजार के दिग्गज निवेशकों के बीच 'मिस्टर व्‍हाइट एंड व्‍हाइट' के नाम से मशहूर हैं.
उन्होंने 1999 में रिटेल बिजनेस शुरू किया था, ये वह वक्त था जब कुमार मंगलम बिड़ला और फ्यूचर ग्रुप के किशोर बियानी के कदम इस सेक्टर में आए भी नहीं थे.

Friday, February 7, 2020

2/07/2020 09:43:00 AM

Valentine day 2020 | प्रेम एक लाइलाज रोग है, बचके रहें वर्ना पछताएंगे

जरा हटके। कुछ लोगों के लिए प्रेम योग होता है और कुछ लोगों के लिए रोग। देखने में आया है कि ज्यादातर लोगों के लिए तो प्रेम रोग ही बन जाता है और वह भी ऐसा असाध्य रोग जिसकी दवा खोजना मुश्किल ही है। वर्तमान युग में कौन करता है नि:स्वार्थ प्रेम? यह तो सब किताबी बातें हैं। टीनएज में अक्सर यह रोग होता है और लड़कों या लड़कियों का करियर तबाह हो जाता है। फिल्में, वेलेंटाइ डे और बाजारवाद को इस रोग से लाभ मिलता है, लेकिन देश का भविष्य दांव पर लग जाता है।
'पागल प्रेमी' या 'दीवाना प्रेमी' नाम तो आपने सुना ही होगा। इस तरह के प्रेमियों के कारनामे भी अखबारों की सुर्खियां बनते हैं। कोई अपने हाथ पर प्रेमिका का नाम गुदवा लेता है तो कोई प्रेम में जान भी दे देता है। कितने पागल होंगे वे लोग जो खून से पत्र लिखते हैं। इससे भी भयानक यह कि जब ‍कोई प्रेमिका उसका साथ छोड़कर चली जाती है तो फिर वो उसका कत्ल तक कर देते हैं या उस पर तेजाब फेंक देते हैं। अब आप ही सोचे क्या यह प्रेम था। प्रेम में हत्या और आत्महत्या के किस्से हम सुनते आए हैं। यह सब किस्से उन लोगों के हैं जो या तो कामवासना से भरे रहते हैं या फिर चाहत, आकर्षण से चिपक जाते हैं। राधे जैसी फिल्में भी उनके सर चढ़कर बोलती है। फीजिकल एट्रेक्शन को जानवरों में भी होता है।
आजकल प्यार करने या होने का प्रचलन जरा ज्यादा होने लगा है। अब तो ऐसा करके लिव इन का प्रचलन भी बढ़ गया है। मतलब आजकल के लड़के और लड़कियां प्यार से एक कदम आगे निकल चुके हैं। सचमुच जमाना बदल गया है, लेकिन एक बात अभी तक नहीं बदली और वह यह है कि प्यार में टेंशन, बंधन, बेवफाई, धोखा और क्राइम। आज भी यह सब जारी है।
अमेरिकी पत्रिका 'सायकोलॉजी टुडे' के संपादक रोबर्ट एप्सटेन ने कभी कहा था कि उन्होंने एक ऐसी प्रक्रिया तैयार की है, जिसमें छह महीनों में एक-दूसरे के प्रति प्यार पैदा किया जा सकता है। दूसरी ओर अगर यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल की डॉ. लेसेल डॉसन के शोध पर आपने विश्वास किया तो आपको हैरानी होगी। उनका कहना है कि दुनिया में प्यार एक बीमारी है और इस बीमारी का इलाज सिर्फ सेक्स है।
रूस की ड्यूक यूनिवर्सिटी में सम्मोहन के प्रयोग चलते थे। उनका मानना है कि जो बात व्यक्ति के आत्मसम्मान से जुड़ी है उसे छोड़कर सम्मोहन की अवस्था में उससे हर कार्य कराया जा सकता है। मसलन किसी भी व्यक्ति के मन में किसी के भी प्रति प्रेम जाग्रत किया जा सकता है। चाहे वह दुनिया की सर्वाधिक काली लड़की हो, लेकिन सम्मोहनकर्ता उसे इस बात का विश्वास दिला देगा कि वही लड़की तेरे लिए बनी है।
शरीर ही शरीर से प्रेम करता है:-
क्या प्रेम का परिणाम संभोग है या कि प्रेम भी गहरे में कहीं कामेच्छा ही तो नहीं? फ्रायड की मानें तो प्रेम भी सेक्स का ही एक रूप है। किशोर अवस्था में प्रवेश करते ही लड़के और लड़कियों में एक-दूसरे के प्रति जो आकर्षण उपजता है उसका कारण उनका विपरीत लिंगी होना तो है ही, दूसरा यह कि इस काल में उनके सेक्स हार्मोंस जवानी के जोश की ओर दौड़ने लगते हैं। तभी तो उन्हें राजकुमार और राजकुमारियों की कहानियां अच्छी लगती हैं। फिल्मों के हीरो या हीरोइन उनके आदर्श बन जाते हैं।
आकर्षित करने के लिए जहां लड़कियां वेशभूषा, रूप-श्रृंगार, लचीली कमर एवं नितम्ब प्रदेशों को उभारने में लगी रहती हैं, वहीं लड़के अपने गठे हुए शरीर, चौड़े कंधे और रॉक स्टाइलिश वेशभूषा के अलावा बहादुरी प्रदर्शन के लिए सदा तत्पर रहते हैं। आखिर वह ऐसा क्यूं करते हैं? क्या यह यौन इच्छा का संचार नहीं है?
प्यार नहीं मिला तो टेंशन और मिल गया तो भी:- टेंशन। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि इजहार कर ही दिया तो फिर नया खेल शुरु होता है जो कुछ दिन तक तो अच्छे अहसास के साथ चलता है, लेकिन फिर धीरे-धीरे उसमें टेंशन पैदा होने लगता है। बेवफाई का डर भीतर ही भीतर सालता रहता है। यदि प्यार में बेवफाई का सामना करना पड़े तो फिर दिल के दौरे की संभावना बढ़ सकती है बशर्तें की आप अपने प्रेमी या प्रेमिका से कितने जुड़े हैं यह इस पर तय होता है। अतत: मूल रूप से कहना होगा कि शरीर ही शरीर से प्रेम करता है कोई प्रेमवेम नहीं होता है।

Sunday, February 2, 2020

2/02/2020 07:44:00 AM

एक ऐसा जासूस, जो दूसरे देश में जाकर बनने वाला था वहां का रक्षा मंत्री, रोचक है कहानी

फीचर डेस्क। जासूसों की एक अलग ही दुनिया होती है। वह दूसरे देशों में जाकर वहां की खुफिया जानकारी अपने देश की खुफिया एजेंसी को भेजते हैं, लेकिन यह कहने-सुनने में जितना आसान लगता है, असल जिंदगी में यह उतना ही मुश्किल काम है। या यूं कहें कि इसमें जान का खतरा हमेशा बना रहता है। अगर जासूसी करते दूसरे देश में पकड़े गए तो वहां के कानून के हिसाब से उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दी जाती है। आज हम आपको एक ऐसे ही जासूस के बारे में बताने जा रहे हैं, जो दूसरे देश में जाकर वहां की जासूसी करता है और एक वक्त ऐसा भी आता है, जब उसे वहां के राष्ट्रपति की ओर से उप-रक्षा मंत्री बनने का प्रस्ताव मिलता है। हालांकि बाद में वह अपनी गलती के कारण पकड़ा जाता है और उसे बीच चौराहे पर सैकड़ों लोगों के सामने फांसी दे दी जाती है। हम बात कर रहे हैं एली कोहेन की, जो इजरायल की खुफिया एजेंसी के जासूस थे। उन्हें इजराइल का सबसे बहादुर और साहसी जासूस भी कहा जाता है। उन्होंने वो कर दिखाया था, जो शायद उनके अपने देश इजरायल ने भी नहीं सोचा था। कहते हैं कि कोहेन ने ऐसी खुफिया जानकारी जुटाई थी, जिसकी वजह से ही साल 1967 के अरब-इसराइल युद्ध में इसराइल को जीत मिली थी। एली कोहेन ने 1961 से 1965 के बीच एक इजरायली जासूस के तौर पर चार साल अपने दुश्मनों के बीच सीरिया में गुजारे। एक कारोबारी के तौर पर उन्होंने सीरिया में अपनी एक अलग ही पहचान बना ली थी और इसकी आड़ में वो सीरिया की सत्ता के बेहद करीब पहुंच गए थे। इस दौरान उन्होंने वहां हुए तख्तापलट में भी अहम भूमिका निभाई और सीरिया के राष्ट्रपति के करीबी बन गए। कहते हैं कि राष्ट्रपति भी उनसे रक्षा जैसे मामलों में सलाह लिया करते थे। एली का जन्म साल 1924 में मिस्र के एलेग्जेंड्रिया में एक सीरियाई-यहूदी परिवार में हुआ था। उनके पिता साल 1914 में ही सीरिया के एलेप्पो से आकर मिस्र में बस गए थे, लेकिन 1948 में जब इजराइल बना तो मिस्र के कई यहूदी परिवार वहां से निकलने लगे। इनमें एली कोहेन का परिवार भी था। 1949 में वो इजरायल जाकर बस गए। हालांकि इस दौरान कोहेन मिस्र में ही रूक गए, क्योंकि उनकी इलेक्ट्रॉनिक्स की पढ़ाई अधूरी थी। कहते हैं कि अरबी, अंग्रेजी और फ्रांसीसी भाषा पर कोहेन की पकड़ बेहद ही मजबूत थी और इसी वजह से वो इजराइली खुफिया विभाग की नजर में आए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एली को जासूसी में शुरुआत से ही दिलचस्पी रही थी और इसी वजह से वो साल 1955 में जासूसी का एक छोटा सा कोर्स करने के लिए इजरायल गए थे। हालांकि अगले साल वो फिर से मिस्र लौट गए थे, लेकिन फिर स्वेज संकट के बाद कोहेन सहित कई लोगों को मिस्र से बेदखल कर दिया गया और उसके बाद वो साल 1957 में इजराइल आ गए। यहां आकर वो ट्रांसलेटर और अकाउंटेंट का काम करने लगे। इसी बीच उन्होंने इराकी-यहूदी लड़की नादिया मजाल्द से शादी भी की। एली की जिंदगी की असली कहानी 1960 से शुरू होती है, जब वो इजराइली खुफिया विभाग में भर्ती हुए। 1961 में उन्हें मिशन पर भेजा गया। इजराइली खुफिया विभाग द्वारा एली कोहेन को पहले 'कामिल अमीन ताबेत' नाम दिया गया और फिर उसके बाद उन्हें एक कारोबारी बनाकर अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स भेजा गया। यहां उन्होंने सीरियाई समुदाय के लोगों से संपर्क बढ़ाया और धीरे-धीरे सीरियाई दूतावास में काम करने वाले बड़े-बड़े अधिकारियों से भी दोस्ती की। इसमें सीरियाई सेना के एक बड़े अधिकारी अमीन अल-हफीज भी थे, जो एली कोहेन की मदद से आगे चलकर सीरिया के राष्ट्रपति बने।  साल 1962 में 'कामिल अमीन ताबेत' बने एली सीरिया की राजधानी दमिश्क जाकर बस गए और फिर शुरू हुआ उनका असली खेल। वह रेडियो ट्रांसमिशन के जरिए सीरियाई सेना से जुड़ी तमाम खुफिया जानकारी इजरायल को भेजने लगे। साल 1963 में जब सीरिया में तख्तापलट हुआ और अमीन अल-हफीज राष्ट्रपति बने तो उन्होंने एली को सीरिया का डिप्टी रक्षा मंत्री बनाने का फैसला किया। हालांकि इन सबके बीच 1965 में सीरिया के काउंटर-इंटेलीजेंस अधिकारियों को उनके रेडियो ट्रांसमिशन की जानकारी मिल गई और उन्हें रंगे हाथ पकड़ लिया गया। एली कोहेन पर सीरिया में सैन्य मुकदमा चला और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। इसके बाद 18 मई, 1965 को दमिश्क में एक सार्वजनिक चौराहे पर उन्हें फांसी पर लटका दिया गया। इस दौरान उनके गले में एक बैनर भी लटकाया गया था, जिसपर लिखा था, 'सीरिया में मौजूद अरबी लोगों की तरफ से'। कहते हैं कि फांसी के बाद एली कोहेन उर्फ कामिल अमीन ताबेत के मृत शरीर को सीरिया ने इजरायल को लौटाया भी नहीं। हालांकि फांसी से पहले इजरायल उनकी सजा माफ करने के लिए सीरिया से लगातार गुहार लगाता रहा था, लेकिन सीरिया ने हर बार उन्हें मना कर दिया।

Friday, January 31, 2020

1/31/2020 07:26:00 AM

वो सनकी तानाशाह, जिसने बनवाया था विशाल खुफिया बंकर, आज भी इसके बारे में नहीं जानते लोग

जरा हटके डेस्क। उत्तर कोरिया को दुनिया का सबसे अलग-थलग देश कहते हैं। बाकी दुनिया से इसके रिश्ते बहुत सीमित हैं। लोगों की आवाजाही पर तमाम तरह की पाबंदियां हैं। दुनिया के बहुत से देशों से उत्तर कोरिया का ताल्लुक ही नहीं है। पर क्या आप को ये पता है कि ऐसा ही एक देश यूरोप में भी था? था, इसलिए क्योंकि अब उस देश ने अपने दरवाजे दुनिया के लिए खोल दिए हैं। यूरोप का उत्तर कोरिया कहा जाने वाला ये देश है अल्बानिया। वही अल्बानिया, जहां मदर टेरेसा की पैदाइश हुई। यूनान का ये पड़ोसी देश कई दशक तक कम्युनिस्ट तानाशाही से प्रशासित होता रहा था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ही कम्युनिस्ट नेता एनवर होचा ने यहां अपनी तानाशाही हुकूमत कायम कर ली थी। स्टालिनवादी ये नेता अजीब किस्म की सनक और खब्त का शिकार था। एनवर का इरादा अपने देश को तरक्की की नई पायदान पर बैठाना था। मगर इसके लिए वो विशुद्ध कम्युनिस्ट नीतियों पर चलना चाहते थे।कम्युनिस्ट सिद्धांतों से एक पग भी पीछे न हटने की जिद के चलते एनवर होचा ने एक के बाद एक साम्यवादी देशों से भी रिश्ते तोड़ लिए। 
पहले उन्होंने पड़ोसी साम्यवादी देश युगोस्लाविया से 1948 में ताल्लुक खत्म किए। फिर, 1961 में सोवियत संघ पर कम्युनिस्ट सिद्धांतों से समझौता करने का आरोप लगाकर रिश्ते तोड़ लिए। 1979 में जब चीन ने उदारवादी आर्थिक नीतियां लागू कीं, तो अल्बानिया ने चीन से भी नाता तोड़ लिया। एनवर ने आरोप लगाया कि ये सारे वामपंथी देश अपनी समाजवादी विचारधारा से भटक गए हैं। तमाम देशों से दूरी बना लेने की वजह से अल्बानिया पूरी तरह से बाकी दुनिया से कट गया था। इस दौरान एनवर को लगता था कि पूरी कायनात उसकी हुकूमत के खिलाफ साजिश कर रही है और अल्बानिया पर परमाणु बम से हमला होने वाला है। कभी दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी से मुकाबला करने वाले एनवर होचा का मानना था कि अल्बानिया को तबाह करने के लिए सोवियत संघ और अमेरिका ने हाथ मिला लिया है। एनवर की सोच ठीक वैसी ही थी, जैसी आज किम जोंग उन की है। किम को भी लगता है कि तमाम देश बस उत्तर कोरिया के खिलाफ साजिश रच रहे हैं।सत्तर और अस्सी के दशक में एनवर ने अल्बानिया की राजधानी तिराना में एक विशाल बंकर बनाने का आदेश दिया।
उनका मानना था कि जब उनके देश पर एटमी हमला होगा, तो वो अपने जनरलों और सलाहकारों के साथ उस विशाल बंकर में छुप कर हमलावर देशों से मुकाबला करेंगे। इस बंकर का नाम दस्तावेजों में 'फैसिलिटी 0774' रखा गया। 1972 से 1978 के बीच जमीन के नीचे इस बंकर को तामीर किया गया। ये मिशन इतना खुफिया था कि आज भी अल्बानिया के बहुत से लोगों को इसके अस्तित्व के बारे में पता नहीं है। अस्सी के दशक में एनवर होचा का राज खत्म हो गया। अब इस बंकर को सैलानियों के लिए खोला गया है। पास से गुजरने वाली सड़क से भी इस विशाल बंकर के होने का एहसास नहीं होता है। पहाड़ियों को काटकर इस बंकर तक पहुंचने की सुरंग बनाई गई है। यहां जाने का सिर्फ यही रास्ता है। इस सुरंग की लंबाई फुटबॉल के दो मैदानों के बराबर है। अंदर जाने पर आप को जहां-तहां पानी जमा दिखता है। करीब दो सौ मीटर पैदल चलने के बाद आप इस बंकर की पार्किंग में पहुंचते हैं। यहीं से आपको इस बंकर की मेन इमारत दिखती है, जो किसी बड़े सरकारी संस्थान जैसी लगती है। जमीन के भीतर ये इमारत करीब पांच मंजिल की गहराई में बनाई गई है। आज इसे 'बंक आर्ट-1' नाम दिया गया है। परमाणु हमले की सूरत में एनवर और उसके सलाहकार इसी बंकर में छुपने का इरादा रखते थे। इस बंकर में खिड़कियां नहीं हैं। अंदर घुसते ही अजीब सी कैफियत होती है। अगर पश्चिमी देशों या साम्यवादी ताकतों ने अल्बानिया पर हमला किया होता, तो इस बंकर में उन्हें जिंदगी गुलजार मिलती। एनवर के दौर के रक्षा विभाग के सारे अधिकारियों के लिए यहां रहने का इंतजाम था। बंकर में करीब 300 लोगों के रहने की व्यवस्था थी। इस बंकर में गाइड का काम करने वाली आर्तेमिसा मूको कहती हैं कि यहां रहने वाले लोगों को साल भर तक न खाने-पीने की कमी होती, न पानी की। इस बंकर को बेहद खुफिया तरीके से बनाया गया था। एनवर होचा की उस दिन की तस्वीर यहां की दीवारों में टंगी हैं। 1985 में अपनी मौत से पहले एनवर ने महज कुछ रातें ही यहां गुजारी थीं। इस बंकर में एनवर के लिए अलग ही इंतजाम था। शानदार बेड था। उनके सचिव का ऑफिस था। डीजल से चलने वाले शॉवर वाला एक हम्माम भी यहां था। उनका निजी कमरा गहरे रंग की लकड़ी से सजाया गया था। इसके अलावा बंकर में प्रधानमंत्री, आर्मी चीफ, रक्षा मंत्री जैसे बड़े ओहदे वालों के लिए रहने का भी इंतजाम था। यहां ज्यादातर कमरे लकड़ी के बने हुए हैं। 1991 यहां साम्यवादी शासन खत्म हो गया और लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू हो गई। अगले छह सालों तक अल्बानिया ने बहुत उठा-पटक देखी।

1997 में चिट फंड घोटाले में लोगों के हजारों करोड़ डूब जाने के बाद अल्बानिया में सरकार के खिलाफ बगावत हो गई। इस दौरान हिंसा में दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए, कई सैनिक ठिकानों को भी लूट लिया गया। फैसिलिटी 0774 भी इनमें से एक थी। इस बंकर को आखिरी बार 1999 में सेना ने एक अभ्यास के दौरान इस्तेमाल किया था। इसके बाद से ये बंकर देख-रेख के अभाव में यूं ही पड़ा रहा। 2014 में इटली के कलाकार कार्लो बोलिनो ने इस जगह को टूरिस्ट स्पॉट के तौर पर विकसित करने की सोची। कार्लो चाहते थे कि दशकों तक अलग-थलग रहे अल्बानिया के इतिहास का ये पन्ना भी दुनिया के सामने आए। तभी से यहां 'बंक आर्ट-1' खोलने के प्लान पर काम होने लगा। उस साल अल्बानिया के संस्कृति मंत्रालय ने देश की आजादी के 70 सालों का जश्न मनाने के लिए लोगों से आइडिया मांगे थे। उस वक्त तक अल्बानिया में सैलानियों के लिए कुछ भी नहीं था। जब पहली बार कार्लो बोलिनो ने ये बंकर देखा, तो ये रहस्य और रोमांच से भरा अड्डा लगा था। ऐसा लगता था कि अल्बानिया के इतिहास का एक दौर यहां ठहरा हुआ है। 2014 में इस बंकर को पहली बार जनता के लिए एक महीने के लिए खोला गया। एक महीने में 70 हजार अल्बानियाई नागरिक इसे देखने आए। आर्तेमिसा म्यूको कहती हैं कि अल्बानिया के लोगों को इस बंकर की विशालता का अंदाजा ही नहीं था। वो इसे देखकर बहुत प्रभावित हुए। उनके लिए ये बंकर गुरूर करने वाली बात थी। कार्लो बोलिनो ने इस बंकर के कई कमरों को आर्ट गैलरी की तरह विकसित करना शुरू किया है। इन कमरों में साम्यवादी शासन के दौर की तस्वीरें और कलाकृतियां लगाई जा रही हैं। उस दौर के फर्नीचर और दूसरे साजो-सामान यहां नुमाइश के लिए रखे गए हैं। अब तक 100 से ज्यादा कमरों की मरम्मत की जा चुकी है। बाकी के कमरों में अभी भी लोगों के जाने की मनाही है। बंकर का एक हिस्सा अभी भी रक्षा मंत्रालय के पास है। करीब ही सेना का एक अड्डा भी है। इसलिए बाकी के हिस्से को जनता के लिए नहीं खोलने का फैसला किया गया है। 

कार्लो बोलिनो कहते हैं कि तहखाने में होने की वजह से इसकी मरम्मत और निखार का काम बहुत चुनौती भरा काम था। नमी की वजह से दीवारों और फर्नीचर को नुकसान होता है। कार्लो कहते हैं कि वो अल्बानिया के लोगों को साम्यवादी तानाशाही के दिनों को याद रखना सिखाना चाहते थे। इसलिए उस दौर की तमाम मशीनें, जैसे एयर प्यूरीफायर और कचरा फेंकने के डिब्बे जिन पर लाल सितारे बने हुए हैं, वो यहां बचाकर रखे गए हैं। वो गैस मास्क भी यहां पर रखे गए हैं जो कभी सोवियत संघ ने अल्बानिया को दिए थे। ये बंकर इतना बड़ा है कि यहां के हॉल में सैकड़ों लोग इकट्ठे किए जा सकते थे। किसी हमले की सूरत में एनवर होचा और उनके मातहत यहां सैकड़ों लोगों को अपने देश के लिए लड़ने के लिए उकसा सकते थे। बंकर में एक बार भी है, जहां पर अब रॉक और जैज संगीत बजता है। दिलचस्प बात ये है कि एनवर के राज में दोनों तरह के संगीत पर पाबंदी थी। आगे चलकर यहां भी कंसर्ट आयोजित करने की योजना है। कार्लो बोलिनो अब बंकर के दक्षिणी हिस्से में तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाना चाहते हैं। वो यहां एक थिएटर खोलने का भी इरादा रखते हैं। बंक आर्ट-1 की शोहरत दूर-दूर तक फैल रही है। अमेरिका, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड तक से लोग तिराना आ रहे हैं। साम्यवाद के काले दौर के बावजूद इस बंक आर्ट 1 को राजनैतिक रूप से निरपेक्ष रखने की कोशिश की गई है। एनवर के राज में करीब 5550 लोगों कों मौत के घाट उतार दिया गया था, जबकि 25 हजार लोगों को कैद कर के रखा गया था, लेकिन इस म्यूजियम में इस बात का जिक्र नहीं होता। आर्तेमिसा कहती हैं कि यहां पर कम्युनिस्ट शासन के दोनों पहलू दिखाए गए हैं। अब ये जनता को तय करना है कि वो किस पहलू को देखना चाहती है। 

Monday, January 13, 2020

1/13/2020 09:12:00 AM

महज 14 साल की उम्र में दी गई थी सजा-ए-मौत, माना जाता है कानूनी इतिहास का काला अध्याय

फीचर डेस्क। महज 14 साल की उम्र और मौत की सजा, यह सुनने में बड़ा अजीब लगता है, लेकिन आज से 75 साल पहले अमेरिका में कुछ ऐसा ही हुआ था। इसमें सबसे हैरानी की बात ये थी कि अदालत ने महज 10 मिनट में उस बच्चे को मौत की सजा सुना दी थी, जिसके बाद उसे इलेक्ट्रिक चेयर (कुर्सी) में बांधकर बिजली का झटका दिया गया और मौत के घाट उतार दिया गया। ये खौफनाक घटना साल 1944 में घटी थी। बच्चे का नाम जॉर्ज स्टिनी था, जो अफ्रीकन-अमेरिकन था यानी अश्वेत था। चूंकि उस दौर में श्वेत लोग अश्वेतों से रंग के कारण भेदभाव खूब करते थे, इसलिए कहा जाता है कि बच्चे को सजा-ए-मौत देने का फैसला एकतरफा था, क्योंकि जजों की जिस बेंच ने फैसला सुनाया था, उसमें सभी श्वेत थे। यह कहानी कुछ इस तरह शुरू होती है कि 23 मार्च 1944 का दिन था। जॉर्ज अपनी बहन कैथरीन के साथ अपने घर के बाहर खड़ा था। तभी वहां पर दो लड़कियां 11 वर्षीय बैटी जून बिनिकर और आठ वर्षीय मेरी एमा थॉमस किसी फूल को ढूंढते हुए आईं। उन्होंने उस फूल के बारे में जॉर्ज और उसकी बहन कैथरीन से पूछा। इसके बाद जॉर्ज उन लड़कियों की मदद के लिए उनके साथ चला गया। बाद में वह अपने घर लौट आया, लेकिन दोनों लड़कियां वहां से गायब हो गईं। जब लड़कियों के घरवालों ने उन्हें ढूंढना शुरू किया तो पता चला कि वो आखिरी बार जॉर्ज के साथ देखी गई थीं। वह जॉर्ज के पिता के साथ लड़कियों को आसपास के इलाकों में ढूंढने लगे, लेकिन वो मिली नहीं। इसके बाद अगले दिन सुबह दोनों लड़कियों की लाश रेलवे ट्रैक के पास कीचड़ में मिली। दोनों के सिर पर गहरी चोट लगी थी, जिससे उनकी मौत हो गई थी। लाश मिलने के बाद पुलिस ने शक के आधार पर जॉर्ज को हिरासत में ले लिया और उससे पूछताछ की। बाद में पुलिस की ओर से बताया गया कि जॉर्ज ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है, उसी ने दोनों लड़कियों का कत्ल किया है। पुलिस द्वारा दिए बयान में कहा गया कि जॉर्ज 11 वर्षीय बैटी के साथ संबंध बनाना चाहता था, लेकिन उसे लगा कि मेरी के रहते ये नहीं हो सकता, तो उसने मेरी को मारने की कोशिश की। इसी बीच दोनों लड़कियां उससे भिड़ गईं, जिसके बाद जॉर्ज ने लोहे के रॉड से उनके सिर पर मारा, जिससे दोनों की मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक, चोट इतना भयंकर था कि उनके सिर के 4-5 टुकड़े हो गए थे। दोनों लड़कियों की हत्या के लिए जॉर्ज और उसके भाई जॉन को गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि बाद में जॉनी को छोड़ दिया गया। इसके बाद जॉर्ज को गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी ने एक लिखित बयान दिया, जिसमें कहा गया कि जॉर्ज ने अपनी गलती मान ली है। लेकिन इसमें सबसे हैरान करने वाली बात ये थी कि उस लिखित बयान पर जॉर्ज के हस्ताक्षर ही नहीं थे। हालांकि इसपर किसी ने ध्यान नहीं दिया। बाद में जॉर्ज को कोलंबिया की जेल में लगभग तीन महीने तक रखा गया। इस दौरान उसके परिवार को उससे मिलने तक नहीं दिया गया। जॉर्ज के मामले की सुनवाई के लिए एक ज्यूरी का गठन किया गया और वो भी महज एक दिन में। अदालत की ओर से जॉर्ज के बचाव में वकील चार्ल्स प्लोडन को रखा गया था। कहा जाता है कि चार्ल्स राजनीति में आना चाहते थे और चूंकि उस समय श्वेत लोगों का राजनीति में बोलबाला था, इसलिए उन्होंने जॉर्ज के बचाव में सिर्फ एक ही दलील दी कि उससे किसी वयस्क की तरह पेश न आया जाए। लेकिन चूंकि उस समय अमेरिका में 14 साल के बच्चे को वयस्क ही माना जाता था, इसलिए चार्ल्स की दलील खारिज हो गई। इस केस की सबसे हैरान करने वाली बात ये भी थी कि जो जज मामले की सुनवाई कर रहे थे, वो सभी श्वेत थे। इसके अलावा कोर्टरूम के अंदर उस समय एक हजार से भी ज्यादा लोग थे, लेकिन किसी भी अश्वेत को अंदर घुसने नहीं दिया गया था। इस मामले में जॉर्ज के खिलाफ तीन गवाहों को पेश किया गया था, जिसमें एक वो था जिसने लड़कियों की लाश ढूंढी थी और दूसरे वो दो डॉक्टर जिन्होंने दोनों लड़कियों का पोस्टमॉर्टम किया था। पोस्टमॉर्टम में ये साबित हो चुका था कि दोनों लड़कियों के साथ दुष्कर्म नहीं हुआ था। वहीं जॉर्ज के वकील अदालत में एक भी गवाह पेश नहीं कर सके थे।इस केस में सबसे खास बात ये थी कि जॉर्ज के सवालों को क्रॉस चेक भी नहीं किया गया था और ना ही उसे अपने बचाव में कुछ बोलने का मौका ही दिया गया था। करीब ढाई घंटे तक मामले की सुनवाई चली थी और महज 10 मिनट में ही अदालत ने उसे दोषी मानते हुए मौत की सजा सुना दी थी। इस दौरान एक और खास बात थी कि जॉर्ज अपने आप को बेकसूर बता रहा था, लेकिन उसे यह साबित करने का मौका ही नहीं दिया गया।चूंकि उस दौर में लोगों को मौत की सजा इलेक्ट्रिक चेयर से दी जाती थी, लिहाजा जॉर्ज को इलेक्ट्रिक चेयर से बांधा गया। कहा जाता है कि जॉर्ज की लंबाई (पांच फीट) कम थी और वो कुर्सी पर फिट नहीं हो रहा था, इसलिए उसे किताबों के ऊपर बिठाया गया। कुछ लोग कहते हैं कि वो किताब बाइबिल थी। इसके बाद जॉर्ज को 2400 वोल्ट का बिजली का तेज झटका दिया गया, जिससे उसकी दर्दनाक मौत हो गई। जॉर्ज अभी भी अमेरिका में सबसे कम उम्र में मौत की सजा पाने वाला इंसान है। उसकी मौत के 70 साल बाद यानी 2014 में उसके केस को दोबारा खोला गया था, जिसमें ये माना गया कि उसके साथ अन्याय हुआ था। जॉर्ज के बयान स्पष्ट नहीं थे कि उसी ने दोनों लड़कियों का खून किया था। यानी उसे बेगुनाह करार दिया गया। यह मामला अमेरिका के कानूनी इतिहास में एक काला अध्याय माना जाता है, जिसमें एक बेगुनाह को दर्दनाक तरीके से सजा-ए-मौत दे दी गई थी।

Tuesday, January 7, 2020

1/07/2020 07:30:00 AM

नो सौ साल पहले जो चप्पलें भारतीय पहनते थे, उन्हें अब बेच रही हैं कंपनियां, देखें तस्वीर

मल्टीमीडिया डेस्क। कई बार आप लोगों को यह कहते हुए सुनते होंगे कि आज विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है। हम नए फैशन को अपनाते हैं। मगर, आज भी हम प्राचीन काल के लोगों से कहीं ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाए हैं। आज भी हम वैसी ही सैंडल और चप्पल पहन रहे हैं, जो 900 साल पहले भारतीय पहना करते थे। ट्विटर पर कई यूजर्स इस बारे में चर्चा कर रहे हैं। अपनी बात को साबित करने के लिए उन्होंने सैकड़ों साल पुराने एक भारतीय मंदिर की तस्वीर भी साझा की है। आप भी इन तस्वीरों को देखकर चौंक जाएंगे।

इसमें साफ देखा जा सकता है कि आज के समय में बाटा की जो चप्पल हम पहनते हैं, उसका डिजाइन वैसा ही है, जैसा प्राचीन भारतीय पहना करते थे। ट्विटर यूजर वी. गोपालन ने तमिलनाडु के एक प्राचीन मंदिर की तस्वीरों को शेयर किया है। इसमें देखा जा सकता है कि 900 साल पुरानी मूर्तियों में भारतीय जैसी सैंडल पहनते थे, वैसी ही आज की कई कंपनियां बनाती हैं।

इन तस्वीरों के साथ गोपालन ने लिखा है- सदियों पहले प्राचीन भारतीय पुरुष बहुत फैशनेबल थे! वे हजार साल पहले सैंडल पहन रहे थे, वही मॉडल जो बाटा इंडिया आज बेचता है। इस ट्वीट पर कई लोगों ने दूसरे भारतीय प्राचीन मंदिरों की तस्वीरों को भी शेयर किया और लिखा कि प्राचीन काल में भारतीय महिलाएं भी हील वाली सैंडल पहनती थीं।

Saturday, December 28, 2019

12/28/2019 06:14:00 PM

धरती से दूर सौर मंडल में एक ऐसा खतरनाक ग्रह, जहां होती है हीरों की बारिश

फीचर डेस्क। हमारे सौर मंडल में चार ग्रह ऐसे हैं, जिन्हें 'गैस दानव' कहा जाता है, क्योंकि वहां मिटटी-पत्थर के बजाय अधिकतर गैस हैं और इनका आकार बहुत ही विशाल है। वरुण (नेपच्यून) भी इन्हीं ग्रहों में से एक है। बाकी तीन बृहस्पति, शनि और अरुण (युरेनस) हैं। वरुण यूं तो धरती से सबसे ज्यादा दूर है और खतरनाक भी, क्योंकि वहां का तापमान शून्य से 200 डिग्री सेल्सियस नीचे रहता है। इतने में तो इंसान ऐसा जमेगा कि फिर वो किसी पत्थर की तरह टूट सकता है। वरुण हमारे सौरमंडल का पहला ऐसा ग्रह था, जिसके अस्तित्व की भविष्यवाणी उसे बिना कभी देखे ही गणित के अध्ययन से की गयी थी और फिर उसे उसी आधार पर खोजा गया। यह तब हुआ जब अरुण की परिक्रमा में कुछ अजीब गड़बड़ी पायी गई जिसका अर्थ केवल यही हो सकता था कि एक अज्ञात पड़ोसी ग्रह उसपर अपना गुरुत्वाकर्षक प्रभाव डाल रहा है। वरुण को पहली बार 23 सितंबर, 1846 को दूरबीन से देखा गया था और इसका नाम नेपच्यून रख दिया गया। नेपच्यून प्राचीन रोमन धर्म में समुद्र के देवता थे। ठीक यही स्थान भारत में वरुण देवता का रहा है, इसलिए इस ग्रह को हिंदी में वरुण कहा जाता है। रोमन धर्म में नेपच्यून देवता के हाथ में त्रिशूल होता था, इसलिए वरुण का खगोलशास्त्रिय चिन्ह ♆ ही है।वरुण ग्रह पर जमी हुई मीथेन गैस के बादल उड़ते हैं और यहां हवाओं की रफ्तार सौरमंडल के दूसरे किसी भी ग्रह से काफी ज्यादा है। यहां मीथेन की सुपरसोनिक हवाओं को रोकने के लिए कुछ भी नहीं है, इसलिए उनकी रफ्तार 1,500 मील प्रति घंटे तक पहुंच सकती है।   वरुण के वायुमंडल में संघनित कार्बन होने के कारण वहां हीरे की बारिश भी होती है। अगर इंसान कभी इस ग्रह पर पहुंच भी जाए तो इन हीरों को बटोर नहीं पाएगा, क्योंकि अत्यधिक ठंड के कारण वो वहीं पर जम जाएगा।

Friday, December 27, 2019

12/27/2019 08:10:00 AM

फांसी की सजा सुनाने के बाद पेन की निब तोड़ देते हैं जज, जानें क्यों

एजुकेशन डेस्क। आपने कई बार फिल्मों में देखा होगा और लोगों से सुना भी होगा की जब कोर्ट में जज किसी अपराधी को फांसी की सजा सुनाते हैं, तो उसके तुरंत बाद ही वह उस पेन की निब तोड़ देते हैं, जिससे उन्होंने फांसी की सजा का आदेश लिखा होता है। लेकिन सवाल है कि ऐसा क्यों किया जाता है? इसका क्या मतलब होता है? क्या पेन की निब नहीं तोड़े बिना किसी अपराधी को फांसी की सजा का आदेश नहीं दिया जा सकता? इन सवालों के जवाब आपको आगे मिल जाएंगे। सबसे पहले हम आपको बता दें कि यह प्रचलन भारत में ही है। भारतीय कानून के अनुसार, जब किसी मुजरिम को फांसी या मौत की सजा सुनाई जाती है तो उसके तुरंत बाद ही जज द्वारा पेन की निब तोड़ दी जाती है।
भारतीय कानून में सबसे बड़ी सजा फांसी की सजा है। रेयर ऑफ रेयरेस्ट केस, यानी जघन्यतम अपराध के मामले में ही मुजरिम को फांसी की सजा सुनाए जाने का प्रावधान है। जिस व्यक्ति का अपराध जघन्यतम अपराध की श्रेणी में आता हो, उसे ही मौत की सजा सुनाई जा सकती है। ऐसे किसी भी मामले में सजा सुनाने के बाद जज अपने पेन की निब को तोड़ देते हैं। इस आशा में की दोबारा ऐसा अपराध न हो।
एक कारण यह भी माना जाता है कि इस सजा के बाद किसी व्यक्ति का जीवन समाप्त हो जाता है, इसलिए ये सजा सुनाने के बाद पेन की निब तोड़ दी जाती है, ताकि पेन का भी जीवन समाप्त हो जाए और इसके बाद पेन द्वारा कुछ भी और लिखा न जा सके। भारत में फांसी की सजा किसी भी बड़े अपराध के लिए अंतिम सजा होती है। अगर एक बार सुप्रीम कोर्ट के जज द्वारा फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है तो इसके बाद इसे बदला नहीं जा सकता है।
हालांकि एक गुंजाइश यहां भी बाकी रह जाती है। मौत की सजा के मामले में आखिर में सजा माफी की याचिका पर विचार करना केवल देश के राष्ट्रपति के हाथ में होता है। वह अपने विवेक के आधार पर अपराधी को माफ भी कर सकते हैं। इस वजह से जब पेन से मौत लिखी जाती है, तब उसकी निब तोड़ दी जाती है। यह भी माना जाता है कि अगर फैसले के बाद पेन की निब तोड़ी जा चुकी है, तो इसके बाद खुद उस जज को भी यह अधिकार नहीं होता है की वो दोबारा उस फैसले को बदलने के बारे में सोच सके। पेन की निब टूट जाने के बाद इस फैसले पर दोबारा विचार भी नहीं किया जा सकता।

Saturday, December 21, 2019

12/21/2019 04:36:00 PM

जमीन से तीन हजार फुट नीचे बसा वो अद्भुत गांव, जहां छिपे हैं कई गहरे राज

फीचर डेस्क। गांव-देहात की अपनी खूबसूरती होती है। हालांकि देहाती जिंदगी, शहरी रहन-सहन के मुकाबले में नहीं टिकती क्योंकि वहां शहरों जैसी सुख सुविधाएं नहीं होतीं। इसीलिए लोग गांव छोड़ शहरों की ओर भागते हैं। लेकिन आज हम आपको दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका के ऐसे गांव की सैर पर ले चलेंगे, जो जमीन की सतह से तीन हजार फुट नीचे आबाद है।अमेरिका की मशहूर ग्रैंड कैनियन को देखने के लिए दुनिया भर से करीब 55 लाख लोग एरिजोना जाते हैं। मगर इसी में से एक गहरी खाई हवासू कैनियन के पास 'सुपाई' नाम का एक बहुत पुराना गांव बसा है। यहां की कुल आबादी 208 है। ये गांव जमीन की सतह पर नहीं बल्कि ग्रैंड कैनियन के भीतर करीब तीन हजार फ़ुट की गहराई पर बसा है। पूरे अमेरिका में ये इकलौता ऐसा गांव है, जहां आज भी खतों को लाने और ले जाने में लंबा वक्त लगता है। मिर्जा गालिब के दौर की तरह यहां आज भी लोगों के खत खच्चर पर लाद कर गांव तक लाए और ले जाए जाते हैं। खत ले जाने के लिए खच्चर गाड़ी का इस्तेमाल कब शुरू हुआ, यकीनी तौर पर कहना मुश्किल है। खच्चर गाड़ी पर यूनाइटेड स्टेट पोस्टल सर्विस की मोहर रहती है।  सुपाई गांव के तार आज तक शहर की सड़कों से नहीं जुड़ पाए हैं। यहां तक पहुंचने का रास्ता बहुत ऊबड़-खाबड़ है। गांव की सबसे नजदीकी सड़क भी करीब आठ मील दूर है। यहां तक पहुंचने के लिए या तो हेलिकॉप्टर की मदद ली जाती है या फिर खच्चर की। अगर हिम्मत हो तो पैदल चल कर भी यहां पहुंचा जा सकता है। सुपाई गांव में ग्रैंड कैनियन के गहरे राज छिपे हैं। ये गांव चारों ओर से बड़ी और ऊंची चोटियों से घिरा है। करीब पांच आबशार गांव की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। गहरी खाई में छुपा ये गांव करीब एक हजार साल से आबाद है। यहां पर अमेरिका के मूल निवासी रेड इंडियन रहते हैं।गांव में रहने वाली जनजाति का नामकरण गांव की खूबसूरती की बुनियाद पर हुआ है। हवासुपाई का अर्थ है नीले और हरे पानी वाले लोग। यहां के लोग गांव के पानी को पवित्र मानते हैं। मान्यता है कि यहां निकलने वाले फिरोजी पानी से ही इस जनजाति का जन्म हुआ है। गांव तक पहुंचने के लिए खारदार झाड़ियों के बीच से, भूल-भुलैया जैसी खाइयों से होकर गुजरना पड़ता है। ऐसे ऊबड़-खाबड़ रास्ते से गुजरते हुए ये अहसास भी नहीं होता कि आगे स्वर्ग जैसी जगह का दीदार होने वाला है। सामने ही आपको एक बड़ा-सा बोर्ड नजर आएगा जिस पर लिखा होगा 'सुपाई में आपका स्वागत है'। गांव पूरी तरह ट्रैफिक के शोर से आजाद है। खच्चर और घोड़े गांव की गलियों और पगडंडियों पर नजर आ जाएंगे। इस गांव में भले ही शहरों जैसी सुविधाएं नहीं हैं, लेकिन एक तसल्लीबख्श जिंदगी गुजारने वाली तमाम सहूलते हैं। यहां पोस्ट ऑफिस है, कैफे हैं, दो चर्च हैं, लॉज हैं, प्राइमरी स्कूल हैं, किराने की दुकानें हैं। यहां के लोग आज भी हवासुपाई भाषा बोलते हैं, सेम की फली और मकई की खेती करते हैं। रोजगार के लिए लच्छेदार टोकरियां बुनते हैं और शहरों में बेचते हैं। टोकरियां बनाना यहां का पारंपरिक व्यवसाय है। गांव से शहर को जोड़ने का काम खच्चर गाड़ियों से होता है। गांववालों की जरूरत का सामान इन खच्चर गाड़ियों पर लाद कर यहां लाया जाता है। कई सदियों से लोग इस अजीबो-गरीब गांव को देखने आते रहे हैं। बीसवीं सदी तक इस गांव के लोगों ने बाहरी लोगों के आने पर रोक लगा रखी थी, लेकिन आमदनी बढ़ाने के लिए उन्होंने करीब सौ साल पहले अपने गांव के दरवाजे बाहरी दुनिया के लिए खोल दिए। हर साल गांव में करीब बीस हजार लोग यहां की कुदरती खूबसूरती और यहां की जिंदगी देखने के लिए आते हैं, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए सभी सैलानियों को हवासुपाई की ट्राइबल काउंसिल की इजाजत लेनी पड़ती है। फरवरी महीने से नवंबर तक सैलानी यहां के लोगों के साथ उनके घरों में रह सकते हैं। चांदनी रात में झरनों से गिरते पानी की आवाज के साथ गांव की खूबसूरती का मजा ले सकते हैं। हवासुपाई गांव के लोगों की जिंदगी आसान बनाने वाले खच्चरों के लिए बीते कई दशकों से आवाज उठ रही है। सैलानियों की बढ़ती तादाद के साथ इन खच्चरों पर दबाव बढ़ने लगा है। इनसे जरूरत से ज्यादा काम लिया जा रहा है। साईस घोड़े और खच्चरों को सेहत को नजरअंदाज कर बिना खाना-पानी के आठ मील दूर तक चलाते रहते हैं। हालांकि ऐसा हर कोई नहीं करता। इसीलिए हवासुपाई ट्राइबल काउंसिल ने ऐसे साईसों की टीम बना दी है, जो कारोबार में इस्तेमाल होने वाले सभी जानवरों की देखभाल करते हैं। ये एक से दस नंबर के पैमाने पर जानवरों को सेहत का सर्टिफिकेट देते हैं।एरिजोना यूं ही सूखा राज्य है। यहां की ग्रैंड कैनियन में बारिश बहुत कम होती है। सालाना बारिश नौ इंच से भी कम रिकॉर्ड की जाती है है, लेकिन यहां के तीस हजार साल पुराने पानी के चश्मी कभी पानी की किल्लत नहीं होने देते। वैज्ञानिक पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इस रेगिस्तानी इलाके में फिरोजी पानी के झरने इतने सालों से कैसे रवां हैं। पानी में ये फिरोजी रंग आता कहां से है। दरअसल यहां की चट्टानों और जमीन में चूना पत्थर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। पत्थर पर पानी गिरने के साथ जब हवा मिलती है तो एक तरह की रसायनिक प्रतिक्रिया होती है और कैल्शियम कार्बोनेट बनने लगता है। सूरज की रोशनी पड़ने पर यही पानी फिरोजी रंग का नजर आता है।यूरोपीय लोगों के अमरीका आकर बसने से पहले हवासुपाई का रकबा लगभग 16 लाख एकड़ था, लेकिन इस इलाके के कुदरती जखीरे पर जब सरकार और सरहदी लोगों की नजर पड़ी तो उन्होंने यहां कब्जा करना शुरू कर दिया। व्यापारियों ने यहां रहने वाली बहुत-सी जनजातियों को जबरन उखाड़ फेंका। इनके हक के लिए हवासुपाई के आदिवासियों ने लंबी लड़ाई लड़ी है। 1919 में अमेरिका के राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने ग्रैंड कैनियन को नेशनल पार्क सर्विस का हिस्सा बनाया। सरकारी योजना के तहत यहां के बहुत से लोगों को रोजगार मिला, लेकिन इसके बावजूद अपनी जमीन के लिए इनकी लड़ाई जारी रही। 1975 में राष्ट्रपति जेराल्ड फोर्ड ने करार के तहत 1,85,000 एकड़ जमीन का कंट्रोल हवासुपाई के लोगों को दे दिया। आज यहां के लोग सिर्फ कैनियन तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि यहां के जंगलों में शिकार करने का हक भी इन्हें मिल गया है।आज हवासुपाई की पहचान एक खुदमुख्तार सूबे के तौर पर है। यहां के लोग अपनी सरकार खुद चलाते हैं। ट्राइबल काउंसिल का चुनाव गांव के लोग करते हैं और अपने कानून खुद बनाते हैं। हाल के सालों में हवासुपाई पर सबसे बड़ा खतरा सैलाब का मंडरा रहा है। 2008 और 2010 में यहां जबरदस्त बारिश हुई थी जिसमें बहुत से सैलानी फंस गए थे। सुपाई को बाहर के इलाके से जोड़ने वाली पगडंडी भी पूरी तरह से तबाह हो गई थी। 2011 में यहां के लोगों ने एरिजोना के गवर्नर के साथ अमेरिकी सरकार से आर्थिक मदद मांगी। सरकार ने इन्हें करीब 16 लाख डॉलर की आर्थिक मदद दी। हजार साल से यहां सैलाब और सरहद पर रहने वाले लोग आते और जाते रहे, लेकिन हवासुपाई के लोग यहां सब्र के साथ रहते रहे। यहां के लोग मानते हैं कि वो अपने पूर्वजों के घर में रहते हैं। यहां के झरनों और जमीन में उनके बुज़ुर्ग वास करते हैं। लिहाजा वो यहीं रहेंगे।